धान की ‘आजाद बासमती’ और गेहूं की ‘गोल्डन हलना’ किस्में जारी

लखनऊ, 30 जुलाई 2010

राज्य स्तरीय प्रजाति विमोचन समिति, उत्तर प्रदेश ने आज चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कानपुर द्वारा विकसित धान की ‘आजाद बासमती’ और गेहूं की ‘गोल्डन हलना’ किस्में खेती के लिए जारी कर दी हैं। उम्मीद है कि उच्च पैदावार वाली ये किस्में यहां के किसानों की आर्थिक स्थिति को बदलने में मददगार साबित होंगी।

धान की किस्म ‘आजाद बासमती (सीएसएआर 839-3)’ उच्च उपज, कम परिपक्वता अवधि और धान उत्पादन में सबसे अधिक हानि पहुंचाने वाली बीमारियों जैसे जीवाणु झुलसा एवं झौका तथा भूरा फुदका कीट अवरोधी है। परंपरागत और गैर-परंपरागत बासमती क्षेत्र के लिए उपयुक्त इस प्रजाति को विकसित करने में धान प्रजनक डॉ. विजय कुमार यादव, डॉ. रामकृष्ण एवं चंद्रशेखर आजाद विश्वविद्यालय, कानपुर के अन्य वैज्ञानिकों का विशेष योगदान रहा है। उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय कृषि प्रशिक्षण और प्रदर्शन केंद्र की ओर से निकाले गए औसत के आधार पर यह पूसा बासमती-1 के मुकाबले 23.6 प्रतिशत अधिक पैदावार देती है। जोन आधार पर इस प्रजाति ने मध्य जोन में 41.31 प्रतिशत, पूर्वी जोन में 27.24 प्रतिशत और पश्चिमी जोन में 18.36 प्रतिशत अधिक उत्पादन दिया। सिंचाई और रोपाई की परिस्थितियों के अनुरूप यह 39.32 क्विंटल/हैक्टर औसत उत्पादन दे सकती है। यह अर्द्ध बौनी किस्म पूसा बासमती-1 के मुकाबले पांच दिन और अन्य किस्मों के मुकाबले 15 से 25 दिन पहले पकने वाली किस्म है। इसका बीज उत्पादन में प्रयोग किया जा सकता है। इसकी उपज क्षमता 40-60 क्विंटल/हैक्टर है।

गर्मी सहन करने की अद्भुत क्षमता रखने वाली गेहूं की ‘गोल्डन हलना ( के0424)’ किस्म को विकसित करने में गेहूं प्रजनक डॉ. एल. पी. तिवारी एवं चंद्रशेखर आजाद विश्वविद्यालय, कानपुर के अन्य वैज्ञानिकों का विशेष योगदान है। 36 डिग्री सें. से अधिक ताप सहनशीलता के साथ इसकी उपज क्षमता 40-45 क्विंटल/हैक्टर है। यह 90-110 दिन में परिपक्व हो जाता है। इसका दाना हल्के सुनहरे रंग का होता है। इसमें प्रोटीन की मात्रा 12-12.5 प्रतिशत तक होती है। चपाती बनाने के लिए यह अच्छा है। यह किस्में उत्तर प्रदेश के मध्य एवं पश्चिमी क्षेत्रों के लिए विशेष उपयुक्त है।

(स्रोत: एनएआईपी सब-प्रोजेक्ट मास-मीडिया मोबलाइजेशन, दीपा और चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कानपुर)