भाकृअनुप द्वारा कृषि-जलवायु क्षेत्र-10 में किसान सेवाओं के विकास हेतु कार्यशाला

21 अक्टूबर, 2015, हैदराबाद

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा किसान सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए रणनीतिक तैयारी के उद्देश्य से 21 अक्टूबर, 2015 को भारतीय तिलहनी फसल अनुसंधान संस्थान (आईआईओआर), हैदराबाद में कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में दक्षिणी मैदानी एवं पहाड़ी क्षेत्र (कृषि-जलवायु क्षेत्र-10) के किसानों को प्रौद्योगिकी सहयोग, विस्तार और प्रदर्शन से संबंधित सेवाएं विकसित करने संबंधित रणनीति बनायी गयी।

डॉ. के.एम.एल. पाठक, उप- महानिदेशक, पशु विज्ञान, भाकृअनुप ने कार्यशाला की अध्यक्षता की। उन्होंने अपने संबोधन में किसानों को उत्पादन प्रणाली, क्षेत्र प्रौद्योगिकियों और विस्तार मॉड्यूल से संबंधित समस्याओं को प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया। कार्यशाला के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों एवं किसानों के विचार-विमर्श से निकले निष्कर्षों के आधार पर क्षेत्र के समग्र कृषि विकास के लिए तैयारियां की जायेंगी। इन तैयारियों में किसानों की सतत पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इससे शोध विषयक प्राथमिक मद्दों को तय करने तथा योजनाकारों एवं वैज्ञानिक संस्थाओं द्वारा नये क्षेत्रों एवं विषयों को चिन्हित करने में भी मदद मिलेगी। डॉ. पाठक ने बताया कि छोटे और सीमांत किसानों की आय वृद्धि एवं आजीविका सुरक्षा चिंता का प्रमुख विषय है। इसके अलावा अध्यक्ष महोदय ने संवाददाता सम्मेलन को भी संबोधित किया।

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डॉ. के.एस. वाराप्रसाद, निदेशक, आईआईओआर एवं कार्यशाला संपर्क अधिकारी ने अपनी प्रस्तुति में इस क्षेत्र की कृषि संबंधित चुनौतियों पर प्रकाश डाला। इन क्षेत्रों में आंतरिक द्ककन पठार तथा दक्षिणी महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश,  तेलंगाना और तमिलनाडु के बड़े भू-भाग एवं आदिलाबाद से मदुरै के ऊपरी भू-भाग शामिल हैं। उन्होंने कहा कि ये क्षेत्र मुख्यरूप से खेती के लिए वर्षा (80% भाग) पर आधारित हैं। इस कारणवश उतार-चढ़ाव से भरी जलवायु स्थिति और बारबार के सूखे के कारण फसल उत्पादकता कम होती है। इसे साथ ही उन्होंने इन समस्याओं के समाधान के लिए प्रौद्योगिकियों की उपलब्धता और सूचना एवं ज्ञान के प्रसार के लिए आईसीटी माध्यमों के उपयोग पर प्रकाश डाला।

डॉ. ए. पद्म राजू, कुलपति, आचार्य एन.जी. रंगा कृषि विश्वविद्यालय, हैदराबाद ने किसानों को सुझाव दिया कि जलवायु विषमताओं की स्थिति में आमदनी बनाये रखने के लिए एकीकृत कृषि प्रणाली को अपनायें। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि फसल हानि के समय भी पशुधन आय सुनिश्चित करते है। उन्होंने इस पर भी प्रकाश डाला कि किस प्रकार से किसानों की विशिष्ट समस्याओं के समाधान के लिए विश्वविद्यालय द्वारा संचालित सहायक कार्यक्रमों का विस्तार किया गया है।

डॉ. बी.एस. प्रकाश, सहायक महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद एवं उपाध्यक्ष कार्यशाला ने  किसानों और पशुपालकों की आय बढ़ाने में मूल्य संवर्धन की महत्वपूर्ण भूमिका पर बल दिया। उन्होंने चारे की गुणवत्ता में सुधार के लिए उत्तम बीज की उपलब्धता की आवश्यकता पर बल दिया, जिससे सहायक वस्तुओं और पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार किया जा सके। इसके साथ ही उन्होंने किसानों से आग्रह किया कि वे विषम जलवायुरोधी तकनीके अपनाये।

डॉ. चैरी अप्पाजी, प्रभारी निदेशक, अटारी, हैदराबाद एवं कार्यशाला संपर्क अधिकारी ने किसानों की अधिक आय को लक्ष्य बना कर काम करने वाली कंपनियों के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी। उन्होंने भाकृअनुप के नये कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने के लिए अटारी एवं केवीके द्वारा किये जा रहे पहलों की चर्चा की। इन संचालित योजनाओं में  'मेरा गांव मेरा गौरव' एवं ‘आर्या’ जैसी अन्य योजनाएं शामिल है। उन्होंने कार्यशाला की समाप्ति पर धन्यवाद ज्ञापित किया।

क्षेत्र के विभिन्न जिलों से आये प्रगतिशील किसानों ने कार्यशाला में भाग लिया और अपनी विशिष्ट समस्याओं को  समाधान के लिए प्रस्तुत किया। लगातार सूखा, छोटे किसानों के लिए उपयुक्त फसल किस्मों के उत्तम बीजों एवं तकनीक की सीमित उपलब्धता, जंगली जानवरों द्वारा फसलों के नुकसान और स्थान विशेष एकीकृत खेती प्रणाली विचार-विमर्श के प्रमुख विषयों में शामिल थे।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थानों, राज्य कृषि एवं पशु विज्ञान विभाग तथा पशु चिकित्सा विश्वविद्यालयों और क्षेत्र के कृषि विज्ञान केन्द्रों के निदेशकों और वरिष्ठ अधिकारियों ने कार्यशाला में भाग लिया और किसानों की विशेष समस्याओं के लिए समाधान संबंधित जानकारी प्रदान की।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने देश के 15 कृषि जलवायु क्षेत्रों में इस प्रकार की विचार आदान-प्रदान वाली कार्यशालाओं के आयोजन की योजना बनाई है। क्षेत्र के कृषि विकास की रणनीति कार्यशाला के निष्कर्षों के आधार पर विकसित किया जायेगी। रणनीति तैयार करने में तकनीकी हस्तक्षेप, विस्तार और प्रदर्शन जैसी सेवाएं आवश्यकरूप से शामिल की जाएंगी। इसके तहत भविष्य में शोध कार्यों के विषय और क्षेत्रीय विकास से कारकों को भी चिन्हित किया जायेगा।

(स्रोत: आईसीएआर-डीकेएमए, नई दिल्ली)