अनुसंधान से बाजार तक की राह को सुदृढ़ करना: भाकृअनुप-सिफरी द्वारा आईपीआर एवं प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर कार्यशाला का आयोजन

अनुसंधान से बाजार तक की राह को सुदृढ़ करना: भाकृअनुप-सिफरी द्वारा आईपीआर एवं प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर कार्यशाला का आयोजन

17 अगस्त, 2026, बैरकपुर

वैज्ञानिक नवाचारों को बाजार के लिए तैयार समाधानों में परिवर्तित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में, भाकृअनुप-केन्द्रीय अन्तर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-सिफरी), बैरकपुर, द्वारा संस्थान के 80वें वर्ष के समारोह के अंतर्गत अपने मुख्यालय में “बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) एवं प्रौद्योगिकी हस्तांतरण” विषय पर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों, सरकारी अधिकारियों, उद्यमियों तथा मात्स्यिकी क्षेत्र से जुड़े हितधारकों ने भाग लिया और बौद्धिक संपदा संरक्षण, प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण तथा प्रयोगशाला से किसानों, उद्यमियों, उद्योग एवं सामाजिक संस्थाओं तक अनुसंधान नवाचारों को प्रभावी ढंग से पहुँचाने पर विचार-विमर्श किया गया।

 

हिंदी में आयोजित इस कार्यशाला में पेटेंट, कॉपीराइट, औद्योगिक डिज़ाइन, ट्रेडमार्क तथा संस्थागत प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तंत्र के रणनीतिक महत्व पर प्रकाश डाला गया तथा अनुसंधान के व्यावसायीकरण के लिए अनुकूल वातावरण विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया।

कार्यशाला के प्रारंभ में श्री गणेश चंद्र, प्रधान अन्वेषक, आइटीमयू, ने स्वागत सम्बोधन किया। कार्यक्रम में डॉ. अशोक कुमार पात्रा, कुलपति, बिधान चंद्र कृषि विश्वविद्यालय, मोहनपुर, मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। प्रो. (डॉ.) कुमारवेल वी., संयुक्त निदेशक (प्रशासन) एवं विभागाध्यक्ष, पैथोलॉजी एवं माइक्रोबायोलॉजी, राष्ट्रीय होम्योपैथी संस्थान, आयुष मंत्रालय, कोलकाता, श्रीमती ए. एस. अल्वी, संयुक्त निदेशक, मत्स्य विभाग, पश्चिम बंगाल सरकार तथा डॉ. एम.ए. हसन, पूर्व प्रभागाध्यक्ष, भाकृअनुप-सिफरी भी कार्यक्रम में उपस्थित थे।  

डॉ. प्रवीण मलिक, मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ), एग्रीनोवेट इंडिया लिमिटेड, नई दिल्ली, वर्चुअल माध्यम से विशिष्ट अतिथि के रूप में कार्यक्रम में शामिल हुए। मुख्य व्याख्यान देते हुए डॉ. मलिक ने कहा कि बौद्धिक संपदा का संरक्षण केवल पहला कदम है; अंतिम उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रभावी व्यावसायीकरण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के माध्यम से प्रौद्योगिकियाँ अंतिम उपयोगकर्ताओं तक पहुँचें। उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण एवं उनके व्यापक उपयोग को सुगम बनाने में एग्रीनोवेट इंडिया लिमिटेड की भूमिका पर प्रकाश डाला।

          

मुख्य अतिथि के रूप में अपने संबोधन में डॉ. पात्रा ने कहा कि वैज्ञानिक नवाचारों को किसानों, उद्यमियों और समाज के लिए ठोस लाभों में परिवर्तित करने हेतु सुदृढ़ IPR संरक्षण और प्रभावी प्रौद्योगिकी हस्तांतरण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सिफरी, ने वैज्ञानिक नवाचारों को सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव वाली प्रौद्योगिकियों में परिवर्तित करने में बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपीआर) की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि एक सुदृढ़ नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण, उद्यमिता को बढ़ावा देने तथा स्वदेशी प्रौद्योगिकियों को प्रयोगशाला से खेत तक शीघ्र पहुँचाने के लिए बौद्धिक संपदा का प्रभावी संरक्षण, प्रबंधन एवं व्यावसायीकरण आवश्यक है। डॉ. डे ने आगे कहा कि अनुसंधान–उद्योग–उद्यमी के बीच मजबूत संबंध स्थापित करने तथा नवाचार और प्रौद्योगिकी के स्वामित्व की संस्कृति को बढ़ावा देने से “विकसित भारत@2047” के लक्ष्य को महत्वपूर्ण रूप से गति मिलेगी। इससे भारत अपनी वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षमताओं का उपयोग समावेशी विकास, आत्मनिर्भरता और सतत विकास के लिए कर सकेगा, विशेष रूप से मात्स्यिकी क्षेत्र में।

श्रीमती ए.एस. अल्वी, संयुक्त निदेशक, मत्स्य विभाग, पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने वक्तव्य में राज्य के मात्स्यिकी क्षेत्र के विकास में सिफरी द्वारा दिए जा रहे सहयोग की सराहना की। उन्होंने कहा कि सिफरी द्वारा प्रदान किए गए प्रशिक्षण एवं कौशल विकास कार्यक्रमों के परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल मत्स्य बीज उत्पादन के क्षेत्र में प्रगति हुई है। उन्होंने भविष्य में पिंजरों में नई मछली प्रजातियों के पालन के लिए भी सिफरी के तकनीकी सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की पहल वैज्ञानिक नवाचार और जमीनी स्तर पर उनके अनुप्रयोग के बीच की खाई को पाटने, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देने, उद्यमिता को प्रोत्साहित करने तथा मात्स्यिकी क्षेत्र के सतत विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगी।

   

कार्यशाला का एक प्रमुख आकर्षण “नवाचार से उद्यम तक प्रौद्योगिकी लाइसेंसिंग” रहा। इस अवसर पर भाकृअनुप-सिफरी द्वारा केन्द्रीय तसर अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (सीएसयर-सीटीआरआई) के सहयोग से विकसित रेशमीन गोल्ड+ मछली आहार प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण के लिए लाइसेंस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। यह समझौता इस सहयोगात्मक अनुसंधान नवाचार के व्यावसायीकरण और इसके व्यापक उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। साथ ही, इससे उद्यमिता के नए अवसरों तथा मात्स्यिकी प्रौद्योगिकी के बाजारोन्मुख उपयोग की संभावनाएँ भी बढ़ेंगी।

एक अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में भाकृअनुप-सिफरी और राष्ट्रीय होम्योपैथी संस्थान (NIH) के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किया गया। इस MoU के माध्यम से संस्थागत सहयोग, ज्ञान के आदान-प्रदान, संयुक्त अनुसंधान तथा पारस्परिक रूप से सहमत क्षेत्रों में नवीन अनुप्रयोगों की संभावनाओं के अन्वेषण के लिए एक रूपरेखा स्थापित की गई है। यह उभरती वैज्ञानिक एवं सामाजिक चुनौतियों के समाधान में अंतर्विषयक साझेदारियों के बढ़ते महत्व को दर्शाता है।

इस अवसर पर स्मारिका “80 Years of CIFRI Technologies” का भी विमोचन किया गया, जिसमें संस्थान की आठ दशकों की अनुसंधान यात्रा, तकनीकी नवाचारों तथा अन्तर्स्थलीय मात्स्यिकी के विकास में योगदान को प्रस्तुत किया गया है। कार्यक्रम को और अधिक महत्वपूर्ण बनाते हुए सिफरी द्वारा विकसित “वेटलैंड हेल्थ कार्ड” का भी विमोचन किया गया, जो आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्रों के वैज्ञानिक आकलन, निगरानी एवं सतत प्रबंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

कार्यशाला ने IPR संरक्षण, प्रौद्योगिकी प्रबंधन तथा ICAR प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए एक रणनीतिक मंच के रूप में कार्य किया।

(भाकृअनुप-केन्द्रीय अन्तर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर)

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