भाकृअनुप – केन्‍द्रीय भैंस अनुसंधान संस्‍थान क्‍लोन्‍ड भैंस उत्‍पन्‍न करने वाला भारत का दूसरा केन्‍द्र बना

11 दिसम्‍बर, 2015, हिसार

डॉ. इन्‍द्रजीत सिंह, निदेशक, भाक;अनुप – केन्‍द्रीय भैंस अनुसंधान संस्‍थान (CIRB), हिसार ने जानकारी दी कि संस्‍थान के वैज्ञानिकों ने दिनांक 11 दिसम्‍बर, 2015 को प्रात: 11.30 बजे क्‍लोन्‍ड कटड़ा हिसार गौरव का जन्‍म कराकर एक अनूठी उपलब्धि हासिल की है। इसका जन्‍म सामान्‍य प्रसव से हुआ और जन्‍म के समय इसका शरीर भार 40.4 किग्रा था। इससे पहले भाकृअनुप – राष्‍ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्‍थान, करनाल द्वारा क्‍लोनिंग विधि से उत्‍पन्‍न किए गए भैंस कटड़ा/कटड़ी से यह क्‍लोन पूरी तरह से भिन्‍न है क्‍योकि इसे श्रेष्‍ठ भैंस सांड की पूंछ के उदर की ओर की कोशिकाओं से उत्‍पन्‍न किया गया है। भैंसे के शरीर का यह हिस्‍सा सूरज प्रकाश के सम्‍पर्क में बहुत कम आता है और इसलिए इसमें कम उत्‍परिवर्तजन दर हो सकती है और यह स्‍वस्‍थ क्‍लोन उत्‍पन्‍न करने में प्रदाता कोशिकाओं को अलग करने के लिए एक अच्‍छी पसंद बन सकता है।

ICAR-CIRB become India's second center to produce cloned buffaloICAR-CIRB become India's second center to produce cloned buffaloICAR-CIRB become India's second center to produce cloned buffalo

नवजात क्‍लोन्‍ड कटड़े का  स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा बना हुआ है और इसके द्वारा सामान्‍य गतिविधियां की जा रही हैं। डॉ. सिंह ने इस बात पर बल दिया कि क्‍लोनिंग के लिए  प्रामाणिक नर भैंसो अथवा गुणवत्‍ता मादाओं की वयस्‍क दैहिक कोशिकाओं के उपयोग से देश में श्रेष्‍ठ भैंस जननद्रव्‍य का गुणनीकरण करके क्रान्ति लाई जा सकती है। इस उपलब्धि के साथ भाकृअनुप – केन्‍द्रीय भैंस अनुसंधान संस्‍थान, हिसार क्‍लोन्‍ड भैंस को उत्‍पन्‍न करने वाला विश्‍व का तीसरा और भारत का दूसरा संस्‍थान बन गया।

इस उपलब्धि को परियोजना शीर्षक ‘ श्रेष्ठ भैंस जननद्रव्‍य के संरक्षण और गुणनीकरण के लिए क्‍लोनिंग’ के तहत हासिल किया गया। इस सफल टीम का नेतृत्‍व डॉ. प्रेम सिंह यादव ने किया और इसमें डॉ. एन.एल. सिलोकर; डॉ. आर.के. शर्मा; डॉ. धर्मेन्‍द्र कुमार तथा डॉ. सुधीर खन्‍ना शामिल थे। क्‍लोन्‍ड कटड़ा, श्रेष्‍ठ मुर्रा नस्‍ल के सांड (Mu-4354)  का क्‍लोन है।  इस मुर्रा नस्‍ल के भैंसे का उपयोग भाकृअनुप – केन्‍द्रीय भैंस अनुसंधान संस्‍थान, हिसार में वीर्य उत्‍पादन के लिए किया जाता है। इस भैंसे के वीर्य की बहुत मांग है और इसकी एआई निषेचन दर लगभग 53 प्रतिशत है। भाकृअनुप – केन्‍द्रीय भैंस अनुसंधान संस्‍थान की उपलब्धि को स्‍वीकार करते हुए भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत विज्ञान एवं अभियांत्रिकी अनुसंधान बोर्ड ने युवा वैज्ञानिक योजना के तहत इसकी दक्षता में सुधार करने के लिए इस तकनीक को सरल बनाने हेतु  पिछले महीने 25 लाख रूपये का अनुदान दिया है।

श्रेष्‍ठ पशुओं की क्‍लोनिंग से भारत में श्रेष्‍ठ नस्‍ल वाले नर भैंसों की संख्‍या को बढ़ाने में  लंबा रास्‍ता तय करना है। वर्तमान में कृत्रिम निषेचन कार्यक्रमों में भावी उपयोग के लिए परीक्षित संतति वाले सांडों का वीर्य सीमित मात्रा में उपलब्‍ध है जो कि राष्‍ट्र की मांग को पूरा करने के लिए अपर्याप्‍त है। इसके अलावा, 60 मिलियन प्रजनन योग्‍य मादा भैंस संख्‍या के लिए प्रतिवर्ष अनुमानित 2500 युवा सांडों की आवश्‍यकता है। सबसे कम संभावित समय में ऐसे सांडों की संख्‍या का गुणनीकरण करने में पशु क्‍लोनिंग एक उपयुक्‍त विकल्‍प बन सकता है।

डॉ. एस. अय्यप्‍पन, सचिव, डेयर एवं महानिदेशक, भाकृअनुप; डॉ. एच. रहमान, उपमहानिदेशक (पशु विज्ञान), भाकृअनुप; डॉ. ए.के. श्रीवास्‍तव, निदेशक व कुलपति, भाकृअनुप – राष्‍ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्‍थान (एनडीआरआई), करनाल; तथा डॉ. बी.एस. प्रकाश, सहायक महानिदेशक (पशु पोषण एवं शरीरक्रिया विज्ञान), भाकृअनुप ने भाकृअनुप – केन्‍द्रीय भैंस अनुसंधान संस्‍थान, हिसार के निदेशक और वैज्ञानिकों को भैंस क्‍लोनिंग तकनीक में इस प्रगति के लिए बधाई दी।

(स्रोत : भाक;अनुप – केन्‍द्रीय भैंस अनुसंधान संस्‍थान (CIRB), हिसार)