देशभर में बदलती जलवायु परिस्थितियां वर्षा आधारित कृषि के लिए लगातार चुनौती बनी हुई हैं। ऐसे में भाकृअनुप–भारतीय मिलेट अनुसंधान संस्थान (आईआईएमआर), हैदराबाद, ग्लोबल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन मिलेट्स (श्री अन्न) ने कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले के परशुरामपुरा गांव के किसानों के बीच उन्नत श्री अन्न प्रौद्योगिकियों का परिचय कराकर अधिक सहनशील कृषि प्रणालियों के निर्माण की दिशा में एक सक्रिय कदम उठाया है। खेत बचाओ अभियान के अंतर्गत भाकृअनुप-आईआईएमआर के वैज्ञानिकों ने खेत स्तरीय प्रदर्शन आयोजित किए, गुणवत्तायुक्त मिलेट बीज वितरित किया तथा किसानों के साथ सीधे संवाद स्थापित कर ऐसी सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा दिया, जो उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ मृदा और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी करती हैं।
चित्रदुर्ग जिला अपने अर्द्ध-शुष्क जलवायु क्षेत्र के लिए जाना जाता है, जहां कम और अनियमित वर्षा, बार-बार पड़ने वाले शुष्क दौर तथा नमी की कमी जैसी परिस्थितियां अक्सर फसल उत्पादकता को प्रभावित करती हैं। इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए भाकृअनुप-आईआईएमआर ने उन्नत मिलेट उत्पादन प्रौद्योगिकियों का परिचय कराया, जो स्वाभाविक रूप से ऐसे वातावरण के अनुकूल हैं। श्री अन्न में सीमित जल उपलब्धता तथा प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों में भी सफलतापूर्वक विकसित होने की विशिष्ट क्षमता होती है, जिससे वे क्षेत्र में कृषि प्रणालियों की स्थिरता और सहनशीलता को मजबूत करने के लिए एक आदर्श फसल बन जाते हैं।

आंध्र प्रदेश के अनंतपुर स्थित कुसुमगिरि किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) के सक्रिय समन्वय के माध्यम से भाकृअनुप-आईआईएमआर ने 350 किसानों तक पहुंच बनाते हुए तीन टन गुणवत्तायुक्त श्री अन्न बीज उपलब्ध कराए तथा उन्नत मिलेट उत्पादन पद्धतियों को प्रदर्शित करने के लिए प्रदर्शन प्लॉट स्थापित किए। इन प्रदर्शनों ने किसानों को स्थानीय खेत परिस्थितियों में मिलेट फसलों के प्रदर्शन और अनुकूलन क्षमता को प्रत्यक्ष रूप से देखने तथा उन्हें लाभकारी एवं जलवायु-सहनशील विकल्प के रूप में समझने का अवसर प्रदान किया।
वैज्ञानिकों ने उन्नत फसल स्थापना, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, नमी संरक्षण तकनीकों, एकीकृत फसल प्रबंधन तथा कटाई उपरांत प्रबंधन पर व्यापक तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया। विशेष रूप से मृदा संरक्षण और सतत भूमि उपयोग पद्धतियों पर जोर दिया गया, जो मृदा में जैविक पदार्थ की मात्रा बढ़ाने, जल धारण क्षमता में सुधार करने, मृदा क्षरण को कम करने तथा दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता को बनाए रखने में सहायक हैं। किसानों को वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियां अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जो न केवल फसल प्रदर्शन में सुधार करती हैं बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए मृदा संसाधनों के संरक्षण में भी योगदान देती हैं।
इस पहल से कृषि समुदायों को दूरगामी लाभ मिलने की अपेक्षा है, क्योंकि इससे जलवायु उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशीलता कम होगी, उत्पादन स्थिरता में सुधार होगा, कृषि आदानों से जुड़े जोखिम कम होंगे तथा विविधीकृत कृषि प्रणालियों को बढ़ावा मिलेगा। मिलेट आधारित कृषि को अपनाने से परिवारों की पोषण सुरक्षा सुदृढ़ होगी, आजीविका के नए अवसर सृजित होंगे तथा उभरते मिलेट बाजारों और मूल्य संवर्धित उद्यमों तक पहुंच के माध्यम से कृषि लाभप्रदता में वृद्धि होगी।
संवाद के दौरान भाकृअनुप-आईआईएमआर के वैज्ञानिकों ने मिलेट-केन्द्रित फसल प्रणालियों के माध्यम से कृषि उत्पादकता बढ़ाने के व्यावहारिक उपाय साझा किया। किसानों को श्री अन्न और अरहर, लोबिया तथा मूंग जैसी दलहनी फसलों के साथ वैज्ञानिक रूप से अनुशंसित कतार अनुपातों में उपयुक्त अंतरवर्तीय खेती मॉडल से परिचित कराया गया। इन प्रणालियों को भूमि उत्पादकता अधिकतम करने, संसाधनों के उपयोग की दक्षता बढ़ाने, जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से मृदा उर्वरता समृद्ध करने तथा अतिरिक्त आय के स्रोत उत्पन्न करने की प्रभावी रणनीति के रूप में प्रदर्शित किया गया। सत्रों में नमी प्रबंधन, फसल विविधीकरण तथा वर्षा आधारित कृषि की आवश्यकताओं के अनुरूप सतत कृषि पद्धतियों पर भी चर्चा की गई।

किसानों ने कार्यक्रम में सक्रिय रूप से भाग लिया, अपने अनुभव साझा किए तथा अनुसंधान आधारित प्रौद्योगिकियों और सर्वोत्तम कृषि पद्धतियों का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया। उन्होंने विशेषज्ञों से सीधे सीखने के अवसर की सराहना की और कहा कि इन प्रदर्शनों ने वर्षा आधारित कृषि परिस्थितियों में सामान्यतः आने वाली चुनौतियों के व्यावहारिक समाधान प्रदान किए हैं। कार्यक्रम के माध्यम से प्राप्त ज्ञान किसानों को बेहतर निर्णय लेने, मिलेट्स को व्यापक स्तर पर अपनाने तथा क्षेत्र की कृषि प्रणालियों की सहनशीलता को मजबूत करने में सहायक होगा।
इस हस्तक्षेप के माध्यम से भाकृअनुप-आईआईएमआर ने एक बार फिर वैज्ञानिक नवाचारों को खेत स्तर की गतिविधियों से जोड़ते हुए मिलेट आधारित कृषि परिवर्तन को आगे बढ़ाने में अपना नेतृत्व प्रदर्शित किया है। यह कार्यक्रम जलवायु-सहनशील कृषि समुदायों के निर्माण, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य की रक्षा तथा संवेदनशील कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों में किसानों के लिए सतत आजीविका सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
(स्रोत: भाकृअनुप–भारतीय मिलेट अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद)







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