किसान को कर्ज नहीं, भरोसा और सरल व्यवस्था चाहिए- श्री शिवराज सिंह चौहान
KCC के साथ प्रक्रियाओं का सरलीकरण और मानवीय व्यवहार भी जरूरी- शिवराज
तकनीक उपयोगी है, लेकिन उसकी सीमाएं समझना भी उतना ही आवश्यक- केंद्रीय कृषि मंत्री श्री शिवराज सिंह
छोटे किसानों की आय बढ़ाने के लिए इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल पर श्री शिवराज सिंह चौहान का जोर
योजना तभी सफल, जब किसान को उसका वास्तविक और सरल लाभ मिले- श्री शिवराज सिंह चौहान
21 अप्रैल, 2026, नई दिल्ली
केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि किसानों को साहूकारी, ऊंचे ब्याज, जटिल कर्ज प्रक्रिया और असंवेदनशील व्यवस्था से राहत दिलाने के लिए कृषि वित्त तंत्र को और अधिक सरल, व्यावहारिक, मानवीय और परिणामोन्मुख बनाना होगा। उन्होंने कहा कि किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) ने किसानों को राहत दी है, लेकिन अब जरूरत इस बात की है कि तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग हो, बैंकिंग व्यवस्था ग्रामीण जरूरतों के अनुरूप मजबूत बने, योजनाएं जमीन पर व्यावहारिक रूप से लागू हों और छोटे किसानों की आय बढ़ाने के लिए एकीकृत खेती जैसे मॉडल को आगे बढ़ाया जाए।

ऋण प्रक्रिया का सरलीकरण बहुत जरूरी
सिविल सेवा दिवस के अवसर पर विज्ञान भवन, नई दिल्ली में कृषि पर आयोजित पैनल चर्चा में श्री चौहान ने कहा कि उनका बचपन गांव में बीता है और उन्होंने बहुत करीब से देखा है कि पहले गांवों में किस तरह ब्याज पर पैसा देने का धंधा चलता था। जरूरतमंद लोग बर्तन, जेवर, जमीन या घर का सामान गिरवी रखकर पैसा लेते थे और फिर ब्याज का कोई ठिकाना नहीं होता था; इसलिए आज की जरूरत किसानों को इस शोषणकारी चक्र से बाहर निकालने की है। उन्होंने कहा कि KCC और बैंकिंग ऋण सुविधाओं ने किसानों को राहत पहुंचाई है, ट्रैक्टर, सिंचाई, बीज और दूसरी जरूरतों के लिए ऋण मिलने से उत्पादन बढ़ाने में मदद मिली है, लेकिन उन्होंने यह भी साफ कहा कि बैंक से ऋण लेना आज भी गांवों में आसान नहीं है, क्योंकि किसान को कागजों, अभिलेखों, तहसील, पटवारी और कई स्तरों की प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है; इसलिए ऋण प्रक्रिया का सरलीकरण बहुत जरूरी है।
व्यवस्था में संवेदना और संतुलन दोनों होने चाहिए
श्री चौहान ने कहा कि व्यवस्था में संवेदना और संतुलन दोनों होने चाहिए, क्योंकि संवेदना तभी आती है जब हम दूसरे को अपना मानते हैं। उन्होंने कहा कि कई बार कुर्सी पर बैठा व्यक्ति सामने वाले किसान को तुच्छ समझने लगता है, जबकि किसान कोई याचक नहीं है; वह अपने हक, जरूरत और सम्मान के साथ व्यवस्था के पास आता है। केंद्रीय मंत्री श्री चौहान ने एक उदाहरण देते हुए कहा कि एक किसान बच्चों की पढ़ाई के लिए कस्बे में मकान बनाकर कर्ज में फंस गया। 18 लाख रुपये का ऋण ब्याज बढ़ते-बढ़ते 40 लाख रुपये तक पहुंच गया, तब वह अपने बच्चों को लेकर मदद की गुहार लगाने आया; इस पर उन्होंने बैंक से बात कर वन टाइम सेटलमेंट के जरिए राहत देने जैसे व्यावहारिक समाधान पर विचार करने की बात कही। उन्होंने कहा कि तकनीक का बेहतर उपयोग जरूरी है, लेकिन उसका इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर होना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि गेहूं खरीद के दौरान कई जगह सैटेलाइट सत्यापन में गड़बड़ी जैसी स्थिति आई, जिसके कारण किसान परेशान होते रहे; इसलिए तकनीक की सीमाओं को समझते हुए कृषि विभाग, नाबार्ड, आरबीआई और संबंधित संस्थाओं को मिलकर बेहतर और व्यावहारिक व्यवस्था पर काम करना चाहिए।
काम के दबाव और जरूरत के हिसाब से मानव संसाधन की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए
कृषि मंत्री ने ग्रामीण बैंकों और शाखाओं में कर्मचारियों की कमी की बात कहते हुए कहा कि ग्रामीण इलाकों में योजनाओं का दबाव बहुत अधिक है, खातों में सीधे भुगतान की संख्या बढ़ी है, मनरेगा की मजदूरी, किसान सम्मान निधि और अन्य रकम सीधे खाते में आती है, लेकिन सीमित बैंक कर्मियों पर इतना काम रहता है कि वे कई बार ढंग से सेवा नहीं दे पाते; इसलिए वर्तमान जरूरतों के अनुसार बैंक स्टाफ की पर्याप्त उपलब्धता पर गंभीर विश्लेषण होना चाहिए।

प्रगतिशील किसानों को अधिक वित्तीय सहयोग देने पर विचार जरूरी
केऩ्द्रीय मंत्री ने कहा कि केवल KCC हर समस्या का समाधान नहीं है। यदि किसान बागवानी, शिमला मिर्च, पॉलीहाउस, ग्रीनहाउस, ड्रिप या स्प्रिंकलर जैसी उन्नत खेती करना चाहता है, तो उसके लिए अधिक निवेश की जरूरत होती है; उन्होंने कहा कि एक एकड़ में शिमला मिर्च जैसी फसल पर डेढ़ से दो लाख रुपये तक खर्च आ सकता है और किसान तीन से चार लाख रुपये प्रति एकड़ तक कमा भी सकता है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि शुरुआती निवेश के लिए उसके पास पूंजी और जानकारी है या नहीं। उन्होंने कहा कि सरकार सब्सिडी देती है, लेकिन सबको नहीं दे सकती, क्योंकि उसकी एक सीमा होती है, इसलिए प्रगतिशील किसानों को अधिक वित्तीय सहयोग कैसे दिया जाए, इस पर विचार जरूरी है, ताकि वे नई तकनीक, उन्नत खेती और उच्च मूल्य वाली कृषि गतिविधियों की ओर बढ़ सकें।
छोटे और सीमांत किसानों की आय बढ़ाने के लिए इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल पर जोर
श्री चौहान ने छोटे और सीमांत किसानों की आय बढ़ाने के लिए इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि एक-दो या ढाई एकड़ वाले छोटे किसान की आजीविका केवल अनाज पर नहीं चल सकती; उसे फल, सब्जी, पशुपालन, बकरी पालन, मछली पालन, मधुमक्खी पालन जैसी दो-चार गतिविधियां साथ लेकर चलनी होंगी, तभी उसकी आय स्थायी रूप से बढ़ सकेगी। उन्होंने कहा कि यदि किसान गाय-भैंस पालना चाहता है, अच्छी नस्ल का पशु लेना चाहता है, मछली पालन करना चाहता है, तो उसके लिए भी पूंजी चाहिए। इन क्षेत्रों में KCC लागू होने के बावजूद लाभार्थियों की संख्या सीमित है, इसलिए विभिन्न योजनाओं और संसाधनों के कन्वर्जेंस के जरिए इंटीग्रेटेड फार्मिंग को सफल और व्यावहारिक बनाना आवश्यक है।
व्यवहारिक पक्षों पर भी ध्यान देना जरूरी
कृषि मंत्री ने वेयरहाउस रसीद पर ऋण देने की योजना का भी उल्लेख किया और कहा कि यह योजना बहुत अच्छी है, लेकिन इसे प्रभावी और व्यवहारिक बनाना होगा। उन्होंने कहा कि जब किसान के पास अनाज रखा हो और बाजार भाव कम हो, लेकिन उसे शादी-विवाह, बच्चों की जरूरत या उधार चुकाने के लिए तत्काल पैसे की आवश्यकता हो, तब वह दबाव में आकर औने-पौने दाम पर उपज बेच देता है; यदि ऐसी स्थिति में सरल प्रक्रिया से ऋण मिल जाए, तो किसान बेहतर समय पर फसल बेचकर अधिक लाभ पा सकता है। उन्होंने कहा कि कई योजनाएं अच्छी हैं, जरूरी यह है कि योजना, प्रक्रिया, परिणाम और परिणामों के पीछे के कारण- सभी पर गंभीरता से विचार किया जाए और जहां जटिलताएं हों, वहां उन्हें दूर किया जाए। शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि केवल आंकड़ों के जाल में उलझने के बजाय व्यवहारिक पक्षों पर भी ध्यान देना जरूरी है। उन्होंने एनपीए, कवरेज, छोटे किसानों की पहुंच और वास्तविक लाभ जैसे सवालों पर कारण खोज कर समाधान की दिशा में बढ़ने की बात कही।
सिविल सेवा से जुड़े अधिकारियों से आत्मविश्लेषण, बेहतर क्रियान्वयन और आउट-ऑफ-द-बॉक्स सोच की अपील
श्री चौहान ने सिविल सेवा से जुड़े अधिकारियों से आत्मविश्लेषण, बेहतर क्रियान्वयन और आउट-ऑफ-द-बॉक्स सोच की अपील की। उन्होंने कहा कि देश की सेवा, जनता के प्रति दायित्व और योजनाओं के बेहतर परिणाम के लिए हर अधिकारी के पास मौजूद प्रतिभा, क्षमता और अच्छे विचारों का उपयोग होना चाहिए; जो भी अच्छा और व्यावहारिक विचार हो, उसे आगे लाकर लागू करने की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए।
(स्रोतः कृषि भवन, नई दिल्ली)








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