डेयरी में उद्यमिता के मामले में महिला स्वयं सहायता समूह सबसे आगे

घरेलू कामों में मुख्य योगदान देने और डेयरी खेती गतिविधियों में अग्रणी भूमिका निभाने के बावजूद भारत में 70 मिलियन कृषि परिवारों के लिए आजीविका के प्रमुख विकल्पों में से एक, महिलाओं को अपने परिवार और समाज से समर्थन और प्रोत्साहन की कमी है। इसके अलावा अल्प वित्तीय संसाधन उनके सहभागी निर्णय को लगभग असंभव बना देते हैं। लेकिन, शिक्षा और प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए पर्याप्त रूप से प्रेरणा और प्रोत्साहन उन्हें आय सृजन गतिविधियों को करने और अपनी आत्मनिर्भरता का प्रदर्शन करने में मदद करने के साथ ही उन्हें सक्षम बना सकता है।

Women Self Help Groups at the Forefront of Entrepreneurship in Dairying  Women Self Help Groups at the Forefront of Entrepreneurship in Dairying

भाकृअनुप-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल, हरियाणा द्वारा संचालित “डेयरी आधारित माध्यमिक कृषि के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं की आजीविका में सुधार” नामक परियोजना के माध्यम से डेयरी आधारित आजीविका विकल्पों के लिए ग्रामीण महिलाओं को संवेदनशील और प्रेरित करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। ऐसे में हरियाणा की महिलाओं ने अपने आस-पास के क्षेत्र में स्वयं सहायता समूहों (स्वयं सहायता समूहों) का गठन करके डेयरी आधारित आजीविका गतिविधियों का अभ्यास किया। इस पहल ने महिलाओं को अपने परिवारों के लिए अतिरिक्त आय अर्जित करने का अवसर प्रदान करने के साथ-साथ अपने समाज में सम्मानजनक दर्जा अर्जित करने में मदद की है। 2017-2020 के दौरान विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार द्वारा वित्तपोषित परियोजना का उद्देश्य डेयरी के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं का सामाजिक-आर्थिक विकास करना व उन्हें स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) बनाकर डेयरी आधारित आजीविका गतिविधियों पर अपने खाली समय का उपयोग करने के लिए प्रेरित करता है।

प्रत्येक समूह के लगभग दो से तीन सदस्य दूध संग्रहण का काम करते हैं। उनमें से एक बराबर संख्या में उत्पाद बनाते और पैकेजिंग करते हैं। एक विपणन के लिए तो दूसरा खातों के रख-रखाव के लिए काम करते हैं। इस तरह प्रत्येक सदस्य गतिविधियों को अंजाम देने के लिए एक दिन में 2 से 3 घंटे कार्य करते हैं। यह 4 से 8 महिला सदस्यों के साथ एक समूह की सुविधा प्रदान करता है ताकि वे अपने परिवारों के लिए अतिरिक्त आय अर्जित करते हुए आसानी से डेयरी आधारित उद्यमशीलता उद्यम अपना सकें।

महिलाओं को दूध आधारित उत्पादों की तैयारी पर प्रशिक्षण और प्रदर्शन प्रदान किया जाता है। मूल्य वर्धित डेयरी उत्पादों पर 27 गाँवों की 635 ग्रामीण महिलाओं को शामिल करते हुए लगभग 50 प्रशिक्षणों का आयोजन किया गया। प्रशिक्षण कार्यक्रमों को भारतीय राष्ट्रीय कौशल परिषद द्वारा निर्धारित राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क (एनएसक्यूएफ) के अनुसार तैयार किया गया था।

भाकृअनुप-एनडीआरआई, करनाल, हरियाणा ने अपनी महिला सशक्तिकरण लैब में ऑन कैंपस ट्रेनिंग का आयोजन किया। अधिकतम महिलाओं को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से संस्थान ने चयनित गाँवों में प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जिनमें हरियाणा के तीन जिलों (करनाल - 7, पानीपत - 2 और सोनीपत - 1) ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। अपने उद्यम के शुरुआती चरण में ही ज्यादातर समूहों ने 5,000 रुपए से लेकर 20,000 रुपए प्रति समूह तक अतिरिक्त आय अर्जित करना शुरू कर दिया है। इससे उपभोक्ताओं को अच्छी गुणवत्ता के मिलावटरहित और स्वस्थ डेयरी उत्पादों की उपलब्धता को बढ़ावा देने में भी मदद मिली है।

समूह अब अपने उत्पादों को अन्य पारिवारिक कार्यों, सरकारी मेलों, आयोजनों और विवाह के दौरान आस-पास के क्षेत्रों में बेच रहे हैं। मंगलोरा गाँव, करनाल जिले के श्री राम एसएचजी ने भारतीय स्टेट बैंक से डेयरी पशुओं की खरीद के लिए 10.5 लाख रुपए का ऋण लिया। नाबार्ड और राज्य लाइन विभागों द्वारा आयोजित मेलों के साथ-साथ यह समूह गाँव में भी दूध, पनीर, मट्ठा पेय और गुलाब जामुन बेचता है। करनाल जिले के दो समूह - शिवम एसएचजी, भरतपुर गाँव और संतोषी एसएचजी, हसनपुर गाँव क्रमशः अपने ही गाँवों में घी और खोआ बेच रहे हैं।

करनाल जिले की भारती एसएचजी ने सर्वश्रेष्ठ स्टॉल का पुरस्कार भी जीता और 22 नवंबर, 2019 से 10 दिसंबर, 2019 तक कुरुक्षेत्र में आयोजित अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव के सरस मेले में गुलाब जामुन बेचकर 35,000 रुपए कमाए जबकि, कुरुक्षेत्र में ही 27 से 29 जनवरी, 2020 तक आयोजित अंतरराष्ट्रीय सरस्वती महोत्सव में गुलाब जामुन बेचकर 70,000 रुपए कमाए।

संस्थान द्वारा 15 से 17 फरवरी, 2020 तक आयोजित राष्ट्रीय डेयरी मेले के दौरान दो महिला स्वयं सहायता समूहों-भारती एसएचजी, करनाल और सशक्त एसएचजी, सोनीपत ने भाग लिया और क्रमशः 10,000 रुपए का गुलाब जामुन एवं 15,000 रुपए का घी बेचकर अपने कौशल का प्रदर्शन किया। भारती एसएचजी ने पनीर बनाने की प्रतियोगिता में भी पहला स्थान हासिल किया।

पानीपत जिले के पट्टीकल्याणा गांव से आरज़ू एसएचजी के नाम से जाना जाने वाला एक समूह अब अपने ही गाँव में पनीर बेच रहा है। 5 जून, 2019 को घरौंडा ब्लॉक में आयोजित विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर 'हरियाणा विज्ञान मंच' की बैठक के दौरान, करनाल के डिंगर माजरा गाँव से लक्ष्मी एसएचजी के नाम से मशहूर एक अन्य समूह को भी गुलाब जामुन की सेवा करने का अवसर मिला।

स्वयं सहायता समूहों ने दिल्ली पब्लिक स्कूल, पानीपत रिफाइनरी में भी बिक्री के लिए अपने उत्पादों को प्रदर्शित किया। कोविड-19 के वर्तमान प्रकोप की आकस्मिकता देखकर कुछ स्वयं सहायता समूहों ने स्थानीय ग्रामीणों की मांग के अनुसार दुग्ध उत्पादों के साथ महिलाओं द्वारा तैयार किए गए फेस मास्क भी वितरित किए। अनुवर्ती प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करके और आगे बाजार गठजोड़ की सुविधा के द्वारा इन समूहों की निरंतरता सुनिश्चित की जाती है।

परियोजना दल ने समूह गठन, प्रेरणा, बाजार-संपर्क, बैंक-ऋण, सुविधाओं, मेलों और कार्यों के दौरान उत्पादों की बिक्री की व्यवस्था के लिए नाबार्ड, हरियाणा राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (एचएसआरएलएम), जन कल्याण समिति और शहीद वीरेंद्र सिंह स्मारक समिति की सेवाओं का उपयोग किया। समूह के सदस्यों की नियमित आय को सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार के परिसर में कैंटीन की सुविधा प्रदान करने की योजना भी बनाई जा रही है। ग्राहक वास्तविक डेयरी उत्पादों की आपूर्ति हेतु 10% से 20% अतिरिक्त मूल्य का भुगतान करने के लिए भी तैयार हैं।

इसने महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए उन्हें आत्मनिर्भर बनने और अपनी आजीविका कमाने में मदद की। इस प्रक्रिया ने प्रधानमंत्री द्वारा परिकल्पित स्थानीय के लिए स्वावलंबन (आत्म-निर्भरता) को बढ़ावा दिया।

(स्रोत: डीएसटी परियोजना दल, भाकृअनुप-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल, हरियाणा)