कृषि विज्ञान केन्द्रों की आमुख कार्यशाला का उद्घाटन

19th अगस्त, 2014, नई दिल्ली

डॉ. रामेश्वर ओरोन, अध्यक्ष, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजातीय आयोग ने 19 अगस्त, 2014 को नई दिल्ली में कृषि विज्ञान केन्द्रों की आमुख कार्यशाला का उद्घाटन मुख्यमंत्री के रूप में किया। जनजातीय समुदाय के कल्याण और विकास में सराहनीय योगदान की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और सतत् आय सृजन के लिए अभी बहुत से कार्य करने बाकी हैं। गंभीर प्रयत्नों के बावजूद आम आबादी की तुलना में जनजातीय आबादी विभिन्न सामाजिक-आर्थिक मानदंडों से अभी तक बेहद पिछड़ी है। डाॅ. ओरोन ने जोर देकर कहा कि कृषि विज्ञान केन्द्रों को जनजातीय लोगों को मुख्यधारा में लाने की चुनौती और उत्तरदायित्व को स्वीकार करना चाहिए जिससे उनका विकास आम आबादी के बराबर हो सके। वर्षों से विभिन्न सरकारी योजनाओं में कई वायदे किये गये हैं किन्तु वादों और उनके क्रियान्वयन को पूरा करने के अंतर को कम किया जाना चाहिए।

डॉ. एस. अय्यप्पन, सचिव, डेयर और महानिदेशक, भाकृअनुप ने इस कार्यशाला के महत्व पर प्रकाश डाला। इस विषय पर पहली बार कार्यशाला का गठन किया गया है। जनजातीय समुदाय के पास दुलर्भ जर्मप्लाज्म उपलब्ध हैं और सदियों के अनुभव से उन्होंने तकनीकी ज्ञान भी अर्जित किया है इसका और अधिक संशोधन और उपयोग हो सकता है। जड़ी-बूटी आधारित औषधियों, कंदों और मोटे अनाजों आदि के विषय में उनके ज्ञान को डिजिटल बनाने का उन्होंने सुझाव दिया। कृषि विज्ञान केन्द्रों के हस्तक्षेप से जनजातीय क्षेत्रों में आदर्श गांव विकसित करने की दिशा में भाकृअनुप प्रयासरत है और हम भी हुनर विकास के प्रति समर्पित हैं। इससे जनजातीय समुदाय में सक्षमता और विश्वास जागृत होगा।

श्री आर. विजय कुमार सचिव, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजातीय आयोग ने जोर देकर कहा कि जनजातीय समुदाय को मुख्यधारा में लाना प्राथमिकता होनी चाहिए और प्रयोगशाला से खेत तक की अवधारणा को जमीनी स्तर पर सुदृढ़ता प्रदान करनी चाहिए।

श्री ऋषिकेश पांडा, सचिव, जनजातीय मामले मंत्री ने जनजातीय आबादी के पोषण स्तर में सुधार की बात कही और इसके लिए ग्राम पंचायतों को कृषि विज्ञान केन्द्रों के साथ मिलकर सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

डॉ. गुरबचन सिंह, अध्यक्ष, कृषि वैज्ञानिक चयन मंडल ने आदिवासी क्षेत्रों में किये गये कार्य के अनुभव बताये और जनजातीय समुदाय की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में सुधार की सीख के विषय में बताया।

श्री अरविंद आर. कौशल, अपर सचिव, डेयर और सचिव, भाकृअनुप ने भाकृअनुप और जनजातीय मामले मंत्रालय के बीच बेहतर सामंजस्य की आवश्यकता पर जोर दिया और उनके नवोन्मेश एवं औजारों के दस्तावेजीकरण की आवश्यकता पर जोर दिया।

इससे पूर्व डॉ. अलोक सिक्का, उपमहानिदेशक, कृषि विस्तार, भाकृअनुप ने गणमान्यों का स्वागत करते हुए आदिवासी क्षेत्रों में कृषि विज्ञान केन्द्रों के हस्तक्षेप का सिंहावलोकन प्रस्तुत किया। केवीके अधिदेश के विषय में विस्तृत जानकारी देते हुए उन्होंने सूचित किया कि देशभर में फैले 639 कृषि विज्ञान केन्द्रों में से 75 केवीके 50 प्रतिशत जनजातीय आबादी वाले क्षेत्रों में मौजूद हैं। जनजातीय समुदाय के विकास में कार्यरत कृषि विज्ञान केन्द्रों के विभिन्न मॉड्यूलों की उन्होंने जानकारी दी।

डॉ. ए.के. विशिष्ट, सहायक महानिदेशक, पीआईएम, भाकृअनुप ने देशभर में फैली जनजातीय उपयोजना घटक के तहत भाकृअनुप की उपलब्धियों के विषय में विस्तृत प्रस्तुति दी।

दो दिवसीय (19-20 अगस्त, 2014) कार्यशाला का आयोजन भाकृअनुप के कृषि विस्तार संभाग द्वारा ‘जनजातीय क्षेत्रों में हस्तक्षेप और दक्षता बढ़ाना’ विषय पर किया गया।

कृषि विश्वविद्यालयों के कुलपति, भाकृअनुप संस्थानों के निदेशक, भाकृअनुप, जनजातीय मामले मंत्रालय, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजातीय आयोग और पीपीवी एवं एफआरए के वरिष्ठ अधिकारियों, कृषि विश्वविद्यालयों के विस्तार निदेशक, क्षेत्रीय प्रायोजना समन्वयक, प्रायोजना समन्वयक और आदिवासी क्षेत्रों में स्थित कृषि विज्ञान केन्द्रों के अधिकारी इस कार्यशाला में भाग ले रहे हैं।

इसके साथ ही जनजातीय समुदाय के लिए कृषि विज्ञान केन्द्रों द्वारा विकसित विभिन्न प्रौद्योगिकियों और उत्पादों के प्रदर्शन के लिए एक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया है।

डॉ. ए.के. सिंह, सहायक महानिदेशक, कृषि विस्तार, भाकृअनुप ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया और इस कार्यक्रम का समन्वयन भी किया।

(स्रोत: कृषि ज्ञान प्रबंध निदेशालय, भाकृअनुप)