20 अगस्त, 2026, अल्मोड़ा
उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों (जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, लद्दाख, मणिपुर, मेघालय एवं अरुणाचल प्रदेश) के किसानों के लिए गेहूं की नई उन्नत किस्म वी.एल. 3040 की पहचान की गई है। इस प्रजाति की पहचान 18 से 20 अगस्त, 2026 को राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान, दुर्गापुरा, जयपुर में आयोजित 65वीं अखिल भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान कार्यकर्ता बैठक के दौरान “प्रजाति पहचान समिति” द्वारा की गई।

यह उपलब्धि भाकृअनुप–विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (वीपीकेएएस), अल्मोड़ा, के वैज्ञानिकों के लिए काफी महत्वपूर्ण है। वी.एल. 3040 लोकप्रिय गेहूं किस्म वी.एल. गेहूँ 892 का मार्कर बैकक्रॉस प्रजनन द्वारा विकसित उन्नत रूप है। इसका विकास एवं डॉ. लक्ष्मी कान्त, निदेशक एवं प्रधान गेहूं प्रजनक, वीपीकेएएस, के नेतृत्व में किया गया। इस कार्य में डॉ. नवीन चन्द्र गहत्याड़ी, डॉ. के.के. मिश्रा, डॉ. राकेश भौमिक तथा डॉ. रघु बी.आर. ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
वी. एल. 3040 में पीला एवं भूरा रतुआ रोगों के प्रति प्रतिरोध प्रदान करने वाले वाईआर10 एवं एलआर24 जीनों का समावेश किया गया है। इस प्रकार, वी.एल. गेहूँ 892 की पर्वतीय परिस्थितियों के प्रति अनुकूलता को बनाए रखते हुए इसकी रतुआ प्रतिरोधक क्षमता में सुधार किया गया है। दो वर्षों के समन्वित परीक्षणों में वी. एल. 3040 ने 28.2 कुन्तल प्रति हैक्टर की औसत उपज दर्ज की, जो इसकी मूल किस्म वी.एल. गेहूँ 892 की उपज (26.6 कुन्तल प्रति हैक्टर) से 6 प्रतिशत अधिक रही। देर से बुवाई में इसकी उपज मूल किस्म से 6.33 प्रतिशत तथा बहुत देर से बुवाई में 2.41 प्रतिशत अधिक रही।
यह किस्म विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों की देर से बोई जाने वाली तथा सीमित सिंचाई वाली परिस्थितियों के लिए उपयोगी है। इसकी देर से बुवाई के प्रति अनुकूलता पर्वतीय किसानों को आलू, मटर एवं अन्य अतिरिक्त फसलें लेने के लिए अधिक अवसर प्रदान कर सकती है, जिससे फसल विविधीकरण के साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायता मिल सकती है। वी. एल. 3040 की पौध ऊंचाई लगभग 80–85 सेमी तथा परिपक्वता अवधि 150–155 दिन है। इसके दानों में औसतन 11.7 प्रतिशत प्रोटीन, 43.2 पीपीएम लौह तत्व तथा 32.2 पीपीएम जस्ता पाया गया है। इस प्रकार, यह किस्म उत्पादन के साथ-साथ पोषण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
यह किस्म वी.एल. गेहूँ 892 की अनुकूलता को बनाए रखते हुए अधिक उपज, बेहतर रतुआ प्रतिरोध तथा देर से बुवाई वाली परिस्थितियों के प्रति अनुकूलता का संयोजन प्रदान करती है। आशा है कि यह प्रजाति पर्वतीय क्षेत्रों में गेहूं उत्पादन की स्थिरता बढ़ाने तथा किसानों के लिए फसल विविधीकरण के अवसर बढ़ाने में सफल होगी।
(भाकृअनुप–विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा)








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