विकास के लिए प्रौद्योगिकी और सार्वजनिक नीतियां आवश्यक

आईसीएआर की क्षेत्रीय समिति की बैठक आयोजित

रांची, झारखंड, 07 अक्टूबर 2010

‘वर्षा आधारित कृषि क्षमता को साकार करने में प्रौद्योगिकी, नीतियों और बुनियादी ढांचे की भूमिका अति महत्वपूर्ण हैं। प्रौद्योगिकी और सार्वजनिक नीतियां कृषि विकास के दो प्रमुख घटक हैं और उनके बीच परस्पर तालमेल आवश्यक है।’ यह बात महामहिम एम. ओ. एच. फारूक, राज्यपाल, झारखंड ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की 20वें क्षेत्रीय समिति नं.-4 की बैठक के उद्घाटन सत्र में कही। इस बैठक का आयोजन बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), रांची में किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि संसाधन संपन्न पूर्वी भारत के उच्च वर्षा क्षेत्रों को कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए क्योंकि यहां उत्तर पश्चिम राज्यों की तुलना में 2-3 गुना अधिक वर्षा होती है। इसके साथ ही उन्होंने इमारती एवं गैर-इमारती लकड़ी, वन उत्पाद तथा उन्नत औषधीय पौधों के जैव-पूर्वानुमान के क्षेत्र में विशेष ध्यान देने का आग्रह भी किया।

महामहिम श्री फारूक ने सुझाव देते हुए कहा कि पलामू क्षेत्र की तरह शुष्क क्षेत्रों में लघु मोटे अनाजों में सुधार के लिए एक अनुसंधान केंद्र स्थापित किया जा सकता है। इसके साथ ही उन्होंने अपने भाषण में झारखंड राज्य के सीमांत किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए जल तथा अम्लीय मिट्टी प्रबंधन से संबंधित मुद्दों पर जोर दिया।

इस अवसर पर अपने व्याख्यान में डॉ. एस. अय्यप्पन, सचिव, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग तथा महानिदेशक, आईसीएआर ने बताया कि विशिष्ट मौसम की स्थिति जैसे सूखे और जल-भराव की समस्याओं पर काबू पाने के लिए आवश्यक किस्मों पर अनुसंधान प्रगति पर है। साथ ही साथ उन्होंने झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश के किसानों की समस्याओं को सुलझाने में बीएयू, रांची की भूमिका की सराहना की। डॉ. अय्यप्पन ने कहा कि इस बैठक का प्रमुख बिंदु इस क्षेत्र के कपास, गन्ना और चावल उत्पादक किसानों के लिए कार्य योजना तैयार करना है। उन्होंने इस बात को दोहराया कि गुणवत्तायुक्त मानव संसाधन और कृषि संबंधित क्षेत्रों में रुचि को जगाना एक चुनौती है।

बैठक में डॉ. स्वप्न कुमार दत्ता, उप महानिदेशक (फसल विज्ञान), आईसीएआर ने कृषि क्षेत्र में नई प्रौद्योगिकी और अनुकूलन की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। इससे पूर्व डॉ. एन. एन. सिंह, कुलपति, बीएयू ने अपने स्वागत भाषण में चावल की फसल की जगह सोयाबीन, मूंगफली, कपास, ‘शकरकंद, कसावा, मोंठ, अरंडी और अन्य फसलों को बोने का आग्रह किया।

इस बैठक में आईसीएआर के अधिकारियों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, राज्य कृषि विभाग, क्षेत्रीय परियोजना निदेशालय और झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश के कृषि विज्ञान केंद्रों ने हिस्सा लिया।

(स्रोत- एनएआईपी सब-प्रोजेक्ट मास-मीडिया मोबिलाइजेशन, दीपा )