चौथी अंतर्राष्ट्रीय सस्य विज्ञान कांग्रेस का उद्घाटन

22 नवंबर 2016, नई दिल्ली

भारतीय सस्य विज्ञान सोसाइटी द्वारा चौथी अंतर्राष्ट्रीय सस्य विज्ञान कांग्रेस का 22 नवम्बर, 2016 को उद्घाटन किया गया।

डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। अपने संबोधन में उन्होंने खाद्य उत्पादन प्रणाली के लिए संसाधनों के उचित प्रयोग, संरक्षण, पोषण तथा उत्पाद आधारित उचित रणनिति निर्माण पर बल दिया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सस्स वैज्ञानिक बेहतर सस्य विज्ञान प्रबंधन नियमों के माध्यम से किसी भी किस्म के संभावित उत्पाद के बारे में जान सकता है। डॉ. स्वामीनाथन ने उदाहरण देकर बताया कि उत्तर भारत में फसल अवशेष को जलाना संसाधन को नष्ट करने का एक उदाहरण है जिसका भरपूर उपयोग प्रबंधन विधियों द्वारा किया जा सकता है। उन्होंने समय की आवश्यकता के अनुरूप कार्य नियमों के पैकेज की अनुशंसा करने तथा तेजी से कार्य करन के लिए उपस्थित सभा से आग्रह किया।

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डॉ. त्रिलोचन महापात्र, सचिव, डेयर एवं महानिदेशक, भाकृअनुप; डॉ. आर.एस. परोदा, पूर्व सचिव, डेयर एवं महानिदेशक, भाकृअनुप; डॉ. जॉन डिक्सन, प्रधान सलाहकार, एसीआईएआर, केनबरा, ऑस्ट्रेलिया और डॉ. पॉल ई. फिक्सेन, अध्यक्ष, अमेरिकन सोसाइटी ऑफ एग्रोनॉमी शुरूआती सत्र के सम्मानित अतिथि थे।

डॉ. त्रिलोचन महापात्र ने विश्व के विशेषज्ञों से आग्रह किया कि वे सततता के मानदंडों को परिभाषित करें तथा सततता सूचक पर कार्य करें जिससे विभिन्न परिस्थितियों के अनुरूप खेती प्रणालियों को जांचने में सुविधा हो। उन्होंने प्राकृति समानता की याद दिलाई तथा तथा कहा कि वैश्विक भूखमरी से सामना करने के उद्देश्य से विश्व के विशेषज्ञों को समग्र सोच के साथ अनुसंधान कार्य करना चाहिए। उन्होंने विश्व के कृषकों के लिए सिफारिशों के रूप में कुछ घोषणाएं करने के लिए सभा से आग्रह किया। डॉ. महापात्र बारानी परिस्थितियों के तहत नए पौध प्रकार और बारहमासी फसलों सहित बागवानी फसलों के कृषि विज्ञान पर बल दिया। उन्होंने यह आशा व्यक्त की कि संरक्षण सस्य विज्ञान तकनीकों की सहायता से पंजाब और हरियाणा में धान के फसल अवशेष जलाने के प्रभावी समाधान विकसित किए जाने चाहिए। डॉ. महापात्र ने विभिन्न क्षेत्रों में परीक्षण व जांच-परख के माध्यम से वैज्ञानिकों द्वारा अनुशंसित कृषि प्रौद्योगिकियों के मानकीकरण तथा संवर्धन की बात कही।

डॉ. जॉन डिक्सन ने अपने संबोधन में कृषि और उद्योग जगत के लिए जल संरक्षण तथा विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों के वैज्ञानिकों तथा कृषि वैज्ञानिकों के समन्वय की आवश्यकता की बात कही। डॉ. फिक्सेन नेकृषि विज्ञान अनुसंधान और खाद्य उत्पादन प्रणाली के मूल स्तर तक पहुंचने की आवश्यकता के लक्ष्यों को एक समान बताया। उनके अनुसार भारत और अमेरिका को कृषि के क्षेत्र में कई आम समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिसके सामाजिक-आर्थिक स्तर तथा मानदंड अलग हो सकते हैं।

डॉ. पॉल फिक्सेन ने कृषिविज्ञान और कृषक समुदाय की समस्याओं को सुलझाने के लिए विकसित प्रौद्योगिकियों के प्रयोग में गुणवत्तापूर्ण विज्ञान पर जोर दिया।

डॉ. आर.एस. परोदा ने भारतीय कृषि के लचीलेपन की सराहना की और पौधों के साथ-साथ लोगों के पोषण के लिए संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता को एक साथ जोड़ा। इसके साथ ही उन्होंने छोटे खेतों के मशीनीकरण एवं फसल अनुसंधान पर केन्द्रित करने की बजाय खेती प्रणाली की तरफ उन्मुख होने की आवश्यकता तथा संरक्षण कृषि के क्षेत्र में नवाचार पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा।

डॉ. गुरुबचन सिंह, अध्यक्ष, एएसआरबी, भाकृअनुप एवं अध्यक्ष, भारतीय सस्य विज्ञान सोसाइटी ने अपने स्वागत भाषण में सभा को सम्मेलन के विषय से परिचित कराया। उन्होंने कहा कि विकासशील अर्थव्यवस्था वाले देशों में सबसे बड़ी समस्या आजीविका के तौर पर लोगों का कृषि से मोहभंग होना है। उन्होंने चार विशेष सत्रों के बारे में जानकारी दी जिनमें से दो युवाओं एवं कृषि तथा मुद्दों का समाधान करने के लिए किसानों की आय वृद्धि से संबंधित थे।

डॉ. रविन्दर कौर, निदेशक, आईसीएआर- आईएआरआई ने अपने संबोधन में कहा कि विश्व स्तर पर करीब 2 अरब हैक्टर कृषि क्षेत्रफल में हुई गिरावट को रोकने की आवश्यकता है तथा साथ ही गैर-कृषि उपयोग हेतु उपजाऊ भूमियों के अधिग्रहण पर पुनर्विचार की जरूरत है। प्राकृतिक संसाधनों में कटाव और अप्रत्याशित संचित अपरिवर्तनीय नुकसान की वेग प्रवृत्ति को विधिवत संबोधित करने की जरूरत है। उन्होंने कृषि और सहायक जीवमंडल के आधुनिक तथा सामंजस्यपूर्ण प्रबंधन पर बल दिया।

सम्मेलन में 20 देशों के 1000 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

(स्रोतः आईएआरआई, नई दिल्ली, मीडिया प्रकोष्ठ)