भाकृअनुप-कृषि विज्ञान केन्द्र, री भोई ने भाकृअनुप अनुसंधान परिसर, पूर्वोत्तर पर्वतीय क्षेत्र (एनईएच), उमियम के सहयोग से 1 जून 2026 को एक माह तक चलने वाले राष्ट्रीय प्रमुख कार्यक्रम “खेत बचाओ अभियान” का शुभारंभ किया। यह अभियान 1 से 30 जून, 2026 तक चलेगा। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों की उपस्थिति रही, जिसने मृदा संरक्षण और सतत कृषि पर नए सिरे से जोर देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम को चिह्नित किया।
अभियान के शुभारंभ समारोह में डॉ. जी. कादिरवेल, निदेशक, भाकृअनुप अनुसंधान परिसर, एनईएच क्षेत्र, उमियम, मेघालय श्री रोडोनाल्ड मजाव, परियोजना प्रबंधक, बेसिन प्रबंधन एजेंसी तथा सामुदायिक नेताओं में श्री दुरुथ मजाव, राज्य अध्यक्ष, किसान मोर्चा, श्री रिचर्ड लिंगदोह, अध्यक्ष, किसान मोर्चा उमरोई और श्री डोनलांग नोंगब्री, राज्य महासचिव, किसान मोर्चा, उपस्थित रहे।
अभियान के शुभारंभ के दौरान सभी वक्ताओं ने राष्ट्रीय मृदा संरक्षण के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के दृष्टिकोण की सराहना की तथा अभियान के उद्देश्यों का समर्थन किया।
शुभारंभ के पश्चात केवीके ने “सतत मृदा स्वास्थ्य के लिए हरित खाद एवं प्राकृतिक खेती पर प्रशिक्षण कार्यक्रम” आयोजित किया, जिसमें री भोई जिले के 120 किसानों ने भाग लिया। इनमें 87 महिलाएं और 33 पुरुष शामिल थे। इस व्यावहारिक प्रशिक्षण में कक्षा-आधारित जानकारी के साथ-साथ खेतों में प्रदर्शन भी शामिल थे, ताकि प्रतिभागियों को कम लागत वाली, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित ऐसी तकनीकों से परिचित कराया जा सके जो मृदा उर्वरता को पुनर्स्थापित करें, जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ाएं और रासायनिक आदानों पर निर्भरता कम करें।

प्रशिक्षण के दौरान विशेषज्ञों ने हरित खाद पर विशेष जोर दिया, जिसमें सनहेम्प, ढैंचा और क्लस्टर बीन जैसी दलहनी एवं तीव्र वृद्धि वाली आवरण फसलों को उगाकर उन्हें मिट्टी में मिलाया जाता है, जिससे वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण, मृदा संरचना में सुधार तथा सूक्ष्मजीव गतिविधियों में वृद्धि होती है। व्यावहारिक सत्रों में फसल चयन, बुवाई की उपयुक्त अवधि, जैवभार को मिट्टी में मिलाने की तकनीक तथा पोषक तत्वों की उपलब्धता को अधिकतम और हानि को न्यूनतम करने के प्रबंधन उपायों को शामिल किया गया।
प्राकृतिक खेती से संबंधित सत्रों में खेत पर उपलब्ध संसाधनों और पारिस्थितिकीय दृष्टिकोणों पर ध्यान केंद्रित किया गया। इसमें कम्पोस्ट, जीवामृत तथा किण्वित पौध अर्कों की तैयारी एवं उपयोग, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग में कमी तथा फसल चक्र एवं अंतरवर्तीय खेती को अपनाने जैसे विषय शामिल थे, ताकि कीट चक्र को तोड़ा जा सके और कृषि प्रणाली की सहनशीलता बढ़ाई जा सके। सत्रों में यह भी बताया गया कि ये पद्धतियां री भोई की ढलानदार भूमि पर जल धारण क्षमता बढ़ाने, मृदा अपरदन कम करने तथा दीर्घकालिक उत्पादकता बढ़ाने में सहायक हैं।
प्रतिभागियों ने प्रशिक्षण के प्रति आशावाद व्यक्त किया और कहा कि ये तकनीकें तुरंत अपनाई जा सकती हैं तथा इनसे कृषि लागत में कमी आएगी। केवीके अधिकारियों ने जून माह के अभियान के दौरान अनुवर्ती खेत भ्रमण, प्रदर्शन प्लॉट तथा परामर्श सहायता प्रदान करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की, ताकि प्रशिक्षण को स्थायी व्यवहार में परिवर्तित किया जा सके। इस कार्यक्रम का उद्देश्य इन तकनीकों को पूरे जिले में विस्तार देना है, जिससे आजीविका सुदृढ़ होने के साथ-साथ बहुमूल्य मृदा संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो सके।
कार्यक्रम के अंत में सभी जनप्रतिनिधियों ने भावी पीढ़ियों के लिए मृदा संरक्षण सुनिश्चित करने हेतु मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन संबंधी इस अभियान को व्यापक स्तर पर प्रसारित करने का समर्थन किया।
(स्रोत: भाकृअनुप अनुसंधान परिसर, पूर्वोत्तर पर्वतीय क्षेत्र, उमियम, मेघालय)







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