एनबीएआईआई द्वारा भारत में पपीता मीलीबग का सफल जैविक नियंत्रण

20 अक्टूबर 2012, बंगलूरू

एनबीएआईआई द्वारा भारत में पपीता मीलीबग का सफल जैविक नियंत्रण aडॉ. एस. अय्यप्पन सचिव, डेयर और महानिदेशक, आईसीएआर ने एक समारोह का उद्घाटन करते हुए मीलीबग की सही पहचान करने सहित संभावित जैविक नियंत्रण उपलब्धता के स्रोत का पता लगाने के लिए राष्ट्रीय कृषि प्रमुख कीट ब्यूरो (एनबीएआईआई), बंगलूरू के कीट विज्ञानियों के प्रयासों की सराहना की।

एनबीएआईआई के स्थापना दिवस पर पपीते के मीलीबग के सफल नियंत्रण पर एक समारोह आयोजित किया गया।

इस अवसर पर डॉ. अय्यप्पन ने विभिन्न फसलों पर विशेष मीलीबग कीटों द्वारा की जाने वाली हानि का भी उल्लेख किया। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि इन मीलीबग कीटों का इनके चिपचिपे स्राव द्वारा रक्षित होने के कारण जहरीले रासायनिक कीटनाशकों द्वारा प्रबंध नहीं किया जा सकता है।

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इन तेजी से फैलने वाले मीलीबग कीटों को रोकने के लिए एसेरोफेगस पपाया नामक कीट का प्रयोग करने से हर वर्ष केवल महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक के किसानों को कीटनाशकों का प्रयोग नहीं करने के कारण अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 1623 करोड़ रुपये का लाभ हो रहा है। एक मि.मी. से भी छोटे एसेरोफेगस प्रयोग से शहतूत, कसावा और पपीता की फसलों में होने वाली बड़ी हानि को रोका जा रहा है।

डॉ. टी.पी. राजेन्द्रन, सहायक महानिदेशक (पौध सुरक्षा) ने पपीता मिलीबग से होने वाली हानि और भारत में इसके सफल जैविक नियंत्रण के बारे में को विस्तार से बताया। उन्होंने एक तकनीकी सत्र की भी अध्यक्षता की जहां तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र से आए वैज्ञानिकों ने पपीता, शहतूत और टैपियोका पर मीलीबग के जैविक नियंत्रण पर आर्थिक विश्लेषण प्रस्तुत किया।

इस अवसर पर डॉ. अय्यप्पन ने मीलीबग के जैविक नियंत्रण के सफल प्रयोग के लिए वैज्ञानिकों और प्रगतिशील किसानों को पुरस्कृत किया और पांच प्रकाशनों का विमोचन किया।

इस अवसर पर डॉ. दीपा धनखर, कृषि विशेषज्ञ, अमेरिकी कृषि विभाग- पशु एवं पौध स्वास्थ्य निरीक्षण सेवा, डॉ. आर.जे. रबिन्द्र, डीन, कॉलेज फॉर पीजी, डॉ. एस.एम.एच. कादरी, निदेशक, सीएसआर एंड टीआई, मैसूर, डॉ. बी. सेनापति, अध्यक्ष, आरएसी-एनबीएआईआई, डॉ. ई.आई. जोनाथन, निदेशक, सीपीपीए, तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, कोयंबटूर, डॉ. ए. रघुपति, विज्ञान सलाहकार, सेन्थिल पापेन, सीबीई, डॉ. टी. वेंकटेशन, सचिव, एसबीए ने भी देश में मीलीबग के सफल जैविक नियंत्रण पर संबोधन दिया।

इस कार्यक्रम में आईसीएआर के विभिन्न संस्थानों सहित राज्य के कृषि विश्विद्यालयों, कृषि विज्ञान केन्द्रों, राज्य के कृषि एवं बागवानी विभागों, अमेरिकी कृषि विभाग- पशु एवं पौध स्वास्थ्य निरीक्षण सेवा और उद्योगों के के 150 से अधिक वैज्ञानिकों और शोधार्थियों ने भाग लिया। तकनीकी सत्र में विदेशी कीटभक्षियों के कारण पपीता, टैपियोका और शहतूत की खेती में होने वाले लाभ पर चर्चा की गई।

इससे पहले, डॉ. बी.एस. भुमन्नवर, निदेशक, एनबीएआईआई ने अपने स्वागत भाषण में भारत में पपीता मीलीबग पर जैविक नियंत्रण के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी। सबसे पहले जुलाई 2008 में कोयंबटूर में पपीते पर इस विदेशी मीलीबग कीट को देखा गया था। ये मिलीबग आक्रामक होने के कारण दूसरी अन्य फसलों जैसे शहतूत, टैपिओका आदि पर भी तेजी से फैल गया। इस कीट के कारण भारत के सिल्क उद्योग पर भी गंभीर खतरा मंडराने लगा।

इन सूचनाओं के आधार पर तुरंत नई दिल्ली और अमेरिकी कृषि विभाग- पशु एवं पौध स्वास्थ्य निरीक्षण सेवा को तीन प्रकार के कीट भक्षियों की पूर्ति का निवेदन किया गया। दिल्ली में कृषि विभाग से सम्बद्ध डॉ. मार्क गिल्की ने पशु एवं पौध स्वास्थ्य निरीक्षण सेवा की प्यूर्टो रिको स्थित प्रयोगशाला से समन्वय स्थापित कर जुलाई से अक्टूबर, 2010 तक एनबीएआईआई को इन कीटों की बडे स्तर पर प्रजनन की व्यवस्था कराई। एनबीएआईआई के तत्कालीन निदेशक डॉ. आर.जे. राजेन्द्रन ने पपीता मीलीबग से फसलों को बचाने और जैविक नियंत्रण करने के लिए दक्षिण भारतीय राज्यों में किसानों को ये कीट उपलब्ध कराए।

 (स्रोत:ईमेल: anil [dot] cproatgmail [dot] com ())
(हिन्दी प्रस्तुतिः एनएआईपी मास मीडिया परियोजना, डीकेएमए)