गैर-मौसमी सब्जियों के उत्पादन ने आमदनी बढ़ाई

श्रीमती रुक्मिणी देवी ब्लाक जाखणीधार के सोनधार गांव में रहती हैं। इनके पति का व्यवसाय कृषि है और इनको वृद्धावस्था पेंशन भी मिलती है। इसके अतिरिक्त इनके आय का कोई अन्य स्रोत नहीं है। इनके पास 10 नाली (0.2 हैक्टर) जमीन है तथा एक भैंस है और तीन कमरों का मकान है, जिसमें एक कमरा पक्का है। आर्थिक स्थिति के अनुसार यह परिवार गरीबी रेखा के नीचे आता है। अन्य कृषकों की तरह श्रीमती रुक्मिणी देवी ने भी पत्तागोभी उत्पादन की शुरुआत की पर इससे इन्हें कोई खास लाभ नजर नहीं आया। तभी एक कार्यक्रम के तहत कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों का भ्रमण इस गांव में हुआ और लगभग 30 कृषकों के साथ एक बैठक संपन्न कराई गई। इस बैठक में कृषकों को पर्वतीय परिसर रानीचौरी के संबंध में पूरी जानकारी दी गई। बैठक में सर्वसम्मति से यह सुनिश्चित किया गया कि आने वाले खरीफ के मौसम मे इस गांव में प्रथम पंक्ति प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा।

गैर-मौसमी सब्जियों के उत्पादन ने आमदनी  बढ़ाई

इस प्रकार ग्राम सोनधार के 28 किसानों के प्रक्षेत्र में सोयाबीन के प्रथम पंक्ति प्रदर्शन लगाए गए। और अनुमानतः 10.5 क्विंटल/हैक्टर उपज उत्पादन मिला, जो कि उनके स्थानीय प्रजाति के मुकाबले ज्यादा था। इस प्रकार किसानों का कृषि विज्ञान केंद्रों पर विश्वास बढ़ा और फिर इसी क्रम में रबी में भी ग्राम सोनधार में गेहूं पर प्रथम पंक्ति प्रदर्शनों का आयोजन हुआ और गांव वालों को लगभग 24 प्रतिशत यानि तकरीबन 23 क्विंटल/हैक्टर ज्यादा उपज मिली।

किसानों से विचार-विमर्श के दौरान यह मालूम हुआ कि उन्हें बेमौसमी सब्जी उत्पादन के सम्बन्ध में कोई भी ज्ञान नहीं है जबकि भौगोलिक स्थिति के अनुसार इस इलाके में बेमौसमी सब्जियां उगाई जा सकती हैं। वैज्ञानिकों द्वारा बेमौसमी सब्जी उत्पादन से होने वाले लाभ के बारे में जानकारी पाकर सोनधार गांव के कृषकों में भी इस कार्य को शुरू करने की जिज्ञासा जगी। कृषकों का उत्साह देखकर केवीके के वैज्ञानिकों ने गांव में बेमौसमी सब्जियों का कार्यक्रम शुरू करने का निश्चय किया।

इसके तहत 28 किसानों को कृषकों को सही पौधाशाला डालने की तकनीक सिखाई गई। साथ ही वर्मीकम्पोस्ट और गोबर की खाद के वैज्ञानिक प्रयोग सिखाए गए। इसके अतिरिक्त सब्जियों की नर्सरी (पत्तागोभी-प्रजाति चैलंजर एवं टमाटर प्रजाति-मनीषा) डलवाई गई। यह कार्य श्रीमती पार्वती देवी के खेत पर किया गया। कृषकों को पंक्तिबद्ध तरीके से नर्सरी लगाने का प्रशिक्षण भी दिया गया। कृषकों ने चूल्हे की राख से बीज धन किया।

बीज की बुआई के उपरांत पौधशाला की क्यारियों को चीड़ की पत्तियों से ढक दिया गया। इस प्रकार कृषकों को चीड़ की पत्तियों को मल्च के रूप में प्रयोग करना भी सिखाया गया। नियमित समय पर सिंचाई की गई एवं खरपतवारों को हाथ से ही उखाड़ा गया। तकरीबन एक माह बाद फिर पौध रोपण किया गया। जिसमें कृषकों को पौध रोपण की जानकारी दी गई। लगभग दो महीने बाद जब पत्तागोभी करीब एक किलो की हो गई तब तुड़ाई प्रारम्भ हुई। रुक्मिणी देवी को पत्तागोभी के 100 पौध दिए गए थे जो उन्होंने 25 वर्गमीटर भूमि पर लगाए। इस प्रकार रुक्मिणी देवी को पत्तागोभी उत्पादन हेतु रू. 25.50 का खर्चा उठाना पड़ा। 100 पौध से उन्हें 70 कि.ग्रा. पत्तागोभी की उपज मिली। इसमें से 60 कि.ग्रा. उन्होंने 10 रु./ कि.ग्रा. की दर से बेची जिससे उन्हें 600.00 रुपए की आय हुई। इस धनराशि से यदि व्यय का खर्चा निकाला जाए तो उन्हें रु. 537.50 का शुद्ध लाभ हुआ जो की उनके व्यय का 8 गुना है।

इन सारी प्रक्रियाओं को करने के बाद रुक्मिणी देवी को 70 कि.ग्रा. उपज प्राप्त हुई जबकि परंपरागत तरह से खेती करने वाले अन्य ग्राम वासियों को 100 पौध से औसतन 28 कि.ग्रा. पत्तागोभी की उपज मिली । इस प्रकार रुक्मिणी देवी को 240 क्विंटल/हैक्टर गोभी की उपज प्राप्त हुई। रुक्मिणी देवी का कहना है कि जीवन में प्रथम बार उन्होंने सब्जी उत्पादन से पैसा कमाया है। जब उनकी जैसी वृद्ध महिला सब्जी उत्पादन से इतना लाभ उठा सकती है तो क्षेत्र के युवा कृषकों के लिए यह मिसाल क्यों नहीं हो सकता ?

स्रोत: मास मीडिया मोबलाइजेशन सब-प्रोजेक्ट, एनएआईपी, दीपा और जी. बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर