9 अक्टूबर, 2026, चंडीगढ़
भाकृअनुप–भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान, अनुसंधान केन्द्र, चंडीगढ़ ने आज भारत सरकार के ‘रिफॉर्म उत्सव’ अभियान के तहत आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान टिकाऊ मृदा एवं जल संसाधन प्रबंधन के लिए दो भूमि-आधारित प्रौद्योगिकियां और एक सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन जारी किया।
‘रिफॉर्म उत्सव’ अभियान का उद्देश्य नागरिक भागीदारी को बढ़ावा देना और सुधारों को आगे बढ़ाना है। इस पहल के तहत, भाकृअनुप 17 सितंबर से 17 अक्टूबर, 2026 तक शुभारंभ और सार्वजनिक उपयोग के लिए प्रमुख पहलों, उपलब्धियों, कार्यक्रमों और अनुसंधान परिणामों को प्रदर्शित कर रहा है।
इन प्रौद्योगिकियों और सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन को मुख्य अतिथि डॉ. जे. एस. सामरा, वरिष्ठ सलाहकार, नवीकरणीय ऊर्जा कार्यक्रम, सीआरआरआईडी, चंडीगढ़; मुख्य कार्यकारी अधिकारी, राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण (एनआरएए), भारत सरकार; और पूर्व उप महानिदेशक (प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन), भाकृअनुप द्वारा औपचारिक रूप से जारी किया गया।

जारी की गई प्रौद्योगिकियों में संसाधन संरक्षण और आजीविका सुरक्षा के लिए ढलानदार कृषि भूमि प्रौद्योगिकी तथा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण के लिए दोहरे उद्देश्य वाला फार्म पॉन्ड शामिल थे। सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन, मृदा एवं जल संरक्षण संरचनाओं के डिजाइन और आकलन के लिए निर्णय सहायता प्रणाली (डीएसएस), स्पर्स, गेबियन दीवारों और गेबियन चेक डैम के डिजाइन और आकलन में सहायता करता है।
सभा को संबोधित करते हुए डॉ. सामरा ने ढलानदार भूमि के प्रबंधन की चुनौतियों पर प्रकाश डाला और ऐसी एकीकृत भूमि-उपयोग प्रणालियों की आवश्यकता पर जोर दिया, जो जल संचयन और पुनर्चक्रण के साथ कई उत्पादक गतिविधियों को जोड़ती हों। उन्होंने कहा कि ऐसे दृष्टिकोण किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ शिवालिक क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधन संरक्षण को सुदृढ़ कर सकते हैं।
उन्होंने कृषि उपयोग के लिए वर्षा जल संचयन और अतिरिक्त अपवाह के प्रभावी प्रबंधन के माध्यम से भूजल पुनर्भरण के महत्व पर भी जोर दिया, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां वर्षा ऋतु के दौरान बड़ी मात्रा में पानी ढलान से नीचे बहता है। मृदा एवं जल संरक्षण संरचनाओं के डिजाइन में क्षेत्रीय कर्मियों के सामने आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कुशल योजना और क्रियान्वयन को सुगम बनाने के लिए सामग्री की आवश्यकताओं और निर्माण लागत का आकलन करने हेतु उपयोगकर्ता-अनुकूल सॉफ्टवेयर के महत्व को रेखांकित किया।

डॉ. सामरा ने इन प्रौद्योगिकियों को विकसित करने और टिकाऊ कृषि विकास में योगदान देने के लिए अनुसंधान केन्द्र के वैज्ञानिक और तकनीकी कर्मचारियों को उनके समर्पित प्रयासों के लिए बधाई दी।
कार्यक्रम में मोहाली और पंचकूला के कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके), केन्द्रीय भूजल बोर्ड, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग–एमजीएसआईपीए, पंजाब राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (पीएससीएसटी), मृदा एवं जल संरक्षण विभाग, पंचकूला और अन्य संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
(स्रोत: भाकृअनुप–भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान, अनुसंधान केन्द्र, चंडीगढ़)







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