चौलाई की पोषकता पर जागरुकता कार्यक्रम

13 जुलाई, 2016, मैसूर

भाकृअनुप एनबीपीजीआर, संभावित फसलों के लिए अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान नेटवर्क, नई दिल्ली   द्वारा वित्त पोषित जनजातीय उपयोजना के माध्यम से पिछले पांच वर्षों से आदिवासी कृषि प्रणाली में चौलाई अनाज की खेती को पुनः चलन में लाने के लिए प्रयास किये जा रहे हैं।

इस पहल के तहत दो गांवों के 350 आदिवासी किसानों के लिए जागरुकता कार्यक्रम पोन्नाटी (मैसूर से 120 कि.मी. दूर) कोनानाकेरे (मैसूर से 100 कि.मी. दूर) गांवों में आयोजित किया गया।  

Awareness Programme on Nutritional Importance of Grain Amaranth Awareness Programme on Nutritional Importance of Grain Amaranth Awareness Programme on Nutritional Importance of Grain Amaranth

डॉ. निरंजन मूर्ति, प्रोफेसर एवं योजना प्रमुख और डॉ. अरूण कुमार, जे.एस. सस्य कृषि वैज्ञानिक, संभावित फसलों पर एआईसीआरए, कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, बेंगलूरू के द्वारा गिरीजन आश्रम विद्यालय में कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में जनजातीय उपयोजना के तहत वैज्ञानिकों व प्रोफेसरों द्वारा चौलाई की पोषकता, खेती तथा मूल्य संवर्धित चौलाई की निर्माण विधि व उपयोग से संबंधित व्याख्यान दिये गये। 

कार्यक्रम में किसानों के लिए चौलाई के बीज, चौलाई के लड्डू और भुने हुए दाने की प्रदर्शनी आयोजित की गई। इसके साथ ही सभी किसानों को संवर्धित चौलाई किस्मों जैसे, सुवर्ण तथा केबीजीए-1 के बीज वितरित किये गये।  

नालरोड, यारामबाड़ी, सुरेकोबे, के.एस. डोड्डी और निकुंडी आदि जनजातीय गांवों के दौरे भी किए गए। ये गांव सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं जिन्हें पोषण व अन्य सहयोग की आवश्यकता है।

कर्नाटक के चामराजनगर जिले में आदिवासी किसानों की काफी संख्या है, इसका कोल्लेगल तालुका आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा हुआ है। जिले के विभिन्न आदिवासी गांवों में बाजरे और मक्के की खेती प्रमुख रूप से की जाती है।

चौलाई पोषण की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण अनाज है। इसकी खेती पहले आदिवासी किसानों द्वारा की जाती थी इसकी जोत कम होती जा रही है। स्थानीय आदिवासी किसान चौलाई को ‘हेड्डा’ या ‘कीरा’ कहते हैं और शहद के साथ इसके भुने हुए दाने को खाते हैं। इसे पोषण से भरपूर और भूख को कम करने वाला अनाज माना जाता है।   

(स्रोतः संभावित फसलों पर एआईसीआरएन, जीकेवीके, बेंगलूरू)