ऑयल पाम की खेती से घटेगी आयात पर निर्भरता

Newspaper: Business Standard (Hindi)
Date: 6th November 2012
Edition: New Delhi

खाद्य तेल की मांग और देसी आपूर्ति के बीच भारी अंतर को कम करने का एक व्यावहारिक तरीका है ऑयल पाम की खेती को बढ़ावा देना। ऑयल पाम एक सदाबहार फसल है, जिससे उन फसलों के मुकाबले कहीं गुना ज्यादा तेल मिलता है, जिनकी खेती अभी की जा रही है। पिछले 25 साल के दौरान तिलहन पर कई तकनीकी परियोजनाओं के बावजूद देश में तिलहन का उत्पादन बढ़ती मांग के साथ तालमेल बिठाने में विफल रहा है। इससे भी खराब बात यह है कि आपूर्ति में तेजी से कमी आ रही है, जिससे भारी मात्रा में आयात करना अनिवार्य हो गया है और इस पर सालाना 40,000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए जाते हैं। 

ऑयल पाम की खेती को बढ़ावा देने के लिए पहले भी कई बार कोशिश की गई है लेकिन उनके परिणाम अपेक्षानुरूप नहीं रहे हैं। हालांकि इसकी खेती के लिए कुछ कॉर्पोरेट को चुनिंदा राज्यों में वन भूमि भी दी गई थी। अब पता चला है कि इस कोशिश के नाकाम होने की प्रमुख वजह थी उनका यह मानना कि पाम की फसल को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती है।

अन्य कुछ कारण थे प्रतिकूल वन्य कानून, तेल युक्त ताजे फलों का गुच्छा (एफएफबी) आने में लगने वाला तीन साल का समय, कृषि विज्ञान और प्रबंधन विशेषज्ञता की कमी, कीमतों पर प्रतिकूल नीतियां, वनस्पति तेल का आयात और पाम ऑयल निष्कर्षण एवं प्रसंस्करण उद्योग का धीमा विस्तार। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि कम उत्पादन और खराब प्रतिफल के कारण आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में ज्यादातर फसलों को उखाड़ दिया गया।

अच्छी बात है कि इन गलतियों से सबक सीखे गए हैं। ऑयल पाम की खेती को बढ़ावा देने के लिए एक बार फिर कोशिश की जा रही है। इस बार ऑयल पाम की खेती के लिए उन इलाकों का चयन किया जा रहा है, जहां इसकी खातिर सही कृषि हालात और पर्याप्त पानी उपलब्ध हो। आंध्र प्रदेश के पश्चिमी गोदावरी जिले के पेडावेगी नैशनल रिसर्च सेंटर फॉर ऑयल पाम के पूर्व निदेशक आर रत्नम की अगुआई में गठित समिति ने 18 राज्यों में 19.3 करोड़ हेक्टेयर जमीन की पहचान की है, जहां ऑयल पाम की खेती शुरू की जा सकती है। इनमें से ज्यादातर इलाके दक्षिणी और पूर्वी राज्यों में स्थित हैं।

हाल में जारी की गई अपनी रिपोर्ट में समिति ने कहा है कि कृषि-मौसमी हालात का सूक्ष्म विश्लेषण करने से ऑयल पाम की खेती के लिए ज्यादा योग्य इलाके ढूंढने में मदद मिल सकती है, खासतौर पर पूर्वोत्तर राज्यों में। फिलहाल ऑयल पाम की खेती ज्यादातर आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में की जाती है। अनुमान है कि देश भर में करीब 2 लाख हेक्टेयर भूमि पर ऑयल पाम की खेती होती है और इस बुआई क्षेत्र में करीब आधी हिस्सेदारी आंध्र प्रदेश की है।

गौरतलब है ऑयल पाम की खेती को बढ़ावा देने के लिए ये राज्य अब उनके यहां मौजूद सूखाग्रस्त इलाकों को विसार रहे हैं। समिति ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान कृषि भवन की प्रमुख कृषि विकास परियोजना राष्टï्रीय कृषि विकास योजना के तहत ऑयल पाम के बुआई क्षेत्र में सालाना 60,000 एकड़ के इजाफे का लक्ष्य हासिल करने के लिए खाका भी सुझाया है। समिति ने उम्मीद जताई है कि नकदी की उपलब्धता बेहतर होने के साथ ही इस लक्ष्य को बढ़ाया जा सकता है। नई फसल के लिए रोपण उत्पादों की जरूरत को पूरा करने के लिए 20 हेक्टेयर भूमि क्षेत्र में फैले कम से कम छह और बीज उद्यानों की दरकार होगी। इन्हें सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत स्थापित किया जा सकता है।

हालांकि सीमित मात्रा में पाम के बीजों की आपूर्ति तो भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के ऑयल पाम शोध निदेशालय द्वारा की जा सकती है लेकिन इतने बड़े पैमाने पर शुरुआती खेती के लिए बीजों की जरूरत पूरी करने की खातिर आयात करना ही पड़ेगा। प्रस्तावित बीज उद्यानों को बीज आपूर्ति करने में सक्षम होने के लिए कम से कम आठ साल का समय लगेगा।

नीतिगत मोर्चे पर सबसे बड़ी जरूरत है देश में ही उत्पादित एफएफबी के लिए लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करना, जिससे किसान व अन्य लोगों को इस क्षेत्र में कदम रखने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। तेल निष्कर्षण एवं प्रसंस्करण इकाइयों में निवेश आकर्षित करने के लिए भी यह बेहद जरूरी है। दरअसल कटाई के बाद ऑयल पाम के एफएफबी जल्दी खराब हो जाते हैं, जिससे लंबे समय तक इनका भंडारण नहीं किया जा सकता। ऐसे में इनकी कटाई से पहले यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है कि तेल निष्कर्षण और प्रसंस्करण इकाइयां पर्याप्त मात्रा में मौजूद हों।

आयात पर निर्भरता घटाने और देसी उत्पादन को बढ़ावा देने की खातिर वनस्पति तेल आयात नीति के अलावा खासतौर पर आयात शुल्क में संशोधन करने की दरकार होगी। जरूरत है कॉफी, चाय और रबर खेती की ही तर्ज पर ऑयल पाम खेतों को भी भूमि चकबंदी कानून के बाहर रखने की घोषणा करने की। जब तक इनका समाधान नहीं निकाला जाता, तब तक ऑयल पाम खेती को प्रोत्साहन नहीं मिल सकेगा और यह अपनी मौजूदगी नहीं बढ़ा सकेगी। देश में बढ़ती खाद्य तेल की मांग को पूरा करने व आयात पर बढ़ती निर्भरता को कम करने के लिए ऑयल पाम की खेती को बढ़ावा देना जरूरी है।

ऑयल पाम की खेती से घटेगी आयात पर निर्भरता