भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजा गेहूं जीनोम अनुक्रमण

18th जुलाई, 2014, नई दिल्ली

Scienceभाकृअनुप के राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान केन्द्र (एनआरसीपीबी), नई दिल्ली; पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू), लुधियाना और दिल्ली यूनीवर्सिटी साउथ कैम्पस (दिल्ली) के वैज्ञानिकों ने अन्तर्राष्ट्रीय गेहूं जीनोम अनुक्रमण कंसोर्टियम (आईडब्ल्यूजीएससी) के साथ मिलकर शीर्षअन्तर्राष्ट्रीय पत्रिका 'साइंस' के 18 जुलाई, 2014 के अंक में गेहूं जीनोम का क्रोमोसोम आधारित ड्राफ्ट अनुक्रमण प्रकाशित किया है। विश्व की सर्वाधिक महत्वपूर्ण खाद्य फसल के जीनोम को डिकोड करने के अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास में भारतीय वैज्ञानिकों की भागीदारी हमारे देश के लिए गर्व की बात है।

भारत को गेहूं क्रोमोसोम ‘2A’ की डिकोडिंग का कार्य सौंपा गया है। इसके लगभग 900 मिलियन आधार जोड़े के जीनोमिक डीएनए कोड हैं, यह आकार में पूरे धान जीनोम का लगभग ढाई गुणा और मानव जीनोम का लगभग छः गुणा है। इस 35 करोड़ की कुल लागत वाली भारतीय पहल को जैव प्रौद्योगिकी विभाग, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा वित्तीय सहायता दी गयी है। इससे पहले भारतीय वैज्ञानिकों ने अन्तर्राष्ट्रीय कंसोर्टिया के तहत धान और टमाटर के आनुवंशिक कोड को डिकोड किया था और अरहर तथा चने के जीनोम को पूर्णतया डिकोड करने में स्वयं सफल रहे हैं।

Wheat17,000 मिलियन आधार जोड़े वाले बड़े आकार के जीनोम और एक जैसे तीन जोड़े क्रोमोसोम होने के कारण गेहूं के जीनोम को डिकोड करना बहुत जटिल कार्य है। हालांकि हाल की प्रौद्योगिकीय उन्नति और गेहूं किस्म ‘चाइनीज़ स्प्रिंग’ में वर्ष 1950 के दौरान विकसित विशिष्ट आनुवंशिक स्टॅाक की उपलब्धता से अनुक्रमण के लिए गेहूं क्रोमोसाम को अलग करना संभव हो पाया है। विश्व में सर्वाधिक उगायी जाने वाली इस खाद्यान्न फसल के विशाल जटिल जीनोम के क्रोमोसोम आधारित ड्राफ्ट अनुक्रमण से इसकी संरचना, संगठन और विकास के बारे में एक नयी अन्तर्दृष्टि मिली है। गेहूं जीनोम डिकोडिंग से एकल गेहूं क्रोमोसोम के 125,000 जीनों की पहचान हुई है।

आईडब्ल्यूजीएससी के अंतिम लक्ष्य शटगुणित गेहूं जीनोम के संपूर्ण संदर्भ अनुक्रमण में यह ड्राफ्ट अनुक्रमण प्रमुख है। ‘साइंस’ के इसी अंक में एक अन्य लेख में सर्वाधिक बड़े गेहूं क्रोमोसोम ‘3B’ का पहला संदर्भ अनुक्रमण प्रकाशित है। इससे जाहिर है कि अगले 3 वर्षों में गेहूं के सभी क्रोमोसोम के संदर्भ अनुक्रमण का पता लग जायेगा। क्रोमोसोम आधारित संपूर्ण अनुक्रमण के पश्चात गेहूं प्रजनक अपने प्रजनक कार्यक्रमों में तीव्रता ला सकेगें और जान सकेगें कि उत्पादन, खाद्यान्न गुणवत्ता, रोग और कीट प्रतिरोधिता, सूखा, ताप और लवण तनाव सहिष्णुता आदि जटिल गुणों को जीन कैसे नियंत्रित करते हैं। इसमें बदलते पर्यावरण में बढ़ती वैश्विक जनसंख्या की मांग को पूरा करने के लिए तीव्रता से श्रेष्ठ गेहूं किस्मों का उत्पादन किया जा सकेगा। इस ड्राफ्ट अनुक्रमण से गेहूं जीनोम के इतिहास, उद्भव और दाने के विकास एवं रोग प्रतिरोधिता के लिए जिम्मेदार जीन के बारे में नई जानकारियां मिली हैं। आईडब्ल्यूजीएससी का लक्ष्य गेहूं के उच्च गुणवत्तापूर्ण जीनोम अनुक्रमण को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध करवाना है, जिससे मौलिक अनुसंधान का आधार बनाकर गेहूं प्रजनक उन्नत किस्मों का तीव्र विकास कर सकें।

पादप विज्ञान अनुसंधानकर्ताओं और गेहूं प्रजनकों के लिए गेहूं का यह आनुवंशिक ब्ल्यूप्रिंट एक बहुमूल्य संसाधन है। पहली बार वैज्ञानिकों को ऐसे टूल्स मिले हैं, जिससे वे तीव्रता और सटीकता से किसी भी गेहूं क्रोमोसोम में विशिष्ट जीन तक पहुंच सकते हैं। इसके अतिरिक्त डीएनए फिंगरप्रिंटिंग, विविधता विश्लेषण और मार्कर सहायक गेहूं प्रजनन के लिए इससे हजारों मार्कर उपलब्ध हो जाते हैं। जलवायु परिवर्तन, असमान वर्षा और ग्लोबल वार्मिंग के परिणामों के पूर्वानुमान के अनुसार, भाकृअनुप ने सूखा, ताप और लवणता, गेहूं रतुआ जैसे फफूंदीजनक रोगों के लिए सहिष्णुता तथा ब्रेड और चपाती बनाने वाले गुणों के लिए जीनों की खोज पर प्रमुख अनुसंधान प्रायोजनाएं शुरु की हैं किन्तु जीनोम अनुक्रमण सूचना उपलब्ध न होने के कारण यह कार्य धीमी गति से हो रहा है। धान के मामले में वर्ष 2005 में धान जीनोम अनुक्रमण प्रकाशित होने के पश्चात पिछले 9 वर्षों में जीन खोज और उपयोग में तीव्र प्रगति हुई है। गेहूं जीनोम उपलब्धता से अब जीन खोज प्रयासों को तीव्रता मिलेगी और धान की तरह गेहूं की श्रेष्ठ किस्मों का शीध्र विकास होगा। विश्व भर में गेहूं मानव भोजन में प्रमुख रूप से प्रयोग होता है। विश्व में सर्वाधिक क्षेत्र यानी 215 मिलियन हैक्टर क्षेत्र पर इसका उत्पादन होता है और विश्व का वार्षिक गेहूं उत्पादन लगभग 700 मिलियन टन है, जिससे मक्का और धान के पश्चात विश्व में इसका तीसरा उत्पादन स्थान है। मानव आहार में यह शाकीय प्रोटीन का अग्रणी स्रोत है और इसमें मक्का एवं धान से ज्यादा प्रोटीन पाया जाता है।

स्रोत एवं संपर्कः:

प्रो. नागेन्द्र कुमार सिंह nksinghatnrcpb [dot] org