‘जलजीव पालन विविधीकरणः नीली क्रांति की राह’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

‘जलजीव पालन विविधीकरणः नीली क्रांति की राह’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन 1-3 दिसंबर, 2016 को भाकृअनुप – केन्द्रीय ताजा जलजीव पालन संस्थान (सीफा), भुबनेश्वर में किया गया।

‘जलजीव पालन विविधीकरणः नीली क्रांति की राह’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी‘जलजीव पालन विविधीकरणः नीली क्रांति की राह’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

डॉ. पी. जयशंकर, निदेशक, आईसीएआर – सीफा व संयोजक, एनएएसएडी- 2016 द्वारा भारतीय मेजर कार्प से परे सोचने का आह्वान किया गया तथा कहा कि अधिक प्रजातियां और प्रणालियां मछली उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के लिए सही उपाय हैं।

डॉ. एस.एन. पशुपालक, कुलपति, उड़ीसा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (ओयूएटी) ने अपने संबोधन में सुझाव दिया कि विविध प्रजातियों के गुणवत्तापूर्ण जीरे की उपलब्धता किसान को समृद्ध बनायेगी।

डॉ. के.के. विजयन, निदेशक, भाकृअनुप – केन्द्रीय खारा जलजीव पालन अनुसंधान संस्थान, चेन्नई ने सभी प्रतिभागियों से आग्रह किया कि वे सभी उपलब्ध प्रौद्योगिकियों की कमियों व मजबूतियों पर चर्चा करें तथा प्राथमिकता प्रदान करें।

डॉ. ए.के. सिंह, निदेशक, भाकृअनुप – शीत जलजीव पालन अनुसंधान निदेशालय, भीमताल, नैनीताल ने विदेशी प्रजातियों को जलजीव पालन से दूर रखने का सुझाव दिया।

डॉ. सी.एन. रविशंकर, निदेशक, भाकृअनुप – केन्द्रीय मात्स्यिकी प्रौद्योगिकी संस्थान, कोचीन, कोच्चि ने जलजीव पालन क्षेत्र की विभिन्न चुनौतियों पर बल दिया।

डॉ. बी.के. दास, सचिव, एओए एवं निदेशक, भाकृअनुप – केन्द्रीय अंतःस्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर ने जलशयों के चारों ओर दीवार बनाने तथा जलजीव पालन विविधीकरण से संबंधित सुझाव दिये।

डॉ. एस.डी. त्रिपाठी, पूर्व निदेशक, भाकृअनुप – केन्द्रीय मात्स्यिकी शिक्षा संस्थान, मुम्बई ने भारत में स्वतंत्रता के बाद जारी जलजीव पालन के क्षेत्र में अनुसंधान तथा विकास के शुरुआत की चर्चा की।

लगभग 180 प्रतिभागियों ने 5 उप-शीर्षकों के अंतर्गत, प्रजनन एवं जीरा उत्पादन; जलजीव पालन में नई अगेती किस्में; मत्स्य पोषण और कार्यिकी; जलजीव पालन में सामाजिक विज्ञान अनुसंधान; मत्स्य स्वास्थ्य प्रबंधन एवं जलजीव पर्यावरण प्रबंधन विषयों पर व्याख्यान प्रस्तुत किए गए।

(स्रोतः भाकृअनुप – केन्द्रीय ताजा जलजीव अनुसंधान संस्थान, भुबनेश्वर)