भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा करनाल बंट जीनोम की डिकोडिंग

भाकृअनुप – भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल और भाकृअनुप – भारतीय कृषि सांख्यिकी अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के वैज्ञानिकों द्वारा देसी रोगकारक करनाल बंट के जीनोम को अनुक्रमित करने में सफलता प्राप्त की है। यह देश के लिए गौरव का क्षण है कि वैज्ञानिकों ने अंतरराष्ट्रीय संगरोध कानूनों के तहत हमारे देश के गेहूं के व्यापार को प्रतिबंधित करने वाले एक प्रमुख संगरोध रोगकारक की खोज कर ली है।

कठोर अंतरराष्ट्रीय संगरोध व्यापार कानूनों के अनुसार करनाल बंट एक प्रमुख चिंता का विषय है जो टिलेटिया इंडिका नामक कवक से पैदा होता है। इस बीमारी को आंशिक बंट भी कहा जाता है क्योंकि यह पौधे के केवल दाने प्रभावित करता है। यह एक संगरोधित रोगकारक होता है जिसकी वजह से संक्रमित क्षेत्र के गेहूं निर्यात प्रतिबंधित होने से काफी आर्थिक नुकसान होता है। रोगजनक प्रभेदों का जल्दी पता लगाना प्रकोप के प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण होता है। दो मोनोस्प्रिडियल तथा एक डिकारयोन का प्रारूप अनुक्रम रोगकारक की विविधता, इनके समागम व्यवहार और रोगजनकों का शीघ्र पता लगाने को समझने में काफी महत्वपूर्ण हैं। केबी प्रभेदों के प्रारूप आकार पीएसडब्ल्यूकेबीजीएच – 1, पीएसडब्ल्यूकेबीजीएच – 2 और पीएसडब्ल्यूकेबीजीएच – 3 क्रमशः 37,460,344 बीपी, 37,216,861 बीपी और 43,736,665 बीपी थे। ये परिणाम अंतर्राष्ट्रीय जर्नल अमेरिकन सोसाइटी ऑफ माइक्रोबायोलॉजी, जीनोम एनाउंसमेंट (http://genomea.asm.org/content/4/5/e00928-16.full) में प्रकाशित किए गए थे। इन जीनोम अनुक्रमों को जीनबैंक में प्राप्ति क्रमांक एमएपीडब्ल्यू00000000 (पीएसडब्ल्यूकेबीजीएच -1), एमएपीएक्स00000000 (पीएसडब्ल्यूकेबीजीएच -2) और एमएपीएक्स00000000 (पीएसडब्ल्यूकेबीजीडी -1-3) के तहत जमा कराया गया है।

(Source: Director, ICAR-IIWBR, Karnal (wheatpdatgmail [dot] com))