पूर्वोत्तर में शून्य जुताई से तोरिया-सरसों से अधिक आय

पूर्वोत्तर में शून्य जुताई से तोरिया-सरसों से अधिक आयपूर्वोत्तर क्षेत्र में तिलहन उत्पादन में कई समस्याएं आती हैं-जैसे मानसून के पश्चात पानी की कमी, सिंचाई सुविधाओं का अभाव, धान की कटाई के पश्चात बीज बुआई के लिए कम समय और पिछेती बुआई वाली फसलों में कीटों और रोगों का प्रकोप। इसी कारण से यहां धान की एकल खेती की जाती है और इसके बाद खेत को परती छोड़ दिया जाता है।

विस्तार शिक्षा निदेशालय, केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, इम्फाल ने तोरिया-सरसों निदेशालय, भरतपुर के सहयोग से रबी-2011 में आदिवासी उपप्रायोजना के तहत टिकाऊ आजीविका सुरक्षा के लिए इन राज्यों के आदिवासी किसानों के लिए तोरिया-सरसों उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक विस्तार प्रायोजना लागू की।

तोरिया की किस्मों एम-27 और टीएस-36, पीली सरसों, रागिनी और सरसों की किस्मों- पूसा अग्रणी, पूसा महक, एनआरसीएचबी-101 और एनपीजे-112 का शून्य जुताई के अंतर्गत 55 हैक्टर क्षेत्र में मूल्यांकन किया गया और इनकी तुलना 40 हैक्टर क्षेत्र में पारम्परिक जुताई के साथ उगायी गयी किस्मों से की गयी। इसके अलावा परागण के लिए 4 मधुमक्खी कॉलोनियों का प्रयोग, परागकों को न प्रभावित करने वाले वानस्पतिक कीटनाशकों का छिड़काव और जैविक शहद उत्पादन का भी प्रदर्शन किया गया।

फसल अवधि में बारिश न होने के कारण पारम्परिक जुताई की अपेक्षा शून्य जुताई वाली फसल में सभी तोरिया-सरसों किस्मों में वृद्धि और उत्पादन मानदंड बेहतर रहे। इसका कारण धान कटाई के पश्चात मृदा में नमी होना है। तोरिया किस्मों में रागिनी से अधिकतम औसत उत्पादन 10 क्विं./है. (8.0 से 14.0 क्विं./है.) रहा, जबकि सरसों में एनआरसीएचबी-101 किस्म ने शून्य जुताई में अधिकतम औसत उत्पादन 10.2 क्विं./है. (8.0 से 11.0 क्विं./है.) रहा।

पूर्वोत्तर में शून्य जुताई से तोरिया-सरसों से अधिक आयपूर्वोत्तर में शून्य जुताई से तोरिया-सरसों से अधिक आय

इससे इम्फाल के पूर्वी जिले के नौ गांवों के 172 किसानों की औसतन शुद्ध आय में 27,388 रु./है. का औसत लाभ ज्यादा प्राप्त हुआ। इसमें 13,412/है. की निवेश राशि से 105 दिनों में शहद से प्राप्त आय भी शामिल है। इन किसानों की सफलता से प्रभावित होकर मणिपुर, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश के 10 जिलों के 50 गांवों के 1419 किसानों ने इस प्रौद्योगिकी को अपनाया और इसलिए तोरिया-सरसों की शून्य जुताई का क्षेत्र रबी 2012 और 2013 में बढ़कर 1010 हैक्टर हो गया।

रबी 2012 के मौसम में बारिश न होने के कारण पानी की कमी की अवस्था में तोरिया किस्म एम-27 और पीली सरसों किस्म वाईएसएच-401 और सरसों किस्म एनआरसीएचबी-101 में शून्य जुताई में अधिकतम उत्पादन क्रमशः 6.0, 10.0 और 11.9 क्विं./है. रहा।

इसी तरह रबी 2013 के दौरान पानी की कमी की अवस्था में शून्य जुताई में तोरिया किस्म टीएस-38, पीली सरसों वाईएसएच-401 और सरसों किस्म एनआरसीएचबी-101 से क्रमशः 7.9, 9.5 और 11.8 क्विं./है. औसत उत्पादन प्राप्त हुआ।

किसानों के खेतों में इस सफलता से ज्ञात होता है कि तोरिया-सरसों एक जलवायु परिवर्तन सहनशील फसल है। इसे अवशेष मृदा नमी में भी पानी के बिना उगाया जा सकता है। किसान शून्य जुताई से उत्पादन बढ़ाकर, उत्पादन की लागत घटाकर और फसल सघनता बढ़ा सकते हैं और कम प्रयत्नों के बावजूद ज्यादा आय कमा सकते हैं। शून्य जुताई के कारण समय (अक्तूबर-नवम्बर) से बुआई की जा सकती है। मृदा में इस समय नमी के कारण, पानी की आवश्यकता कम होती है, जुताई की लागत और समय की बचत होती है और मृदा अवशेष रहने से मृदा अपरदन से बचाव होता है।

शून्य जुताई के साथ मधुमक्खी पालन और रसायनों का प्रयोग न करना जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में पूर्वोत्तर क्षेत्र के आर्थिक रूप से किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी है।

(स्रोत: केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, इम्फाल और तोरिया-सरसों अनुसंधान निदेशालय, भरतपुर)