अधिक और टिकाऊ आमदनी के लिए बाढ़जल का उपयोग

Innovative Approach to Utilize Flood Water for Higher and Sustainable Incomeतटवर्ती निचले मैदानों में मौसमी बाढ़ का पानी भर जाता है और यह क्षेत्र लगभग 4 महीनों तक (जुलाई-अक्‍तूबर) 0.5-2.0 मी. तक की गहराई वाले जल से भरे रहते हैं। इसका कारण इस क्षेत्र की भूमि की तश्‍तरी के समान संरचना, दक्षिण-पश्चिमी मानसून (जुलाई-सितम्‍बर) के दौरान उच्‍च वर्षा (औसतन 1500 मि.मी.), घटिया जलनिकासी तथा समुद्र से एकत्रित जल का धीमे निपटान होना है। दूसरी ओर बाढ़ के पश्‍चात् दिसम्‍बर के बाद से जमीन सूखना शुरू कर देती है और पूरक सिंचाई के बिना खेती करना असंभव हो जाता है।

भा.कृ.अनु.प.- भारतीय जल प्रबंधन संस्‍थान, भुबनेश्वर  ने मौसमी बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की उत्‍पादकता को सुधारने के महत्‍व को अनुभव किया है तथा फसल और जल प्रबंध की एक नई युक्ति विकसित की है। विशेष रूप से डिजाइन की गई जल संग्रहण संरचनाओं के माध्‍यम से वर्षा के मौसम में बाढ़ के जल को एकत्र करके बाढ़ के बाद की अवधि के दौरान रबी फसलें उगाने के लिए पूरक सिंचाई का प्रावधान किया गया। संग्रहीत बाढ़ के जल से गहरे जल में चावल-मछली की एकीकृत फार्मिंग प्रणाली विकसित की गई। इस प्रणाली में बरसात के मौसम में गहरे जल में उगने वाली चावल की और अन्‍य जलीय फसलों को उगाना तथा जल संग्रहण संरचनाओं में मछलियों को पालना, बाढ़ के पश्‍चात् के सूखे मौसम के दौरान एकत्र किए गए जल में रबी चावल और सब्जियों की खेती तथा बांध के किनारे फलों के मौसमों की अल्‍प अवधि के दौरान फलों और सब्जियों को उगाना शामिल है।

Innovative Approach to Utilize Flood Water for Higher and Sustainable IncomeInnovative Approach to Utilize Flood Water for Higher and Sustainable Income

बाढ़ की अवधि के दौरान चावल की 'हंगसेस्‍वारी', सरस्‍वति जैसी उच्‍च उपजशील, जलाक्रांत स्थितियों की सहिष्‍णु चावल की किस्‍में तथा उच्‍च मूल्‍य वाली जलीय औषधीय फसल (एकोरस कैलमस) को उगाने की विधियां मानकीकृत की गईं। इस नवोन्‍मेषी प्रणाली से किसानों को बाढ़ग्रस्‍त पारिस्थितिक प्रणाली में प्रति हैक्‍टर 80-90 हजार रुपये तक की आमदनी हुई जबकि पहले इन क्षेत्रों में कोई भी फसल नहीं उगती थी। वर्तमान में ओडिशा के पुरी जिले के कानस और सत्‍याबादी ब्‍लॉक के 150 किसानों ने तटवर्ती बाढ़ प्रवण क्षेत्रों में गहरे जल में चावल का उत्‍पादन लेना शुरू किया है।

राज्‍य सरकार भी भा.कृ.अनु.प. – आईआईडब्‍ल्‍यूएम, भुबनेश्वर  की फार्मिंग प्रणाली के अंतर्गत अनुशंसित जल संभरण की संरचनाओं को तैयार करके इस प्रौद्योगिकी को लागू करने में आगे आई है। वर्तमान में इस जलवायु समुत्‍थान प्रौद्योगिकी को एनआईसीआरए (जलवायु समुत्‍थान कृषि के लिए राष्‍ट्रीय पहल) योजना के अंतर्गत शामिल किया गया है, ताकि यह संस्‍थान इसमें और सुधार कर सके।

(स्रोत : भाकृ.अनु.प. – आईआईडब्‍ल्‍यूएम भुबनेश्वर )