एकीकृत जैविक खेती प्रणाली में अनुसंधान योग्य मुद्दों पर गोलमेज चर्चा

17 अगस्त 2016, मोदीपुरम

भाकृअनुप- भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम द्वारा एकीकृत जैविक खेती प्रणाली (आईओएफएस) में अनुसंधान योग्य मुद्दों पर गोलमेज चर्चा का आयोजन 17 अगस्त, 2016 को किया गया।

Round table discussion on researchable issues in Integrated Organic Farming Systems Round table discussion on researchable issues in Integrated Organic Farming Systems

प्रो. एम. प्रेमजीत सिंह, कुलपति, केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, इम्फाल ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की एवं अपने संबोधन में कहा कि पारिस्थितिकी संतुलन मानव व पशुधन समेत सतत कृषि उत्पादन और मृदा स्वास्थ्य पर आधारित है। उन्होंने यह भी कहा कि खेती प्रणाली परिप्रेक्ष्य में जैविक खेती को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

डॉ. एस. भास्कर, सहायक महानिदेशक (कृषि विज्ञान, कृषि वानिकी और जलवायु परिवर्तन), भाकृअनुप, नई दिल्ली, उपाध्यक्ष ने कहा कि बाहरी जैविक आदानों को घटाने की आवश्यकता है जिससे जैविक खेती को लागत प्रभावी और टिकाऊ बनाया जा सके।

डॉ. ए.एस. पंवार, निदेशक, भाकृअनुप-आईएफएसआर ने आईओएफएस में अनुसंधान योग्य विषयों को रेखांकित किया और कहा कि अल्प या शून्य बाहरी आदानों पर आधारित जैविक खेती इस प्रणाली में लाभ एवं किसानों की आय वृद्धि के लिए आवश्यक है।

डॉ. ए. पात्रा, निदेशक, आईसीएआर-आईआईएसएस, भोपाल एवं डॉ. हिमांशु पाठक, निदेशक, आईसीएआर-एनआरआरआई, कटक, एआईसीआरपी पर आईएफएस केन्द्रों के प्रमुख, पशु ऊर्जा उपयोग परियोजना सह-समन्वयकों, जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण तथा एसटीसीआर के साथ ही भारत के सभी कृषि जलवायु क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व करने वाले निरीक्षकों ने इस गोलमेज चर्चा में भाग लिया। इसके साथ ही आईओएफएस पर अनुसंधान योग्य विषयों को चिन्हित करने के लिए विचार-मंथन भी किया गया।

आईओएफएस पर चिन्हित अनुसंधान योग्य विषय

  • विकास और फसलों की स्क्रीनिंग (एस)/ मृदा-पशुधन-मानव की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक बेहतर बायोमास और जैविक खेती के तहत खाद्य-चारा फसलों की पहचान आवश्यक है।
  • स्थानीय तौर पर उपलब्ध जैविक समूहों / किसानों की सर्वोत्तम प्रथाएं जिसमें पोषक तत्व, कीट, रोग और खरपतवार प्रबंधनों का दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए जिसे परिष्कृत कर आईओएफएस में एकीकृत किया जा सके ताकि बाहरी आदानों को कम किया जा सके।
  • भूमि विन्यास आधारित जल संरक्षण, अपशिष्ट प्रयोग और वैकल्पिक पुनर्चक्रण जैसी पर्यावरण अनुकूल संरक्षण प्रथाओं को प्राथमिकता दिए जाने की आवश्यकता है।
  • लंबे समय तक पारिस्थितिक अध्ययन वाले स्थलों को सभी कृषि जलवायु क्षेत्रों में स्थापित किए जाने की जरूरत है जिससे मिट्टी, पशुधन, मानव, समाज और पर्यावरण पर जैविक खेती की प्रथाओं की लंबी अवधि के प्रभाव का आकलन में सहयोग प्राप्त हो।
  • स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हरी / हरे पत्ते / कीट से बचाने वाली क्रीम / औषधीय जड़ी बूटियों / देसी कीड़े के सम्मिश्रण के माध्यम से पोषक तत्व समृद्ध / कीट रोधी खाद एवं तरल उत्पादों का विकास।
  • जैविक खेती पशुधन के बिना अधूरी है आईओएफएस के तहत पशु ऊर्जा के उपयोग के लिए उन्नत उपकरण, घरेलू ऊर्जा की आवश्यकताओं के लिए बायोगैस तथा खेत अनुसंधान आवश्यक हैं। आईओएफएस पर किसानों की अनुसंधान भागीदारी पर बल के साथ ही टिकाऊ जैविक खेती के लिए खाद्य व चारा फसलों को आईओएफएस में शामिल करने की आवश्यकता है।

(स्रोत: आईसीएआर- आईआईएफएसआर, मोदीपुरम)