‘’पूर्वी क्षेत्र के लिए जल भराव पारिस्थितिकी के पुनर्वास हेतु कृषि वानिकी’’ पर विचार मंथन सत्र का आयोजन

5 अप्रैल, 2016, पटना, बिहार

Farmers Fair on Pradhan Mantri Fasal Bhima Yojana at Hyderabad‘’पूर्वी क्षेत्र के लिए जल भराव पारिस्थितिकी के पुनर्वास हेतु कृषि वानिकी’’ पर विचार मंथन सत्र का आयोजन राष्‍ट्रीय कृषि विज्ञान संकाय (NAAS), नई दिल्‍ली तथा पूर्वी क्षेत्र के लिए भाकृअनुप का अनुसंधान परिसर, पटना द्वारा संयुक्‍त रूप से आज यहां पूर्वी क्षेत्र के लिए भाकृअनुप का अनुसंधान परिसर, पटना में किया गया।

उद्घाटन सत्र के मुख्‍य अतिथि एवं कृषि वैज्ञानिक चयन मंडल के अध्‍यक्ष डॉ. गुरबचन सिंह ने कहा कि देश में दूसरी हरित क्रान्ति लाने में कृषि वानिकी क्षमताओं से भरपूर एक क्षेत्र है लेकिन अभी तक इस क्षेत्र का दोहन नहीं किया जा सका है। पूर्वी भारत के जलीय क्षेत्रों के पुनर्वास के लिए उन्‍होंने जल भराव पारिस्थितिकी की  विस्‍तृत सूची तैयार करने पर बल दिया जिसमें जल के स्रोत का लक्षणवर्णन, जल भराव की अवधि तथा गहराई आदि शामिल हो। डॉ. सिंह ने लाभप्रदता के लिए पर्याप्‍त चिंतन के साथ विभिन्‍न जल भराव पारिस्थितिकी के लिए विशिष्‍ट कृषि वानिकी समाधान का विकास करने पर बल दिया। इसके लिए उन्‍होंने वन्‍य उत्‍पादों के लिए न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य बनाने पर जोर दिया। कृषि वानिकी हस्‍तक्षेपों के माध्‍यम से हरियाणा तथा पंजाब में जलभराव क्षेत्रों के पुनर्वास पर किए गए अनुसंधान अनुभवों के आधार पर उन्‍होंने बायो ड्रेनेज पर नीति दिशानिर्देश विकसित करने और अंतर-मंत्रालयों को शामिल करते हुए इसके क्रियान्‍वयन हेतु एक टास्‍क बल बनाने का सुझाव दिया । उन्‍होंने वैज्ञानिकों से किसान समुदाय की अनुसंधान जरूरतों का समाधान करने के लिए विषय उन्‍मुख अनुसंधान की बाधाओं को तोड़ने का आह्वान किया।

डॉ. जे.एस. सामरा, पूर्व उपमहानिदेशक, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन एवं मुख्‍य कार्यकारी अधिकारी, राष्‍ट्रीय बारानी क्षेत्र प्राधिकारण ने सत्र की अध्‍यक्षता करते हुए उपलब्‍ध भूजल की प्रभावी उपयोगिता, सौर उर्जा के सदुपयोग तथा किसानों की आमदनी को बढ़ाने के लिए बाजार प्रणाली को मजबूत बनाने पर बल दिया। डॉ. सामरा ने विवादित भूमि तथा विखंडित कृषि जोत से जुड़े मुद्दों का समाधान करने के लिए जीपीएस मैपिंग जैसी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और भूमि समेकन के अन्‍य वैकल्पिक तरीकों  का उपयोग करने पर बल दिया। नदी तटबंधों के अपक्षरण के प्रभावों को न्‍यूनतम करने के लिए उन्‍होंने नदियों पर बांध की बजाय शाकीय आश्रय क्षेत्र का उपयोग करने का सुझाव दिया।

डॉ. पी.एल. गौतम, कुलपति, कैरियर प्‍वाइंट यूनिवर्सिटी, हिमाचल प्रदेश जो कि कार्यक्रम के सम्‍माननीय अतिथि भी थे,  ने  सुझाव दिया कि जलभराव क्षेत्रों के व्‍यापक लक्षणवर्णन के लिए पूर्वी भारत अथवा राज्‍य रिमोट सेन्सिंग एजेन्सियों  के जल संसाधनों के गतिशील डाटाबेस पर NRSA के उपलब्‍ध डाटासेट का उपयोग किया जाए। उन्‍होंने जल भराव क्षेत्रों के लिए उपयुक्‍त विभिन्‍न चारा फसलों के जननद्रव्‍य का प्रबंधन करने के लिए संस्‍थानों के बीच आपसी सहयोग विकसित करने पर बल दिया। उन्‍होंने सभी जलभराव सहिष्‍णु वृक्षों और बांस प्रजातियों की तरूवाटिका स्‍थापित करने और पूर्वी क्षेत्र के लिए भाकृअनुप का अनुसंधान परिसर, पटना में जलभराव सहिष्‍णु चारा प्रजातियों के एक खेत जीन बैंक का प्रबंधन करने का सुझाव दिया। साथ ही उन्‍होंने विचारमंथन सत्र में हुई आपसी चर्चा के आधार पर तथा भावी विचार विमर्श में प्रदाता एजेन्सियों के प्रतिनिधियों की भागीदारी पर  एक नीति पेपर तैयार करने का सुझाव भी दिया।

डॉ. बी.पी. भटृ, निदेशक, पूर्वी क्षेत्र के लिए भाकृअनुप का अनुसंधान परिसर, पटना ने प्रारंभिक सत्र में विभिन्‍न पूर्वी राज्‍यों में जल भराव पारिस्थितिकी, बंजर भूमि तथा चारा की मांग व आपूर्ति में अन्‍तराल तथा ईंधन लकडी के संबंध में संक्षिप्‍त जानकारी दी। उन्‍होंने क्षेत्र के किसानों की आमदनी को टिकाऊ बनाने और उसे दोगुना करने के लिए लकड़ी बारहमासी तथा पशुधन का समेकन करने की जरूरत, विविध जल इकोलॉजी की सूची तैयार करने, बायो ड्रेनेज के लिए उपयुक्‍त वृक्ष फसलों की ईटी क्षमता पर अध्‍ययन करने, आश्रय बेल्‍ट के लिए उपयुक्‍त एमपीटी/झाड़ी के बीज व पौद बैंक की स्‍थापना करने, चारदीवारी रोपण, हवा अवरोध, जलीय फसलों में विविधीकरण और जल भराव पारिस्थितिकी द्वारा प्रस्‍तुत इकोसिस्‍टम सेवाओं का आकलन करने पर बल दिया।

इस कार्यक्रम में विभिन्‍न पूर्वी राज्‍यों, कृषि सहकारिता एवं किसान कल्‍याण विभाग, भारत सरकार, वर्ल्‍ड कृषि वानिकी अनुसंधान केन्‍द्र, राज्‍य कृषि विश्‍वविद्यालयों तथा सिम्‍मट से लगभग 65 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

(स्रोत : पूर्वी क्षेत्र के लिए भाकृअनुप का अनुसंधान परिसर, पटना)