भागीदारी जल संसाधन विकास से बदलाव

देहरादून जिले के टूनी ब्लॉक में अट्टल नामक सुदूर जनजातीय गांव बसा है। इस गांव में लगभग 300 परिवार हैं और आधे से अधिक परिवार खेती से जुड़े हैं। खाद्यान्न, दलहनें, सब्जियां और फल मुख्यतया यहां उगाये जाते हैं किन्तु वर्ष भर जल की कमी होने से यहां कृषि उत्पादन संतोषजनक नहीं हो पाता।

सीएसडब्ल्यूसीआरटीआई ने किसानों को प्रशिक्षण दिया

जल संरक्षण अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान (सीएसडब्ल्यूसीआरटीआई), देहरादून ने जनजातीय उपयोजना (टीएसवी) लागू करने के लिए अट्टल गांव का चयन किया। खेत दौरों और किसानों के साथ बातचीत से गहन निरीक्षण में पाया गया कि यदि पानी की कमी को दूर किया जाये तो यहां कृषि विकास की असीम क्षमता है।

शुरुआत में, किसानों के साथ बैठकों और चर्चाओं का दौर शुरु किया गया और नौ उपयोगकर्ता समूहों (यूजर ग्रुप) के साथ लगभग 7.2 हैक्टर भूमि पर बागवानी रोपण शुरू किया गया। इसके बाद सभी समूहों को अट्टल फल और सब्जी उत्पादक एसोसिएशन के रूप में स्थापित किया गया। कुल 3250 फल पौध किसानों को वितरित की गयी। सीएसडब्ल्यूसीआरटीआई ने सभी समूहों को बागवानी पौधों की रोपण तकनीक का प्रशिक्षण दिया, किन्तु जल की कमी होने से बागवानी पौधों की जीवितता 30 प्रतिशत रही। इस गांव के किसन सब्जियां भी उगाते हैं किन्तु सिंचाई सुविधाओं के अभाव में सफलता सीमित रही।

जल की कमी - गंभीर समस्या
लगभग 30 वर्ष पूर्व अन्य एजेंसियों ने जल अभाव की समस्या दूर करने के लिए हाइड्रम सिस्टम लगाया किन्तु यह सफल नहीं हो सका। लगभग 5 वर्ष पहले लिफ्ट सिंचाई प्रणाली की शुरुआत की गयी किन्तु उसकी उंच्चाई और विद्युत की कमी के कारण सफलता सीमित रही। अंतिम हस्तक्षेप में 280 घन मीटर भंडारण क्षमता का जलाशय ऊंचे स्थान पर निर्मित किया गया किन्तु यह भी कामयाब नहीं हुआ।

हस्तक्षेप से बदलाव
विस्तृत क्षेत्र सर्वेक्षण और किसानों से चर्चा के बाद, अट्टल गांव में जल संसाधन विकास पहल की शुरुआत की गयी। इसके लिए बाराहामासी स्रोत से दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र से 6.0 कि.मी. लंबी एचडीपीई पाइप लाइन बिछाई गयी। इस स्रोत से पर्याप्त जल (लगभग 15 ली/सै.) उपलब्ध हो सका और इसे पूर्व निर्मित इस्तेमाल न किये जाने वाले पानी के टैंक से जोड़ दिया गया। किन्तु इस टैंक में हल्की दरारें पड़ने के करण भंडारित जल की काफी हानि (3 सें.मी./घंटा, 1.25 मी. तक या लगभग 1.45 ली./सें.) हो रही थी। इस रिसाव को रोकने के लिए 250 जीएसमी की जीएसमी की सिल्पॉलिन शीट का प्रयोग करके टैंक की लाइनिंग की गयी। इस कार्य में गांव वालों ने 6 मि.मी. लंबी नाली खोदकर पाइप बिछाने के कार्य में मजदूरी करके अपना योगदान दिया। इस हस्तक्षेप को 7,20,000 रु. की लागत से सहभागिता मोड में शुरु किया गया। इसमें से 21 प्रतिशत (1,50,000 रु.) का योगदान किसानों ने नाली खोदने, पाइपों को लाने के मानव श्रम, पाइन लाइन बिछाने और टैंक की सफाई करके टैंक में सिल्पॉलिन शीट लगाने के रूप में किया।

अट्टी गांव में इस जल संसाधन विकास हस्तक्षेप से कुल 125 किसान जुड़े है। इन्होंने 20 हैक्टर क्षेत्र में टमाटर उत्पादन की शुरुआत की है जबकि इस जल संसाधन की कुल क्षमता 70 हैक्टर है। इस उत्पादन के नतीजे बहुत उत्साहवर्धक है। इसके पश्चात अट्टल गांव के पूरे कृषि क्षेत्र को इस जल संसाधन से जोड़ने की पहल की जा चुकी है और अब ज्यादा से ज्यादा किसान इस अभियान में जुड़ रहे हैं। इस गांव में अब खेती का परिदृश्य बदल रहा है।