हरियाणा में एमजीएमजी कार्यक्रम के तहत मछली पालन में अपनाया गया प्राथमिक सहायता प्रदान करने का दृष्टिकोण

भारत सरकार के प्रमुख कार्यक्रम मेरा गाँव मेरा गौरव (एमजीएमजी) योजना के तहत अनावश्यक आदानों  को कम करने तथा कृषि आय को बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक तकनीकी जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से भाकृअनुप-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल, हरियाणा के वैज्ञानिकों की टीम ने जींद और करनाल जिले के 5 गाँवों के समूह को गोद लिया है। यह टीम संकटग्रस्त किसानों की आय में विविधता लाने के लिए मछली पालन को बढ़ावा दे रही है। धतराह, जींद में स्थित मछली फार्म लगभग 12.5 एकड़ के क्षेत्र में प्रभावी क्षेत्र के साथ 6, 4 और 2.5 एकड़ के तीन चौथाई क्षेत्र में फैला हुआ है। खेत में उगाई जाने वाली आम कार्प्स मछलियों के साथ-साथ इंडियन मेजर कार्प्स (आईएमसी), कैटला, रोहू और मृगल हैं। किसान ने 3 महीने के संग्रहण के बाद दो बीमारियों के प्रकोप की सूचना दी।

Hand Holding Approach in fish rearing under MGMG Programme in Haryana

पहले प्रकोप के दौरान मृत और रुग्ण मछली की मोरफोलॉजीकल (आकृति संबंधी) जाँच में बलगम और पीले गलफड़ों से ढँकी त्वचा का रंग दिखाई दिया। एंकर वर्म (लंगर कीड़ा), लर्नैड्स बाहरी शरीर की सतह और मछली के गलफड़ों पर दर्ज किया गया था। भूख न लगने की वजह से मछलियाँ दुर्बल हो गई थीं। किसान को एक सप्ताह के लिए पानी की सतह पर कई बार साइपरमेथ्रिन के अनुप्रयोग की सलाह दी गई थी। कुछ दिनों के उपचारोपरांत और आहार की वजह से मछलियों का वजन बढ़ा।

दूसरे प्रकोप के दौरान मछलियों के पंख, गलफड़ों और आंतरिक अंगों पर रक्तस्राव देखा गया। पानी की गुणवत्ता में समस्या के कारण मछलियों में तनाव और संक्रमण हुआ। लेकिन नैदानिक निदान ने पता लगाया कि एयरोमोनाड संभावित एटियोलॉजिकल एजेंट हो सकता है। मुख्य नियंत्रण उपाय एक सप्ताह में तीन बार तालाब पर CIFAX@0.1ppm से अधिक का अनुप्रयोग था, जिसमें रक्तस्रावी सेप्टिसीमिया से बरामद मछलियों के मृत्यु दर की जाँच की गई थी। मछलियों के बेहतर विकास के लिए एंटीबायोटिक्स और अन्य रसायनों का अनुप्रयोग किसानों के सामान्य व्यवहार में था, जो बिना किसी महत्त्वपूर्ण लाभ के पालन-पोषण की लागत को बढ़ाता था।

एमजीएमजी टीम के सलाहकारों की मदद से किसानों ने मासिक कृषि आदान लागत में 53 फीसद की कमी की जिसके फलस्वरूप उन्हें लाभ में उल्लेखनीय बढ़ोतरी मिली है। मछलियों के स्वास्थ्य में सुधार, मृत्यु दर में कमी और रसायनों एवं अन्य आदानों के अनावश्यक उपयोग से बचने हेतु पालन-पोषण की कम लागत को देखते हुए किसानों ने भाकृअनुप-सीएसएसआरआई के वैज्ञानिकों द्वारा प्रदान की गई सेवाओं का पूरी तरह समर्थन किया है। कृषि स्तर पर इस तरह के छोटे हस्तक्षेप 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने में मील का पत्थर साबित हो सकते हैं।

(स्रोत: भाकृअनुप-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल, हरियाणा)