27 अप्रैल, 2026, उत्तर प्रदेश
भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा आज उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के ग्राम जसरोपनगर गोयाना में “मेरा गांव-मेरा गौरव” कार्यक्रम के अंतर्गत “संतुलित उर्वरक उपयोग” अभियान के तहत कृषक संगोष्ठी का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम उक्त अभियान के अंतर्गत आयोजित गतिविधियों की श्रृंखला का प्रारंभिक चरण था। कार्यक्रम में 314 किसानों के साथ-साथ वैज्ञानिकों एवं कृषि अधिकारियों ने भाग लिया, जिससे किसानों की सक्रिय सहभागिता देखने को मिली।

यह आयोजन एक राष्ट्रव्यापी पहल का हिस्सा है, जिसके अंतर्गत भाकृअनुप-आईएआरआई, पूसा, नई दिल्ली, के साथ-साथ झारखंड एवं असम परिसरों तथा देशभर में स्थित 9 क्षेत्रीय स्टेशनों के 129 वैज्ञानिक दल लगभग 700 गांवों का दौरा करेंगे। इस पहल में लगभग 600 वैज्ञानिक शामिल हैं, जो किसानों के साथ प्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन एवं सतत कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने का कार्य करेंगे।
मुख्य अतिथि के रूप में अपने संबोधन में डॉ. चेरुकमल्ली श्रीनिवास राव, निदेशक, भाकृअनुप-आईएआरआई सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने के महत्व पर बल दिया। उन्होंने बताया कि उर्वरकों के उपयोग से पूर्व मृदा परीक्षण अत्यंत आवश्यक है तथा किसानों को केवल यूरिया पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश का संतुलित उपयोग करना चाहिए।

उन्होंने हरित खाद, जैव उर्वरकों, वर्मी कम्पोस्टिंग, मल्चिंग एवं संरक्षित खेती जैसी तकनीकों को अपनाने के लिए किसानों को प्रेरित किया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि फसल अवशेषों को प्रभावी रूप से जैविक खाद में परिवर्तित किया जा सकता है। जलवायु परिवर्तन एवं पर्यावरणीय चुनौतियों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि संतुलित पोषक तत्वों का उपयोग मृदा की उर्वरता बनाए रखने तथा किसानों की आय बढ़ाने के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने किसानों को किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) के गठन हेतु भी प्रेरित किया, जिससे सामूहिक शक्ति एवं विपणन क्षमता में वृद्धि हो सके।
किसानों के लाभार्थ पूसा एसटीएफआर मीटर, पूसा जैव उर्वरक एवं पूसा डीकम्पोजर पर व्याख्यान एवं प्रदर्शन आयोजित किया गया। इन सत्रों में मृदा स्वास्थ्य एवं एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन, मृदा परीक्षण हेतु पूसा एसटीएफआर मीटर का उपयोग, जैव उर्वरक एवं कम्पोस्टिंग तकनीक, फसल विविधीकरण तथा जैविक एवं प्राकृतिक खेती जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया। इसके अतिरिक्त दलहनी फसलों के लिए सतत तकनीकों पर विशेष सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने पर बल दिया गया।

डॉ. आर.एन. पडारिया, संयुक्त निदेशक (प्रसार); डॉ देबाशीष मंडल, अध्यक्ष, मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन विज्ञान संभाग; डॉ लिवलीन शुक्ला, प्रधान वैज्ञानिक, माइक्रोबायोलॉजी,; डॉ. बृजेश मिश्रा, प्रधान वैज्ञानिक, सूक्ष्मजीव विज्ञान; डॉ. राजीव कुमार, प्रधान वैज्ञानिक, कृषि सस्य विज्ञान; डॉ. दिनेश कुमार, प्रधान वैज्ञानिक, सस्य विज्ञान; डॉ. संदीप लाल, प्रधान वैज्ञानिक, बीज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संभा; तथा डॉ. देबरूप दास, वैज्ञानिक, मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन विज्ञान संभाग भी इस अवसर पर उपस्थित रहे।
यह पहल किसानों के बीच जागरूकता बढ़ाने तथा सतत एवं जलवायु अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाने हेतु निरंतर प्रयासों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
(भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली)








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