मेघालय में मध्य-मौसम सूखा व बाढ़ से बचाव हेतु आपात तैयारी

28 जून, 2016, उमियम

Contingency Preparedness towards Floods and Mid-season Droughts in Meghalayaखरीफ-2016 में मेघालय में मध्य-मौसम सूखा व बाढ़ से बचाव हेतु आपात तैयारी से जुड़ी बैठक 28 जून, 2016 को भाकृअनुप- केन्द्रीय शुष्कभूमि कृषि अनुसंधान संस्थान (क्रीडा), उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के लिए भाकृअनुप अनुसंधान परिसर, उमियम और कृषि, सहकारिता और किसान कल्याण विभाग के संयुक्त सहयोग से उमियम में आयोजित की गई।

डॉ. प्रेमजीत सिंह, कुलपति, केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने अपने संबोधन में कहा कि 2000 मि.मी. की वर्षा के बावजूद भी राज्य में जल की कमी है। जल की समस्या से निपटने के लिए उन्होंने विभाग से यह अनुरोध किया कि राज्य में सूक्ष्म सिंचाई पद्धति के माध्यम से रबी के क्षेत्र और उत्पादन में बढ़ोतरी के लिए लंबी अवधि वाली जल संग्रह योजना पर ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने मेघालय में गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता और सीएयू द्वारा बीज आपूर्ति के लिए किए जा रहे प्रयासों के बारे में सूचना दी।

डॉ. श्रीनिवास राव, निदेशक, भाकृअनुप- क्रीडा ने आईएमडी और एसएएससीओएफ के मौसम के पुर्वानुमान के माध्यम से जानकारी दी कि खरीफ के मौसम में सामान्य से कम वर्षा होने का अनुमान है। इसके साथ ही उन्होंने मध्य और अंत मौसम के सूखे या बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिए आपात योजना के निर्माण का आग्रह किया। क्षेत्र की स्थलाकृति को देखते हुए उन्होंने फसल विविधता के साथ मध्य एवं ऊपरी भूभाग में दलहनी और तलहनी फसल वह उपराऊ मध्य निचली भूमि में तिलहन और ऊपरी भूभाग और कम अवधि जलमग्नता सहिष्णु किस्मों के विविधीकरण का सुझाव दिया।

डॉ एसवी नचान, निदेशक, पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए भाकृअनुप अनुसंधान परिसर ने कहा कि तीव्र वर्षा और बाढ़ गारो पहाड़ियों की मुख्य समस्या बनती जा रही है। इसके कारण क्षेत्र में मिट्टी में कटाव, धान के खेतों की जलमग्नता तथा आलू की खेती में बाधाएं बढ़ती जा रही है। उन्होंने इस दिशा में भाकृअनुप परिसर द्वारा किए जा रहे प्रयासों और प्रौद्योगिकियों के प्रयोग के बारे में बताया जो मेघालय के विभिन्न जिलों में उपलब्ध हैं।

श्रीमती डी. सेइमियोंग, निदेशक (कृषि), मेघालय ने अपने संबोधन में यह सूचना दी कि मेघालय के एक ही जिले में बाढ़ और सूखा पड़ रहा है। इससे निपटने के लिए बड़े स्तर पर चेक डैम निर्माण द्वारा जल संग्रह करने के प्रयासों के बारे में भी सूचना दी। इसके साथ ही उन्होंने प्राकृतिक संसाधन संरक्षण के विकास योजना की नियमावली में बदलाव की बात कही, जिसमें 50 प्रतिशत किसानों के योगदान को अनिवार्य किया गया है।

अनुशंसाएं-
केंद्रीय योजनाओं के तहत अधिक धनपूर्ति द्वारा जल संरक्षण के लिए जल बहाव पर चैक डैम के निर्माण को प्राथमिकता

  • वर्षा की तीव्रता बढ़ने के साथ ही भूस्खलन और मृदा कटाव को रोकने के लिए वन संरक्षण को बढ़ावा देना
  • रबी के दौरान सोयाबीन और मटर के फसल को प्राथमिकता
  • कृषक समुदाय के बीच ऊर्वरकों के एक बार के स्थान पर कई हिस्सों में प्रयोग को बढ़ावा देना
  • क्षेत्र में कम लागत वाले जलकुंड व ट्रिडल (पैर से चलने वाले) पंप को बढ़ावा देना
  • सूखे की स्थिति में दलहन या कम अवधि वाली धान की किस्मों को प्रोत्साहित करना
  • महिला किसानों के प्रयोग में आसान स्थानीय स्थितियों के अनुकूल मशीनों को बढ़ावा देने की आवश्यकता
  • स्थानीय क्षेत्रों में फसल बदलाव नियम होना चाहिए
  • रबी की फसलों को पर्याप्त समय देने के लिए जून तक धान की अग्रिम रोपाई के प्रयास करना
  • जल संरक्षण संरचना निर्माण में किसानों की सहभागिता वाले नियम में बदलाव का निर्णय
  • राज्य में अधिक उगायी जाने वाली सब्जियों के भंडारण के लिए कलेक्शन सेंटर सुविधा का निर्माण
  • आवारा पशुओं व अन्य समस्याओं से बचाव के लिए सामूहिक खेती के प्रति गांव में जागरूकता कार्यक्रम

राज्य कृषि विश्वविद्यालय के, राजकीय कृषि विभाग वरिष्ठ अधिकारी, एआईसीआरपीएएम केन्द्रों, एआईसीआरपीडीए, स्थानीय भाकृअनुप व केवीके के कार्यक्रम समन्वयक ने इस कार्यशाला में भाग लिया।

(स्रोतः: भाकृअनुप- केन्द्रीय शुष्कभूमि अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद)