धान झुलसा फफूंद जीनोम को भारतीय वैज्ञानिकों ने डीकोड किया

भारत की सबसे महत्वपूर्ण खाद्य पोषण फसल चावल है। विश्वभर में 2.7 अरब लोग इससे पेट भरते हैं। अच्छी प्रबंधन क्रियाओं के बावजूद चावल की फसल राइस ब्लास्ट (झुलसा) रोग से बुरी तरह प्रभावित है। यह रोग मैग्नपोर्थे ओरिजेई नामक फफूंद से होता है और यह पौधे के लगभग सभी भागों को क्षति पहुंचाता है किन्तु खासतौर से पौध और पुष्पगुच्छ को प्रभावित करता है (चित्र 1)। भारत में यह रोग चावल उत्पादक प्रत्येक स्थान पर पाया जाता है किन्तु रात में उच्च आर्द्रता और कम तापमान वाले स्थानों पर अत्यधिक पाया जाता है। इस महामारी के कारण प्रति वर्ष 75 प्रतिशत से अधिक फसल हानि होती है। प्रतिरोधी फसल किस्मों के प्रयोग द्वारा इस रोग का प्रबंधन किया जाता है। हालांकि प्रतिरोधी किस्मों का विकास झुलसा फफूंद की विविधता पर निर्भर करता है।

ICAR-NRCPB Scientists` Decoded   Rice Blast Fungus (Magnaporthe oryzae) GenomeICAR-NRCPB Scientists` Decoded   Rice Blast Fungus (Magnaporthe oryzae) GenomeICAR-NRCPB Scientists` Decoded   Rice Blast Fungus (Magnaporthe oryzae) Genome

भाकृअनुप-राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान केन्द्र (एनआरसीपीबी) के वैज्ञानिकों ने धान झुलसा फफूंद (मैग्नपोर्थे ओरिजेई) जीनोम को डिकोड कर लिया है। एनआरसीपीबी में पिछले 16 वर्षों से धान- मैग्नपोर्थे पद्धति पर लगातार काम चल रहा है। pi54, pi54rh और pi5of किस्मों और वन्य किस्मों झुलसा प्रतिरोधिता जीन का क्लोन तैयार करके उसका लक्षण वर्णन किया गया है। इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय धान जीनोम अनुक्रमण परियोजना के साथ मिलकर धान जीनोम डिकोडिंग में भी भाग लिया है। इसके बावजूद भी भारत में पाया जाने वाला प्रमुख धान झुलसा रोगजनक जीनोम संरचना की अधिक जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी।

एम ओरिजेई जीनोम के आकार में ˜38 मिलियन आधारीय जोड़े 6 क्रोमोसोम में पाये जाते हैं। भारत में मौजूद एम ओरिजेई का एक प्रमुख प्रभेद जीनोम अनुक्रमण में डिकोडिंग के लिए प्रयोग किया गया। इसका उद्देष्य परपोषी-रोगजनक अनुक्रिया के समय परपोषी को प्रतिरोधिता प्रदान करने में फफूंद अविषालुता जीन की पहचान करना था। डॉ. टी.आर. शर्मा, प्रमुख अन्वेशक एवं निदेशक, एनआरसीपीबी की अध्यक्षता में वैज्ञानिक दल ने एम ओरजई के अविशालु प्रभेद RML-29 का संपूर्ण अनुक्रमण की डिकोडिंग में नेक्स्ट जेनरेशन सीक्विेंसिंग का प्रयोग किया और इस रोगजनक में 1144 प्रोटीन कोडिंग जीन का अनुमान लगाया। इसका परिणाम अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिका फ्रन्टिर्यस इन प्लांट साइंसेज में अगस्त 2016 को प्रकाषित हो चुका है और

http://journal.frontiersin.org/article/10.3389/fpls.2016.01140/full वेबसाइट पर मुफ्त उपलब्ध है। डॉ. शर्मा और वैज्ञानिक दल ने बताया कि इन्होंने फफूंद से AVrpi54 जीन की पहचान हेतु नये संगणक और आणविक जीवविज्ञान विधियों का प्रयोग किया है। यह पोषी जीन pi54 से अंतक्रिया करता है जिससे धान झुलसा से प्रतिरोधिता मिलती है (चित्र 2)। किसी पादप रोगजनक से जीन की पहचान और क्लोन अविषालु तैयार करने में पहली बार इस तकनीक का प्रयोग किया गया है। इस अध्ययन में प्रयोग की गई नई विधि से किसी अविषालु जीन की पहचान करने में समय और मेहनत की बचत होती है और क्लोनिंग तकनीक में इसका लाभकारी प्रयोग हो सकता है। । AVrpi54 जीन की पहचान और क्लोनिंग पोषी-रोगजनक अंतःक्रिया को समझने में सहायक साबित होगी। चूंकि AVrpi54 जीन का क्लोन तैयार हो चुका है और एनआरसीपीबी में इस पर काम हो रहा है, इसलिए AVrpi54 जीन और pi54 जीन का धान झुलसा रोगजनक की बहुप्रतिरोधिता के लिए प्रयोग किया जा सकता है।