बांस और अंजन घास आधारित वन-चारागाह प्रणाली से खादर भूमि की उत्पादकता बढ़ी

Successfully developed Mahi ravines in Gujaratगुजरात में डेयरी बड़े उद्यमों में से एक है, यहाँ चारे की मांग में निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है। इससे चारे की निरंतर और नियमित आपूर्ति के लिए उत्पादक उपयोग के लिए सीमांत भूमि और बंजर भूमि पर दबाव है। सामान्य रूप से इन गैर कृषि योग्य खादर भूमि में अति आवश्यक ईंधन और चारे की आपूर्ति करने की क्षमता है। इसलिए, निम्न स्तर की खादर भूमि को उत्पाद उस के लिए रखा जाना चाहिए। इस तरह पर्यावरण की रक्षा के लिए आर्थिक लाभ प्राप्त होगा।

खादर भूमि की उत्पादकता बढ़ाने के लिए एक स्वदेशी तकनीक देहरादून स्थित केंद्रीय मृदा एवं जल संरक्षण अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान अनुसंधान, आणंद, गुजरात, में विकसित की गयी है। यह तकनीक विभिन्न विकासात्मक संगठनों द्वारा अपनायी गयी है।

Successfully developed Mahi ravines in Gujaratकेंद्र ने खादर भूमियों की उत्पादकता को सफलतापूर्वक बढ़ाने के लिए बांस और अंजन घास आधारित वन-चारागाह प्रणाली विकसित की है। इसके द्वारा अनुत्पादक खादर भूमि को सफलतापूर्वक बांस रोपण के द्वारा उपजाऊ बनाया जा सकता है। यह तकनीक अधिक लाभदायक है और पानी के कटाव की जाँच करती है, जिससे खादर भूमि से मिट्टी की हानि को रोकने में सहायता मिलती है। इसके अलावा, खादर भूमि का उद्धार न केवल आजीविका के लिए सहायक है बल्कि, यह प्राकृतिक संसाधन संरक्षण और लंबे समय में कार्बन ज़ब्ती में भी समर्थन प्रदान करता है।

आणंद स्थित फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सेक्यूरिटी (एफईएस), गुजरात स्टेट वाटरशेड प्रबंधन एजेंसी (जीएसडबल्यूएमए), गुजरात राज्य भूमि विकास निगम (जीएसएलडीसी), वन एवं कृषि विभाग और अन्य उपयोगकर्ता एजेंसियों सहित सभी संगठनों ने निम्न स्तरीय खड्ड को स्थिर रखने के लिए इस तकनीक को भूमि और प्राथमिक हितधारकों की आजीविका के उद्धार और खड्ड भूमि की उत्पादकता उपयोग में सुधार के लिए अपना लिया है। सभी एजेंसियों ने एक साथ, माही नदी खंड, गुजरात के लगभग 1000 हैक्टर में फैली बंजर भूमि के उद्धार के लिए इस तकनीक का उपयोग किया है।

Before intervention, after intervention of technology खड्ड में बांस बुवाई और घास रोपण की लागत रु. 22,000 / - प्रति हैक्टर है। प्रारंभिक वर्षों के दौरान, अंजन घास का हरा चारा खादर भूमि से काटा जा सकता है। घास का रोपण भी खड्ड ढ़लानों की रक्षा करता है और मिट्टी की हानि कम कर देता है इसके साथ ही 7.1 हैक्टर / हरा चारा प्रति वर्ष स्थिर ढ़लानों से प्राप्त किया जा सकता है। वसद, आणंद में 5 साल की अवधि के दौरान, घास से कुल 3000 से 6000 रुपये की प्रति हैक्टर आय अर्जित की गई।

Fully developed ravineवन-चारागाह प्रणाली 80% से अधिक वर्षाजल का अवशोषण करती है जिसका उपयोग भू - जल पुनर्भरण के लिए किया जाता है। कम अपवाह के कारण मिट्टी की हानि कम से कम एक टन प्रति हैक्टर प्रति वर्ष कम हो जाती है।

खादर एक भूमि का प्रकार है जो घाटी की तुलना में संकरी और अक्सर धारा के कटाव से बनता है। लगभग 3.67 लाख हैक्टर भूमि खादर के तहत है जो देश में कुल भौगोलिक क्षेत्र का 1.12% है। गुजरात में खादर भूमि 0.4 मिलियन हैक्टर क्षेत्र पर फैली है और ताप्ती, नर्मदा, साबरमती और माही नदी घाटियों के दक्षिणी तट भी इसी क्षेत्र में विद्यमान हैं। चारा उत्पादन और बांस की व्यावसायिक खेती के लिए इन खादर भूमियों के उत्पादक उपयोग केवल चारे की जरूरतों को पूरा नहीं करेंगे बल्कि यह किसानों को भी नियमित आय का एक पूरक स्रोत प्रदान करेंगे।

(स्रोत: एनएआईपी-मास मीडिया परियोजना, आरसी, सीएस और डबल्यूसीआर और टी, वसद और डीएमएपीआर से जानकारी के साथ डीकेएमए, आणंद)