सैटेलाइट मत्स्य नर्सरी तकनीकः आजीविका सुधार का नया विकल्प

श्री साजिब कुमार (84), निवासी वी.एस. पल्ली, डिगलीपुर स्नातक हैं और परिवहन विभाग में कंडक्टर के रूप में कार्यरत हैं। वे अपने 60 गुणा 40 मीटर के जलाशय में ताजा जल मछली (कतला, रोहू, मृगल) पालकर सीधे बाजार में बेचते हैं। इससे उन्हें प्रतिवर्ष करीब 20,000 से 25,000 रुपये अतिरिक्त आमदनी होती थी। लेकिन वह अपने इस मत्स्य पालन व्यवसाय की प्रगति से खुश नहीं थे। उन्हें अच्छी गुणवत्ता के मत्स्य बीज प्राप्त करने में काफी समस्या होती थी। सप्लायर उन्हें कतला, रोहू और मृगल के नाम पर घटिया एवं बेकार मछलियां देते थे। इस समस्या से निजात पाने के लिए साजिब उत्प्रेरित मत्स्य प्रजनन की तकनीक सीखकर उन्य मत्स्य पालाकों को भी अच्छी गुणवत्ता के मत्स्य बीज उपलब्ध करवाना चाहते थे।

सीएआरआई की तकनीकी सहायता से सफलता

वर्ष 2012 में मात्स्यिकी विभाग, अंडमान और निकोबार प्रशासन द्वारा उद्यमी किसान के रूप में श्री साजिब की पहचान की गई। केन्द्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान, मात्स्यिकी विभाग संभाग, कृषि विज्ञान केन्द्र और आउटरीच सेंटर (ओरआरसी), डिगरीपुर, उत्तर एवं मध्य अंडमान ने मिलकर इनके जलाशय में ताजा जल मछली की नर्सरी की शुरुआत की। सीएआरआई के मात्स्यिकी विज्ञान संभाग की सैटेलाइट नर्सरी अवधारण पर तकनीकी मदद से इस कार्य के लिए इन्हें प्रेरणा मिली। ‘कार्प ब्रीडिंग एण्ड मॉडल फॉर सैटेलाइट नर्सरी इन अंडमान’ पर 11-14 जून 2012 को ओरआरसी, डिगलीपुर में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इसमें इन्होंने मत्स्य प्रजनन पर ज्ञान एवं कौशल हासिल करने के लिए भाग लिया। आत्मविश्वास बढ़ने पर श्री साजिब ने 10 गुणा 10 गुणा 1.5 मीटर आकार की पांच सैटेलाइट नर्सरी की शुरुआत की।

प्रजनन मौसम में 17 और 28 जून, 2012 को भारी बारिश के कारण बाढ़ आने से इनकी नर्सरी तबाह हो गई। भारी नुकसान के कारण इन्होंने अपने कदम पीछे खींचने चाहे, लेकिन सीएआरआई के वैज्ञानिकों और स्टाफ की मदद व सलाह से इन्होंने फिर से नर्सरी शुरू की। प्रजनन मौसम में वह नर्सरी पर प्रतिदिन पांच घंटे कार्य करते थे। इसके अलावा मत्स्य प्रजनन, प्रबंधन और समयानुसार मत्स्य बीज बेचने के लिए इन्होंने चार पूर्णकालिक और 10 अंशकालिक कर्मी भी रखे।

अच्छी आमदनी से आई खुशहाली

श्री साजिब ने मत्स्य बीज से पहली खेप आकार के अनुसार एक से आठ रुपये तक बेची। इससे उन्हें 70,000 रुपये की अतिरिक्त आमदनी हुई। कालीपुर से केरलापुरम तक अच्छी गुणवत्ता के मत्स्य बीज की उपलब्धता के विषय में जानकारी पाकर 20-25 मत्स्य पालकों ने लगभग 40,000 मत्स्य बीज की मांग की। इन्होंने पांच रुपये प्रति मत्स्य बीज के हिसाब से बेचे। इससे इन्हें 2,00,000 रुपये की अतिरिक्त आय प्राप्त हुई।

छह माह की अवधि में ही सैटेलाइट नर्सरी तकनीक अपनाकर ताजा जल मत्स्य से इन्हें 2,70,000 रुपये की अतिरिक्त आय प्राप्त हुई। अब छह मत्स्य पालक आजीविका कमाने के लिए यह कार्य कर रहे हैं। कई युवा इस प्रौद्योगिकी को अपनाने के लिए सामने आये हैं।

(स्रोतः केन्द्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पोर्ट ब्लेयर)