भाकृअनुप–एमजीआईएफआरआई, मोतिहारी ने बिहार में खेत बचाओ अभियान–2026 के अंतर्गत मृदा स्वास्थ्य आधारित बाग प्रबंधन को दिया बढ़ावा

भाकृअनुप–एमजीआईएफआरआई, मोतिहारी ने बिहार में खेत बचाओ अभियान–2026 के अंतर्गत मृदा स्वास्थ्य आधारित बाग प्रबंधन को दिया बढ़ावा

30 जून, 2026, मोतिहारी

राष्ट्रव्यापी खेत बचाओ अभियान–2026 के अंतर्गत भाकृअनुप–महात्मा गांधी एकीकृत कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी ने बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के चकिया प्रखंड के चिंतामनपुर गांव में किसान जागरूकता-सह-प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य वैज्ञानिक मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, संतुलित पोषक तत्वों के उपयोग, पर्यावरण-अनुकूल कीट प्रबंधन तथा सतत बाग उत्पादन पद्धतियों को बढ़ावा देकर कृषि लाभप्रदता एवं दीर्घकालिक कृषि स्थिरता को सुदृढ़ करना था।

प्रशिक्षण के दौरान इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि उर्वरकों के उपयोग से संबंधित सभी निर्णयों का आधार मृदा परीक्षण होना चाहिए। किसानों को सलाह दी गई कि वे उर्वरकों का अंधाधुंध एवं अत्यधिक उपयोग न करें, क्योंकि असंतुलित पोषक तत्वों का प्रयोग खेती की लागत बढ़ाता है, मृदा में पोषक तत्वों का संतुलन बिगाड़ता है तथा दीर्घकाल में मृदा की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। प्रतिभागियों को मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने के लिए प्रेरित किया गया, जिसमें रासायनिक उर्वरकों के साथ गोबर की सड़ी खाद (एफवाईएम), वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद, फसल अवशेष पुनर्चक्रण तथा जैव उर्वरकों का समेकित उपयोग शामिल है, जिससे मृदा में जैविक कार्बन, मृदा संरचना, पोषक तत्वों की उपलब्धता तथा जल धारण क्षमता में सुधार हो सके।

कार्यक्रम में क्षेत्र की दो प्रमुख फल फसलों—आम और लीची—के बागों में पोषक तत्व प्रबंधन पर विशेष बल दिया गया। किसानों को सलाह दी गई कि वे उर्वरकों का प्रयोग पेड़ के तने के पास करने के बजाय वृक्ष की छत्रछाया के नीचे गोलाकार खाइयों में करें, ताकि पोषक तत्वों का अवशोषण बेहतर हो सके। आम के बागों के लिए गोबर की सड़ी खाद (एफवाईएम) के साथ नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश की अनुशंसित मात्रा का संतुलित उपयोग करने की सलाह दी गई, जबकि नाइट्रोजन के अत्यधिक उपयोग से बचने की सलाह दी गई, क्योंकि इससे पुष्पन एवं फलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। लीची के बागों में कटाई के बाद गोबर की सड़ी खाद, फॉस्फोरस और पोटाश के उपयोग तथा नाइट्रोजन को विभाजित मात्रा में देने की अनुशंसा की गई, जिससे पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता बढ़ सके। मृदा स्वास्थ्य में सुधार तथा मृदा जनित कीटों की समस्या कम करने के लिए नीम खली और करंज खली जैसे जैविक संशोधकों के उपयोग को भी प्रोत्साहित किया गया।

ICAR-MGIFRI, Motihari Promotes Soil-Health-Centred Orchard Management under Khet Bachao Abhiyan–2026 in Bihar

कार्यक्रम में मृदा एवं जल संरक्षण उपायों के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया, जिसमें भूमि का समुचित समतलीकरण, खेत की मेड़ों को मजबूत करना तथा खेत में ही वर्षा जल संरक्षण (इन-सीटू) शामिल था। किसानों को सलाह दी गई कि वे रोटावेटर का बार-बार और अत्यधिक उपयोग न करें, क्योंकि लगातार उथली जुताई से जुताई की परत के नीचे कठोर परत (हार्ड-पैन) बन जाती है, जिससे जड़ों की वृद्धि बाधित होती है, जल का मृदा में प्रवेश कम हो जाता है तथा पोषक तत्वों का अवशोषण सीमित हो जाता है।

कीट प्रबंधन पर आयोजित सत्रों में समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) के अंतर्गत पर्यावरण-अनुकूल उपायों को बढ़ावा दिया गया, जिनमें नियमित खेत निरीक्षण, समय पर कीटों की पहचान, नीम आधारित उत्पादों, वनस्पति अर्क, जैव-कीटनाशकों का उपयोग तथा लाभकारी कीटों का संरक्षण शामिल था। आम एवं लीची के बागों में कीट प्रकोप कम करने तथा रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता घटाने के लिए बाग की स्वच्छता बनाए रखना, संक्रमित शाखाओं की छंटाई, कीटग्रस्त पौध भागों को हटाना तथा जैविक नियंत्रण उपाय अपनाने की अनुशंसा की गई।

संवादात्मक चर्चा के दौरान किसानों ने पोषक तत्वों की कमी, बागों की घटती उत्पादकता, जलभराव, मृदा संघनन, जैविक खाद के उपयोग तथा कीट प्रबंधन से संबंधित अपनी समस्याएँ साझा कीं। इन चुनौतियों के समाधान हेतु लागत प्रभावी एवं सतत उपायों पर आधारित स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप व्यावहारिक सुझाव प्रदान किए गए।

कार्यक्रम का समापन बिहार में फसल एवं बागों की उत्पादकता बनाए रखने के लिए स्वस्थ मृदा, संतुलित पोषण, जैविक पदार्थ प्रबंधन, पर्यावरण-अनुकूल कीट नियंत्रण तथा संरक्षण आधारित कृषि पद्धतियों के महत्व पर विशेष बल देते हुए किया गया। किसानों ने खेत बचाओ अभियान–2026 के अंतर्गत प्रोत्साहित मृदा स्वास्थ्य आधारित पोषक तत्व प्रबंधन, समेकित कीट प्रबंधन तथा संसाधन संरक्षण आधारित कृषि पद्धतियों को अपनाने की अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।

कार्यक्रम में कुल 29 किसानों, जिनमें 22 पुरुष एवं 7 महिलाएँ शामिल थीं, ने भाग लिया तथा मृदा उर्वरता, बाग प्रबंधन, पोषक तत्वों की कमी, कीट प्रबंधन एवं जल संरक्षण से संबंधित विभिन्न विषयों पर वैज्ञानिकों के साथ सक्रिय संवाद किया।

(स्रोत: भाकृअनुप–महात्मा गांधी एकीकृत कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी, बिहार)

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