भारत के राष्ट्रपति द्वारा बीजीआरआई तकनीकी कार्यशाला का उद्घाटन

19 अगस्त 2013, नई दिल्ली

Shri Pranab Mukherjee, Hon'ble President of Indiaभारत के राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने सोमवार को विज्ञान भवन में पांचवें बी.जी.आर.आई. (बोरलॉग ग्लोबल रस्ट इनीशिएटिव)-2013 तकनीकी कार्यशाला का उद्घाटन किया। राष्ट्रपति महोदय ने अपने संबोधन में भारत को अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. नॉरमन ई. बोरलॉग के योगदान और उनकी सेवाओं की सराहना की। उन्होंने कहा कि डॉ. बोरलॉग ने दक्षिण एशिया क्षेत्र में खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाने में काफी सहयोग किया। आज यह विश्व का सबसे ज्यादा गेहूं उत्पादन करने वाला क्षेत्र है। उच्च उत्पादक प्रजाति के गेहूं के विकास और गेहूं के तना में लगने वाले रतुआ रोग के खिलाफ उनके अभियान के लिए उन्हें 1970 में नोबल शांति पुरस्कार दिया गया। उन्होंने डॉ. बोरलॉग द्वारा प्रारंभ किए गए काम को आगे बढ़ाये जाने की सराहना की।

राष्ट्रपति महोदय ने कहा कि गेहूं का उत्पादन बढ़ाने और इसमें लगने वाले रोगों पर नियंत्रण पाने के लिए जिस तरह से निरंतर शोध और विकास कार्य हो रहे हैं, उसके प्रेरणास्रोत डॉ. बोरलॉग ही हैं। वर्ष 1965 से अब तक देश के छह सबसे ज्यादा गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में वाणिज्यिक खेती के लिए गेहूं की 403 प्रजातियों का विकास किया जा चुका है। इन प्रजातियों को उत्पादन क्षमता, पौष्टिक तत्वों की उपलब्धता और रोग प्रतिरोधात्मकता के उच्च मापदंडों पर कड़े मूल्यांकन के बाद ही किसानों तक पहुंचाया गया है। आईसीएआर के विभिन्न संस्थानों के शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों के बाद किसानों को गेहूं की नई उन्नत किस्मों के साथ उत्पादन बढ़ाने की तकनीकी जानकारियां भी उपलब्ध कराई जा चुकी हैं। इसमें राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और गेहूं अनुसंधान निदेशालय का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

the 5th BGRI (Borlaug Global Rust Initiative) 2013 Technical Workshop at Vigyan Bhavan

Shri Sharad Pawar, Union Minister of Agriculture and Food Processing Industriesश्री शरद पवार, केन्द्रीय कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री, भारत सरकार ने अपने संबोधन में भारतीय और वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए इस तकनीकी कार्यशाला के महत्व को बताया। हरित क्रान्ति से पहले अनाज की भीषण कमी को याद करते हुए उन्होंने कहा कि डॉ. बोरलॉग, डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन और अन्य कृषि वैज्ञानिकों ने अपने शोधों और अथक प्रयासों से आज गेहूं उत्पादन को एक नयी ऊंचाई तक पहुंचा दिया है।

Ms. Jeanie Borlaug, Chair, BGRIइस मौके पर बी.जी.आर.आई की अध्यक्ष और डॉ. बोरलॉग की पुत्री सुश्री जेनी बोरलॉग ने राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी को सम्मानित किया। सुश्री जेनी ने बचपन में अपने पिता के साथ की गई भारत यात्राओं के अनुभव साझा किये। उन्होंने कहा कि डॉ. बोरलॉग खेती में जैव प्रौद्योगिकी के प्रयोग के मजबूत पक्षधर थे। उन्हें भरोसा था कि इससे दुनिया से, खासकर विकासशील देशों से, भुखमरी को पूरी तरह से समाप्त किया जा सकता है।

Dr Ronnie Coffman, Vice-Chair, BGRI डॉ. रॉनी कॉफमैन, उपाध्यक्ष, बी.जी.आर.आई. और अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम, कार्नेल विश्वविद्यालय ने गणमान्य व्यक्तियों, प्रतिनिधियों और अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने भारत और उपमहाद्वीप में गेहूं में लगने वाले रतुआ रोग के संबंध में बी.जी.आर.आई. के उद्देश्यों, अनुसंधान पहल और उपलब्धियों पर प्रकाश डाला।

Dr. S. Ayyappan, Secretary (DARE) & Director General (ICAR)डॉ. एस. अय्यप्पन, सचिव, डेयर और महानिदेशक, भा.कृ.अनु.प. ने इस मौके पर कहा कि डॉ. बोरलॉग ऐसे शोधकर्ता थे जिन्होंने कभी खुद को भौगोलिक सीमाओं में नहीं बांधा। उन्होंने भारत में गेहूं उत्पादन के इतिहास की जानकारी दी और उसके बाद जो क्रान्ति आई उससे भारत में कुल गेहूं उत्पादन 95 लाख टन की रिकॉर्ड ऊंचाई तक पहुंच गया। उन्होंने कहा कि बी.जी.आर.आई. ने भारत में गेहूं शोध कार्यक्रम को मजबूती प्रदान की है, खासकर रतुआ से खतरे को लेकर। डॉ. अय्यप्पन ने आशा व्यक्त की कि इस तकनीकी कार्यशाला में होने वाले विचार-विमर्श से गेहूं उत्पादन और इसकी गुणवत्ता को और बढ़ाने के लिए सशक्त रोडमैप विकसित हो सकेगा।

Shri Ashish Bahuguna, Secretary, Ministry of Agricultureश्री आशीष बहुगुणा, सचिव, कृषि मंत्रालय ने आशा व्यक्त की कि गेहूं का उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के लिए भारत आधुनिक प्रौद्योगिकी में अपनी क्षमता का आगे भी विकास करेगा। उन्होंने कहा कि भारतीय वैज्ञानिकों को देश की पोषण सुरक्षा को बढ़ाने के लिए अपने शोध कार्यक्रमों को अधिक सशक्त बनाना चाहिए।

Dr. Swapan K. Dutta, DDG (ICAR)डॉ. स्वप्न कुमार दत्ता, उप महानिदेशक, फसल विज्ञान, भा.कृ.अनु.प. ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।

यह कार्यशाला डॉ. नॉरमन ई. बोरलॉग की 1963 में पहली भारत यात्रा के 50 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य पर आयोजित की जा रही है। इसमें 50 देशों से आए करीब 500 प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। यह चार दिवसीय (19-22 अगस्त, 2013) कार्यशाला संयुक्त रूप से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और बीजीआरआई की ओर से आयोजित की गई है। बीजीआरआई की स्थापना वर्ष 2005 में डॉ. बोरलॉग ने की थी। उन्होंने आगाह किया था कि रतुआ कभी भी खत्म नहीं होता है। बीजीआरआई के माध्यम से ही उन्होंने वैश्विक खाद्य सुरक्षा को रतुआ से पैदा हुए खतरे से आगाह करने के लिए एक अभियान की शुरुआत की थी।

 

(स्रोतः एनएआईपी मास मीडिया परियोजना, डीकेएमए, आईसीएआर)