5 मई, 2026, पूर्णिया
पूर्णिया जिले की कृषि उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी पर आधारित है, जहाँ धान, मक्का एवं गेहूँ की सघन खेती होती है। अधिक उत्पादन की होड़ में रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित एवं अत्यधिक उपयोग से मृदा उर्वरता में गिरावट तथा लागत वृद्धि एक गंभीर समस्या बन रही है। इसी संदर्भ में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना एवं कृषि विज्ञान केन्द्र, पूर्णिया के संयुक्त तत्वावधान में आज जलालगढ़ प्रखंड के कथैली ग्राम में “संतुलित उर्वरक उपयोग” विषय पर किसान–वैज्ञानिक संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें 30 महिला सहित लगभग 100 किसानों ने भागीदारी की।

डॉ. अनुप दास, निदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना, ने अपने संदेश में किसानों से मृदा स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए उर्वरकों के संतुलित उपयोग अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने बताया कि फसल अवशेष पुनर्चक्रण तथा हरी खाद के उपयोग से न केवल उत्पादन लागत में कमी लाई जा सकती है, बल्कि दीर्घकालीन रूप से उत्पादन एवं आय में स्थिरता भी सुनिश्चित की जा सकती है। कार्यक्रम में पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना के डॉ. संतोष कुमार एवं डॉ. गौस अली, कृषि विज्ञान केंद्र, पूर्णिया के डॉ. के.एम. सिंह, जिला कृषि पदाधिकारी श्री हरिद्वार चौरसिया, प्रखंड कृषि पदाधिकारी श्री कमलेश मिश्रा सहित अन्य विशेषज्ञ मौजूद थे।
कार्यक्रम के दौरान टिकाऊ कृषि के लिए समेकित पोषक तत्व प्रबंधन की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया। विशेषज्ञों ने रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ जैविक स्रोतों जैसे गोबर खाद, कम्पोस्ट एवं हरी खाद के संतुलित उपयोग को अनिवार्य बताया। संवाद सत्र में किसानों ने मृदा उर्वरता में कमी, उत्पादन लागत में वृद्धि तथा उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता जैसी समस्याएं साझा कीं। वैज्ञानिकों ने इन चुनौतियों के समाधान हेतु स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत किए।
हरी खाद के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया गया कि ढैंचा जैसी फसलों को ग्रीष्म ऋतु में उगाकर धान की बुआई से पूर्व मिट्टी में पलट देने से जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है। इससे मृदा संरचना सुदृढ़ और नाइट्रोजन सहित आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि होती है। इस विधि से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है साथ ही लागत में भारी भी कमी आती है । इसी उद्देश्य से कार्यक्रम में किसानों को ढैंचा (हरी खाद) के बीज उपलब्ध कराये गए, ताकि वे इस तकनीक को व्यवहार में ला सकें।
किसानों को मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन अपनाने की सलाह दी गई तथा “मृदा स्वास्थ्य कार्ड” के अनुरूप ही उर्वरकों के प्रयोग पर जोर दिया गया, जिससे फसल की आवश्यकता के अनुसार पोषक तत्वों की आपूर्ति सुनिश्चित हो सके। साथ ही उर्वरकों के उचित मात्रा, समय एवं विधि के पालन से पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता बढ़ाने और लागत कम करने के उपायों पर भी चर्चा की गई।
(भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना)








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