पंजाब के हितधारकों ने फसल अवशेष प्रबंधन के लिए एकीकृत कार्य एजेंडा तैयार किया

पंजाब के हितधारकों ने फसल अवशेष प्रबंधन के लिए एकीकृत कार्य एजेंडा तैयार किया

30 सितंबर 2026, लुधियाना

फसल अवशेष प्रबंधन: सतत समाधान के लिए अभिसरण और तालमेल विषय पर एक उच्चस्तरीय ‘हितधारक कार्यशाला’ का आयोजन भाकृअनुप-कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, लुधियाना द्वारा पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू), लुधियाना में किया गया। इसमें नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों, विस्तार एजेंसियों, किसानों, किसान संगठनों, कृषि मशीनरी निर्माताओं, कस्टम हायरिंग केंद्रों (सीएचसी), सेवा प्रदाताओं, गैर-सरकारी संगठनों/नागरिक समाज संगठनों और उद्योग प्रतिनिधियों ने भाग लिया तथा फसल अवशेष प्रबंधन के लिए समन्वित रणनीति पर विचार-विमर्श किया।

श्री सुखजीत पाल सिंह, आईएएस, कुलपति, पीएयू, लुधियाना, मुख्य अतिथि थे, जबकि डॉ. रंजय सिंह, सहायक महानिदेशक (कृषि विस्तार), भाकृअनुप, सम्मानित अतिथि थे।

Punjab Stakeholders Forge Integrates Action Agenda for Crop Residue Management

अन्य गणमान्य व्यक्तियों में डॉ. परवेंद्र श्योराण, निदेशक, भाकृअनुप-अटारी, लुधियाना; डॉ. जे.पी. मिश्रा, निदेशक, भाकृअनुप-अटारी, जोधपुर; डॉ. एम.एस. भुल्लर, निदेशक, विस्तार शिक्षा, पीएयू; और डॉ. अजमेर सिंह धट्‌ट, निदेशक, अनुसंधान, पीएयू शामिल थे।

श्री सुखजीत पाल सिंह ने निरंतर अनुसंधान, क्षेत्रीय सत्यापन और सफल फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम) प्रथाओं के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण के माध्यम से साक्ष्य-आधारित समाधानों को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने पंजाब की फसल अवशेष प्रबंधन संबंधी चुनौतियों के लिए वैज्ञानिक सहायता प्रदान करने और व्यापक स्तर पर लागू किए जा सकने वाले समाधान विकसित करने में पीएयू की भूमिका पर प्रकाश डाला।

डॉ. रंजय सिंह ने भाकृअनुप संस्थानों, विस्तार एजेंसियों और क्षेत्रीय हितधारकों के बीच बेहतर अभिसरण पर जोर दिया तथा समन्वित विस्तार प्रयासों के माध्यम से प्रमाणित प्रौद्योगिकियों और अनुसंधान परिणामों को किसानों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।

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विचार-विमर्श में सीआरएम मूल्य श्रृंखला के पांच प्रमुख विषयों को शामिल किया गया: मशीनीकरण, सीएचसी और प्रौद्योगिकी समाधानों के माध्यम से खेत में ही (इन-सिटू) प्रबंधन; बायोमास एकत्रीकरण, मूल्य संवर्धन, ऊर्जा और कार्बन अवसरों के माध्यम से खेत से बाहर (एक्स-सिटू) प्रबंधन; फसल विविधीकरण और सतत कृषि के माध्यम से अवशेष उत्पादन में कमी; जागरूकता, प्रोत्साहन, सामुदायिक कार्रवाई और प्रवर्तन के माध्यम से किसानों द्वारा अपनाया जाना; तथा नीति, साझेदारी, वित्तपोषण और समन्वित कार्रवाई के माध्यम से अभिसरण।

कार्यशाला में फसल अवशेष जलाने की घटनाओं को कम करने में पंजाब की महत्वपूर्ण प्रगति को रेखांकित किया गया। इस बात पर जोर दिया गया कि अगले चरण में मौजूदा सीआरएम मशीनरी के कुशल उपयोग और इष्टतम तैनाती पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए, जिसमें मशीन क्षमता का वास्तविक मांग के साथ जिलावार मिलान किया जाए। लगभग 31.76 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती और लगभग 2 करोड़ टन पराली उत्पादन को देखते हुए, प्रतिभागियों ने मृदा और फसल-विशिष्ट मशीनरी चयन, डिजिटल मैपिंग, बेहतर सीएचसी समन्वय और बेलर ट्रैकिंग के विस्तार की आवश्यकता पर जोर दिया।

विचार-विमर्श में धान की पराली की जैव ऊर्जा, सीबीजी, औद्योगिक उपयोग और कार्बन बाजारों की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला गया, साथ ही एकत्रीकरण, परिवहन, भंडारण, अर्थशास्त्र और सुनिश्चित बायोमास उठाव से संबंधित चुनौतियों की पहचान की गई। प्रतिभागियों ने व्यवहार्य बायोमास आपूर्ति श्रृंखलाओं और एक्स-सिटू उपयोग के लिए खेतों से पराली हटाए जाने की स्थिति में उचित पोषक तत्वों की पूर्ति की आवश्यकता पर जोर दिया।

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डॉ. परवेंद्र श्योराण, निदेशक, भाकृअनुप-अटारी, लुधियाना ने मशीन-केन्द्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर मांग-आधारित, स्थान-विशिष्ट और अभिसरण-आधारित सीआरएम रणनीति अपनाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने केवीके, किसानों, सीएचसी, कृषि मशीनरी निर्माताओं, सेवा प्रदाताओं और उद्योग के बीच समन्वित कार्रवाई पर जोर दिया तथा समन्वित पहुंच, प्रौद्योगिकी परिनियोजन और हितधारक कार्रवाई के लिए एक साझा मंच के रूप में सीआरएम कनेक्ट का प्रस्ताव रखा।

कार्यशाला का एक प्रमुख परिणाम “सीआरएम कनेक्ट - सहयोगात्मक आउटरीच एवं न्यू एक्सटेंशन, कन्वर्जेंस एंड टेक्नोलॉजी नेटवर्क” का प्रस्ताव रहा। इस मंच की परिकल्पना हितधारकों को समन्वित योजना, साझा क्षेत्रीय कैलेंडर, प्रौद्योगिकी प्रसार, डेटा साझाकरण और क्षेत्रीय स्तर की चुनौतियों के समय पर समाधान के लिए एक साथ लाने के रूप में की गई है।

कार्यशाला का समापन सीआरएम कनेक्ट को कार्यान्वित करने तथा सतत फसल अवशेष प्रबंधन के लिए सहयोगात्मक कार्रवाई को मजबूत करने की प्रतिबद्धता के साथ हुआ। इसका साझा उद्देश्य फसल अवशेष जलाने की घटनाओं को और कम करना तथा पंजाब में अधिक स्वच्छ और संसाधन-कुशल कृषि को बढ़ावा देना है।

(स्रोत: भाकृअनुप-कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, लुधियाना)

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