हाफलोंग में 450 से अधिक किसानों की भागीदारी के साथ चौथा मिथुन दिवस मनाया गया; मंत्रियों ने दीमा हसाओ में मिथुन क्षेत्र को मजबूत करने के लिए सहयोग का दिया आश्वासन

हाफलोंग में 450 से अधिक किसानों की भागीदारी के साथ चौथा मिथुन दिवस मनाया गया; मंत्रियों ने दीमा हसाओ में मिथुन क्षेत्र को मजबूत करने के लिए सहयोग का दिया आश्वासन

3 सितंबर, 2026, असम

“पहाड़ियों के गौरव का उत्सव” विषय पर आधारित चौथा मिथुन दिवस आज असम के दीमा हसाओ स्थित हाफलोंग के जिला पुस्तकालय सभागार में मनाया गया, जिसमें 450 से अधिक मिथुन किसानों तथा 100 से अधिक अधिकारियों, वैज्ञानिकों और सरकारी विभागों, भाकृअनुप संस्थानों एवं हितधारक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

कार्यक्रम का आयोजन भाकृअनुप–राष्ट्रीय मिथुन अनुसंधान केंद्र, मेडजिफेमा, नागालैंड ने भाकृअनुप–भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु तथा दीमा हसाओ स्वायत्त परिषद के प्रशासनिक नियंत्रण के अंतर्गत पशुपालन एवं पशु चिकित्सा विभाग के सहयोग से किया।

समारोह में असम सरकार की पशुपालन एवं पशु चिकित्सा तथा मत्स्य विभाग की मंत्री श्रीमती नीलिमा देवी मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। डीएचएसी के मुख्य कार्यकारी सदस्य श्री देबोलाल गोरलोसा और अरुणाचल प्रदेश सरकार के कृषि, पशु चिकित्सा आदि मंत्री श्री गैब्रियल डेनवांग वांगसू सम्मानित अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

विशिष्ट विशेष अतिथियों में डॉ. राघवेंद्र भट्टा, उप महानिदेशक (पशु विज्ञान), भाकृअनुप; डॉ. के. एम. बुजरबरुआ, भाकृअनुप के पूर्व उप महानिदेशक (पशु विज्ञान) एवं पूर्व कुलपति, असम कृषि विश्वविद्यालय; डॉ. निरंजन कलिता, कुलपति, असम पशु चिकित्सा एवं मत्स्य विश्वविद्यालय, खानापारा, गुवाहाटी; डॉ. गिरीश पाटिल एस, निदेशक, भाकृअनुप–राष्ट्रीय मिथुन अनुसंधान केन्द्र.; श्रीमती रूपाली लांगथासा, विधान सभा सदस्य, 113-हाफलोंग एलएसी; और श्री मंजीत निडिंग, कार्यकारी सदस्य (पशुपालन एवं पशु चिकित्सा), डीएचएसी, शामिल थे।

4th Mithun Day Celebrated in Haflong with Participation of Over 450 Farmers; Ministers Assure Support for Strengthening Mithun Sector in Dima Hasao

उद्घाटन कार्यक्रम में स्टॉलों का उद्घाटन, मिथुन किसानों को इनपुट का वितरण, अतिथियों का सम्मान तथा गणमान्य व्यक्तियों द्वारा संबोधन शामिल था। भाकृअनुप–राष्ट्रीय मिथुन अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. गिरीश पाटिल एस. ने “असम में मिथुन क्षेत्र: संभावनाएं एवं चुनौतियां” विषय पर प्रस्तुति दी, जिसमें राज्य में मिथुन उत्पादन को मजबूत करने और किसानों की आजीविका में सुधार के अवसरों तथा प्रमुख बाधाओं पर प्रकाश डाला गया।

समारोह का एक प्रमुख केंद्र दीमा हसाओ में मिथुन क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व द्वारा व्यक्त किया गया मजबूत समर्थन रहा। असम, अरुणाचल प्रदेश और डीएचएसी  के वरिष्ठ प्रतिनिधियों की भागीदारी ने किसानों की चिंताओं पर चर्चा करने और मिथुन-आधारित आजीविका को मजबूत करने के लिए व्यावहारिक मार्गों की पहचान करने हेतु एक मूल्यवान मंच प्रदान किया।

चर्चाओं में मिथुन पालन के लिए दीमा हसाओ की प्राकृतिक उपयुक्तता, विशेष रूप से इसकी अनुकूल जलवायु और स्थानीय कृषि-पारिस्थितिक परिस्थितियों पर प्रकाश डाला गया। प्रतिभागियों ने वैज्ञानिक उत्पादन प्रणालियों, बेहतर पशुपालन, बेहतर पशु स्वास्थ्य सेवाओं, मजबूत बुनियादी ढांचे और उपयुक्त सरकारी सहयोग के माध्यम से इस क्षमता का लाभ उठाने की आवश्यकता पर जोर दिया। 450 से अधिक किसानों की भागीदारी ने जिले में मिथुन-आधारित आजीविका के अवसरों में बढ़ती रुचि को दर्शाया, जबकि मंत्रियों और वरिष्ठ हितधारकों द्वारा दिए गए सहयोग के आश्वासन ने मिथुन उत्पादन और संबंधित पशुधन गतिविधियों को मजबूत करने के प्रयासों को नई गति प्रदान की।

कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण “पूर्वोत्तर क्षेत्र में मिथुन क्षेत्र के विकास की रणनीतियां” विषय पर आयोजित गोलमेज चर्चा थी, जिसका संचालन डॉ. के. एम. बुजरबरुआ और डॉ. गिरीश पाटिल एस. ने किया। चर्चा में असम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागालैंड के वरिष्ठ नीति-निर्माताओं, सरकारी अधिकारियों, वैज्ञानिकों, किसान प्रतिनिधियों और अन्य हितधारकों ने भाग लिया।

विचार-विमर्श में वैज्ञानिक मिथुन पालन, बेहतर पशुपालन पद्धतियों, बाड़बंदी और अर्ध-गहन पालन प्रणालियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। प्रतिभागियों ने बाड़बंदी, पालन प्रणालियों और पशु देखभाल को शामिल करते हुए मानक संचालन प्रक्रियाओं (एससीपी) के विकास का आह्वान किया। बाड़बंदी की उच्च लागत और वन एवं सरकारी भूमि के उपयोग से जुड़ी चुनौतियों पर भी चर्चा की गई तथा बाड़बंदी और अर्ध-गहन मिथुन पालन को सुगम बनाने के लिए उपयुक्त नीति ढांचा विकसित करने का प्रस्ताव रखा गया।

असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में मिथुन की क्षेत्रीय विविधता को देखते हुएमिथुन की विभिन्न आबादियों के उचित नस्ल पंजीकरण और लक्षण-वर्णन की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला गया,।

पशु स्वास्थ्य प्रमुख क्षेत्रों में से एक के रूप में उभरकर सामने आया, जिसमें केंद्रित हस्तक्षेप की आवश्यकता है। खुरपका-मुंहपका रोग (एफएमडी) को एक महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में चिन्हित किया गया, और प्रतिभागियों ने टीकाकरण कवरेज बढ़ाने, क्षेत्रीय स्तर पर रोग निगरानी, एफएमडी से संबंधित मृत्यु दर का व्यवस्थित आकलन तथा भाकृअनुप–एनआरसीएम में अनुसंधान पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता पर जोर दिया।

मिथुन के लिए एनएडीसीपी /एफएमडी टीकाकरण, एफएमडी–सीपी और एफएमडी-मुक्त भारत कार्यक्रम के महत्व पर जोर दिया गया, साथ ही रोग नियंत्रण और बाड़बंदी के लिए उपयुक्त सरकारी सहयोग की आवश्यकता बताई गई। प्रतिभागियों ने पशु स्वास्थ्य, उत्पादकता और किसानों के लाभ में सुधार के लिए चारा उत्पादन, आहार प्रबंधन और गुणवत्तापूर्ण चारा संसाधनों तक पहुंच पर भी अधिक ध्यान देने का आह्वान किया।

गोलमेज चर्चा में मिथुन के खाद्य पशु, आजीविका संसाधन और पूर्वोत्तर की महत्वपूर्ण पशुधन विरासत के रूप में महत्व को भी रेखांकित किया गया। नागालैंड के अनुभवों से पता चला कि अर्ध-गहन कृषि प्रणालियों ने किसानों को मिथुन पालन फिर से शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया है, जो ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने में बेहतर उत्पादन प्रणालियों की क्षमता को दर्शाता है।

चर्चाओं में इस बात पर जोर दिया गया कि “वोकल फॉर लोकल” दृष्टिकोण के अनुरूप मिथुन का संरक्षण और सतत उपयोग आजीविका विकास के साथ-साथ चलना चाहिए। प्रतिभागियों ने इस क्षेत्र के लिए व्यापक योजनाओं और मजबूत संस्थागत तथा नीतिगत सहयोग का आह्वान किया।

तकनीकी सत्रों ने वैज्ञानिक ज्ञान को मिथुन और पशुधन किसानों के लिए व्यावहारिक समाधानों में परिवर्तित करने का मंच प्रदान किया। सत्रों की अध्यक्षता डॉ. पल्लभ चौधरी, संयुक्त निदेशक, भाकृअनुप–आईवीआरआई, बेंगलुरु ने की, जबकि डॉ. किशोर बरुआ, जीबी सदस्य, भाकृअनुप, सह-अध्यक्ष रहे। “किसानों की आय बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक मिथुन उत्पादन” विषय पर एक समर्पित प्रस्तुति में मिथुन उत्पादन के वैज्ञानिक दृष्टिकोण और बेहतर उत्पादन एवं प्रबंधन पद्धतियों के माध्यम से कृषि आय में सुधार के अवसरों पर प्रकाश डाला गया।

वैज्ञानिक सूकर पालन और डेयरी फार्मिंग पर एक तकनीकी सत्र में ग्रामीण आजीविका में विविधता लाने और आय बढ़ाने के लिए संबद्ध पशुधन उद्यमों तथा एकीकृत कृषि दृष्टिकोण की संभावनाओं पर प्रकाश डाला गया। एक अन्य सत्र “खुरपका-मुंहपका रोग (एफएणडी) – रोकथाम एवं नियंत्रण” पर केन्द्रित था, जिसमें टीकाकरण, निगरानी, मृत्यु दर आकलन और रोग प्रबंधन से संबंधित मुद्दों को संबोधित किया गया, जो गोलमेज चर्चा के दौरान प्रमुखता से उभरकर सामने आए थे।

4th Mithun Day Celebrated in Haflong with Participation of Over 450 Farmers; Ministers Assure Support for Strengthening Mithun Sector in Dima Hasao

तकनीकी कार्यक्रम का समापन एक विस्तृत किसान–वैज्ञानिक संवाद के साथ हुआ, जिसमें किसानों ने सक्रिय रूप से भाग लिया और मिथुन पालन, पशु स्वास्थ्य, आहार, प्रबंधन, रोग रोकथाम और पशुधन उत्पादन से संबंधित अपने क्षेत्रीय अनुभव तथा चिंताएं साझा कीं।

इस संवाद ने वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों को किसानों के सवालों का सीधे जवाब देने का अवसर प्रदान किया, जबकि शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं को जमीनी स्तर पर सामने आने वाली चुनौतियों की बेहतर समझ प्राप्त हुई। किसानों की उत्साहपूर्ण भागीदारी ने निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन, क्षमता निर्माण, विस्तार सहयोग और किसान-केंद्रित अनुसंधान की मजबूत मांग को प्रदर्शित किया।

गोलमेज चर्चा में मिथुन से संबंधित प्रबंधन कार्यक्रमों, अनुसंधान परियोजनाओं और सहयोगात्मक अध्ययनों के लिए भाकृअनुप–एनआरसीएम, असम विश्वविद्यालय तथा अन्य शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने का भी आह्वान किया गया। प्रतिभागियों ने उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए मिथुन पर नेटवर्क परियोजना, चारा अनुसंधान, एफएमडी प्रबंधन, विस्तार गतिविधियों और बेहतर पालन प्रणालियों को मजबूत करने के साथ-साथ अधिक संस्थागत समन्वय के महत्व पर जोर दिया।

विचार-विमर्श में निष्कर्ष निकाला गया कि मिथुन क्षेत्र के सतत विकास के लिए राजनीतिक प्रतिबद्धता, किसानों की भागीदारी, वैज्ञानिक अनुसंधान, सरकारी योजनाओं और अंतर-संस्थागत सहयोग को शामिल करते हुए समन्वित दृष्टिकोण की आवश्यकता है। प्रतिभागियों ने पूर्वोत्तर में मिथुन के भविष्य पर विचार-विमर्श के लिए मंत्रियों, किसानों, वैज्ञानिकों, सरकारी अधिकारियों और अन्य हितधारकों को एक साझा मंच पर लाने के लिए भाकृअनुप–एनआरसीएम की सराहना की।

चौथा मिथुन दिवस मिथुन पालन को अधिक वैज्ञानिक, उत्पादक, टिकाऊ और आजीविका-केन्द्रित बनाने की नई प्रतिबद्धता के साथ संपन्न हुआ। मजबूत राजनीतिक समर्थन, किसानों की सक्रिय भागीदारी और भाकृअनुप संस्थानों, विश्वविद्यालयों, सरकारी विभागों तथा स्वायत्त परिषदों के बीच समन्वय के साथ, इस कार्यक्रम ने दीमा हसाओ में मिथुन क्षेत्र को मजबूत करने और पूर्वोत्तर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इसके योगदान को बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया।

(स्रोत: भाकृअनुप–राष्ट्रीय मिथुन अनुसंधान केन्द्र, मेडजिफेमा, नागालैंड)

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