भारत के पूर्वी तट पर सीप जलीय कृषि को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में, भाकृअनुप-केन्द्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, कोच्चि के मद्रास क्षेत्रीय केंद्र ने भारतीय बैकवाटर सीप (Crassostrea madrasensis) के 1 लाख कल्चलेस स्पैट का सफल हैचरी उत्पादन और स्थानांतरण किया है।
स्पैट का उत्पादन पीएमएमएसवाई–ब्लू ग्रोथ परियोजना के तहत कोवलम फील्ड लेबोरेटरी, चेन्नई में किया गया और इसके बाद इन्हें महाराष्ट्र मैंग्रोव सेल को उपलब्ध कराया गया। यह उपलब्धि तमिलनाडु से आगे हैचरी उत्पादन प्रौद्योगिकी के सफल हस्तांतरण को प्रदर्शित करती है।

यह उपलब्धि द्विकपाटी कृषकों के सामने आने वाली एक प्रमुख चुनौती—प्राकृतिक सीप बीज की अनिश्चित उपलब्धता—का समाधान करती है। अनियमित स्पैटफॉल, जलवायु परिवर्तनशीलता, पर्यावरणीय उतार-चढ़ाव और अन्य मानव-जनित कारक प्राकृतिक पुनर्भरण को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे पूर्वी तट पर बीज की उपलब्धता और द्विकपाटी उत्पादन में उतार-चढ़ाव होता है।
इस बाधा को दूर करने के लिए, मद्रास क्षेत्रीय केन्द्र ने कोवलम फील्ड लेबोरेटरी में भारत के पूर्वी तट पर पहली अनुसंधान-स्तरीय द्विकपाटी हैचरी सुविधा स्थापित की, जिसका उद्देश्य पूरे वर्ष गुणवत्तापूर्ण द्विकपाटी बीज का उत्पादन करना और द्विकपाटी जलीय कृषि के विविधीकरण को समर्थन प्रदान करना है।

कोवलम सुविधा में संलग्न खाद्य सीप स्पैट के उत्पादन से इस सफलता को और मजबूती मिली है। लगभग 1.5 लाख पेडिवेलिगर लार्वा सफलतापूर्वक स्वच्छ किए गए सीप के खोल वाले सब्सट्रेट पर स्थिर हुए और उनसे संलग्न सीप स्पैट का उत्पादन हुआ। इन स्पैट का उपयोग पुलिकट लैगून में खेती के परीक्षणों के लिए किया जाना प्रस्तावित है, जिससे तमिलनाडु तट पर सीप पालन प्रौद्योगिकी के आगे प्रदर्शन और विकास का मार्ग प्रशस्त होगा।
स्थानांतरण के लिए कल्चलेस स्पैट का सफल उत्पादन और खेती के परीक्षणों के लिए संलग्न स्पैट का उत्पादन—ये दोनों उपलब्धियाँ कोवलम सुविधा की गुणवत्तापूर्ण सीप बीज के स्रोत के रूप में क्षमता तथा भारत के पूर्वी तट पर हैचरी-आधारित सीप जलीय कृषि को आगे बढ़ाने के एक मंच के रूप में इसकी भूमिका को रेखांकित करती हैं।
(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, कोच्चि)







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