जल के विभिन्न प्रयोग से पूर्वी भारत के चौर में आय का सृजन

Kaincha chaur-Project Areaबाढ़ से प्रभावित समतल नम क्षेत्र चौर में पानी का विभिन्न तरीके से उपयोग कर एकीकृत खेती के हस्तक्षेप से धान, मछली तथा अन्य खाद्यान्न जैसे गेहूं, सरसों तथा तम्बाकू की पैदावार बढ़ाई गई । यह प्रयोग वर्ष 2008-10 में बिहार के वैशाली जिले के जनाधा ब्लॉक में छोटे किसानों की आजीविका को बेहतर करने के उद्देश्य से एफपीएआरपी के अंतर्गत जल संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रायोजित किया गया। इस प्रयोग के अंतर्गत जितनी भी तकनीकों को अपनाया गया उसमें प्रमुख तकनीक एक्वाकल्चर है। इस तकनीक के माध्यम से बाढ़ के अतिरिक्त पानी का खेतों में विभिन्न प्रकार से उपयोग कर उत्पादकता बढ़ाने, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने, स्वास्थ्य तथा पर्यावरण में सुधार लाने की दिशा में उपयोग किया गया, जिससे गरीब किसानों की आजीविका में सुधार किया जा सके।

इस प्रयोग से पूर्व यहां के किसान परम्परागत तरीके से मुख्यतः धान (औसतन 2.0 टन/हैक्टर), गेहूं (औसतन 2.5 टन/ हैक्टर) तथा मक्का ( औसतन 3.0 टन/हैक्टर) की पैदावार करते थे। इस कारण यहां के किसानों के अतिरिक्त आय का स्रोत अत्यंत सीमित था। चैर का एक कमजोर पक्ष यह भी था कि यहां के अधिकांश क्षेत्र में सामान्यतः वर्षा ऋतु में एक फसल की पैदावार की जाती थी जबकि सूखे की स्थिति में एक से अधिक फसलें उगायी जाती थीं। इन सारी बातों को देखते हुए तथा यहां के किसानों को लाभान्वित करने व बाढ़ के पानी का समुचित उपयोग के लिए पांच वैकल्पिक खेती की योजना बनाई गई जो कि पिंजड़ों में मछली पालन, पेन कल्चर के माध्यम से तराई क्षेत्रों में मछली पालन, जल भराव क्षेत्रों में धान व मछली की संयुक्त पैदावार, बागवानी के अंतर्गत तालाब में सब्जियों और पशुओं का संयुक्त उत्पादन और कम लागत वाली इको-हैचरी से मछली दाना उत्पादन हैं ताकि यहां के गरीब किसानों के सामाजिक-आर्थिक जीवन को सुधारा जा सके।

धान-मत्स्य उत्पादन में धान की उत्पादकता परम्परागत तरीके से की गई खेती की तुलना में दोगुनी हो गई, जो औसत रूप से होने वाली पैदावार 2.0 टन/हैक्टर से बढ़कर 4.0 टन/हैक्टर दर्ज की गई। इसी प्रकार तालाब में लौकी की पैदावार के माध्यम से किसानों ने 20.0 टन/हैक्टर अतिरिक्त सब्जी का उत्पादन कर 1,00,000 रु./हैक्टर की आय प्राप्त की। इसके अलावा परम्परागत तरीके से की जा रही मछली की पैदावार 2.0 टन/हैक्टर की तुलना में तालाब के माध्यम से 3.6 टन/हैक्टर की वृद्धि हुई, जिससे 1,50,000 रु./हैक्टर की अतिरिक्त आय प्राप्त हुई। इसी तरह से बत्तखों के एकीकरण के द्वारा उत्पादित अंडों से 2,62,800रु./हैक्टर की अतिरिक्त आय मिली।

इको-हैचरी के माध्यम से दस दिनों में हुए मत्स्य बीजों के उत्पादन ने न केवल किसानों को मत्स्य बीज की उपलब्धता सुनिश्चित की बल्कि इससे 80 लाख मत्स्य बीजों के लाभ के साथ-साथ 80000 रुपए की आय भी प्राप्त हुई। इन लाभों से किसान काफी उत्साहित हुए।

Commercial-fish hatcheryश्री त्रिपुरारि चौधरी एक स्नातक और प्रगतिशील किसान हैं और जो 12 एकड़ भूमि के मालिक हैं, की जमीन को वैज्ञानिकों की देख रेख में इस प्रयोग के लिए चुना गया। प्रयोग में श्री चौधरी के अलावा गांव के अन्य किसान भी शामिल हुए। श्री चौधरी को अपनी भूमि पर विभिन्न फसलों की पैदावार कर लगभग 2 लाख रुपए तथा मत्स्य पालन कर लगभग 50 हजार रुपए की वार्षिक आय प्राप्त होती थी, परंतु इस प्रयोग के बाद उन्हें अपनी आय में दो लाख रुपए/वर्ष की अतिरिक्त आय प्राप्त हुई। इस प्रयोग का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि इसके खत्म होने तक किसानों ने एक व्यावसायिक फिश हैचरी स्थापित करने की दिशा में अग्रसर हुए, जिसके लिए तकनीकी जानकारी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-अनुसंधान परिसर पूर्वी क्षेत्र, पटना के वैज्ञानिकों द्वारा प्रदान किया गया। इस कार्य में अन्य संस्थाओं जैसे केंद्रीय ताजा जल जीव पालन संस्थान, भुवनेश्वर, मत्स्य विभाग, बिहार और ओरिएंटल बैंक आफ कामर्स, हाजीपुर, वैशाली ने भी सहयोग प्रदान किया। अंततः वह मत्स्य बीज उत्पादन के लिए एक व्यावसायिक हैचरी विकसित करने में सफल रहे, जिसकी क्षमता जानधा, वैशाली, बिहार में 40 लाख अंडे का जन्म प्रति दिन है। इस सफलता से उत्साहित होकर अनेक किसानों द्वारा इस तकनीक को अपनाया जा रहा है। इसके माध्यम से वह जल का विभिन्न प्रयोग कर लाभ कमाने की दिशा में सदैव आगे की ओर बढ़ रहे हैं।

(स्रोत: एनएआईपी सब-प्रोजेक्ट मास मीडिया मोबिलाइजेशन, डीकेएमए और आईसीएआर अनुसंधान परिसर पूर्वी क्षेत्र, पटना)