22 अक्टूबर, 2026, बैरकपुर
भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर ने आज पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना के बैरकपुर-II ब्लॉक के शेउली गांव में खेत बचाओ अभियान – रबी 2026 के उद्घाटन दिवस का आयोजन किया। यह कार्यक्रम सतत खेती को बढ़ावा देने, मृदा स्वास्थ्य में सुधार करने और उर्वरकों तथा अन्य कृषि आदानों के संतुलित एवं विवेकपूर्ण उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा शुरू किए गए राष्ट्रव्यापी अभियान के अनुरूप आयोजित किया गया।
इस पहल का उद्देश्य स्थानीय कृषि परिस्थितियों के अनुकूल वैज्ञानिक फसल एवं पोषक तत्व प्रबंधन, संसाधनों के कुशल उपयोग और पर्यावरण की दृष्टि से जिम्मेदार कृषि पद्धतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाना था।
बैरकपुर-II ब्लॉक में फूलगोभी, पत्तागोभी, प्याज, टमाटर और फलियों सहित सर्दियों की सब्जियों की व्यापक खेती होती है। सरसों एक महत्वपूर्ण रबी तिलहनी फसल है, जिसे अक्सर मिट्टी में बची हुई नमी का उपयोग करके उगाया जाता है, जबकि बोरो धान की खेती निचले और सिंचित क्षेत्रों में सतही एवं भूजल संसाधनों का उपयोग करके की जाती है। अभियान में प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए उत्पादकता को बनाए रखने के लिए स्थानीय रूप से उपयुक्त, संसाधन-कुशल कृषि पद्धतियों की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, ने किसानों के साथ संवाद किया और मृदा उर्वरता बनाए रखने तथा फसल उत्पादकता में सुधार के प्रमुख उपायों के रूप में मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रयोग, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन और फसल विविधीकरण पर जोर दिया। उन्होंने किसानों से उर्वरकों और कृषि रसायनों के अंधाधुंध उपयोग से बचने का आग्रह किया तथा पर्यावरण और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर उनके संभावित प्रतिकूल प्रभावों को रेखांकित किया।
वन हेल्थ दृष्टिकोण पर प्रकाश डालते हुए डॉ. डे ने मृदा, पौधों, पशुओं, जलीय और मानव स्वास्थ्य के परस्पर संबंध पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “अपने खेतों को बचाने का अर्थ उनसे जुड़े जलाशयों, आर्द्रभूमियों और नदियों को बचाना भी है। स्वस्थ मिट्टी स्वस्थ फसलों को सहारा देती है, जबकि स्वच्छ जल मछली उत्पादन, जैव विविधता और ग्रामीण आजीविका को बनाए रखता है। इसलिए खेत बचाओ अभियान पूरे कृषि और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा का एक प्रयास होना चाहिए।”
उन्होंने आगे बताया कि उर्वरकों और कृषि रसायनों के अत्यधिक उपयोग से पोषक तत्वों का अपवाह और तालाबों, आर्द्रभूमियों, नदियों तथा अन्य अंतर्स्थलीय जल निकायों का संदूषण हो सकता है, जिससे जल की गुणवत्ता, मछली उत्पादन, जलीय जैव विविधता और अंततः मानव कल्याण प्रभावित होता है। उन्होंने कृषि उत्पादकता, पर्यावरणीय गुणवत्ता और सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा करने वाले एकीकृत दृष्टिकोण को अपनाने के महत्व को रेखांकित किया। अंतर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान और विकास के लिए समर्पित संस्थान के रूप में आईसीएआर-सीआईएफआरआई ने सतत कृषि को जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण से जोड़ने के महत्व की पुनः पुष्टि की।
मृदा और जल संसाधनों के संरक्षण में पर्यावरण की दृष्टि से जिम्मेदार खेती के महत्व पर प्रकाश डाला गया। सतत पोषक तत्व प्रबंधन और उन्नत कृषि पद्धतियों के दीर्घकालिक लाभों के बारे में किसानों की जागरूकता को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।

अभियान मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रयोग, फसल विविधीकरण, धान परती भूमि का कुशल उपयोग, फसल अवशेष प्रबंधन, एकीकृत कीट प्रबंधन और जलवायु-अनुकूल कृषि सहित सतत कृषि हस्तक्षेपों की एक श्रृंखला को बढ़ावा देता है।
अन्य प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में रबी तिलहन और दलहनों की खेती, प्राकृतिक खेती, जैविक और जैव-आधारित आदानों का उपयोग, कुशल जल प्रबंधन, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण शामिल हैं। क्षमता निर्माण, कृषि मशीनीकरण और उन्नत एवं पुनर्योजी कृषि प्रौद्योगिकियों के प्रक्षेत्र प्रदर्शनों से भी सतत पद्धतियों को व्यापक रूप से अपनाने में सुविधा मिलने की उम्मीद है।
कार्यक्रम ने मृदा और जल संसाधनों के संरक्षण के माध्यम से सतत कृषि–मात्स्यिकी संबंधों और जलवायु-अनुकूल ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने की भाकृअनुप-सीआईएफआरआई की प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि की। कृषि आदानों के जिम्मेदार उपयोग को प्रोत्साहित करने और वन हेल्थ दृष्टिकोण को अपनाने के माध्यम से इस पहल का उद्देश्य उत्पादक खेतों, स्वस्थ जल निकायों और कृषक एवं मछुआरा समुदायों के लिए सतत आजीविका का समर्थन करते हुए परस्पर जुड़े कृषि और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करना है।
शेउली और निकटवर्ती तेलियापारा गांवों के कुल 55 किसानों ने कार्यक्रम में भाग लिया।
(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर)








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