भाकृअनुप-आईआईएसडब्ल्यूसी, देहरादून ने मनाया 73वां स्थापना दिवस का किया आयोजन

भाकृअनुप-आईआईएसडब्ल्यूसी, देहरादून ने मनाया 73वां स्थापना दिवस का किया आयोजन

7 अप्रैल 2026, देहरादून

भाकृअनुप-भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (भाकृअनुप-आईआईएसडब्ल्यूसी), देहरादून, ने अपने मुख्यालय में उत्साहपूर्वक 73वां स्थापना दिवस का आयोजन किया।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में डॉ हरेंद्र सिंह बिष्ट, निदेशक, सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान उपस्थित रहे, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में कहकशां नसीम, अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी, स्प्रिंग शेड एवं नदी पुनर्जीवन एजेंसी ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। इस समारोह में प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों, सेवानिवृत्त कर्मचारियों, प्रगतिशील किसानों तथा आमंत्रित गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया।

अपने संबोधन में डॉ. बिष्ट ने मृदा एवं जल संरक्षण के क्षेत्र में संस्थान के महत्वपूर्ण योगदानों की सराहना की, विशेषकर भूमि क्षरण को कम करने, वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने तथा कृषि उत्पादकता बढ़ाने में। उन्होंने सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संरक्षण तकनीकों को ऊर्जा-कुशल समाधानों के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता पर बल दिया।

ICAR-IISWC, Dehradun Celebrates its 73rd Foundation Day

श्रीमती नसीम ने स्प्रिंग शेड्स और नदी पुनर्जीवन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन एवं जलवायु लचीलापन को बढ़ावा देने के लिए भाकृअनुप-आईआईएसडब्ल्यूसी और राज्य एजेंसियों के बीच सहयोग को मजबूत करने की आवश्यकता बताई।

डॉ. एम. मधु, निदेशक, भाकृअनुप-आईआईएसडब्ल्यूसी ने वर्षा-आधारित एवं क्षतिग्रस्त कृषि-प्रणालियों में मृदा अपरदन की समस्या के समाधान तथा उत्पादकता सुधार में संस्थान की उपलब्धियों को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि 1953–54 में स्थापना के बाद से यह संस्थान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन प्रभाग के अंतर्गत एक प्रमुख संस्थान के रूप में विकसित हुआ है, जो देशभर में अपने क्षेत्रीय केन्द्रों के माध्यम से स्थान-विशिष्ट तकनीकों का प्रसार कर रहा है।

हाल के वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, जल अपरदन के कारण भूमि क्षरण में उल्लेखनीय कमी आई है—39.87% (125.99 मिलियन हैक्टर) से घटकर 26.31% (86.04 मिलियन हैक्टर) हो गई है, जो निरंतर संरक्षण प्रयासों का परिणाम है। आईआईएसडब्ल्यूसी ने जलग्रहण कार्यक्रमों के अंतर्गत 100 मिलियन हैक्टर से अधिक क्षेत्र का उपचार किया है, जिससे मृदा हानि में कमी तथा कृषि उत्पादकता में वृद्धि हुई है।

संस्थान के हस्तक्षेपों से फसल उत्पादकता में 40% से 412% तक की वृद्धि, जल उत्पादकता में 30% से 84% तक सुधार तथा उर्वरक की बचत लगभग ₹10,000–15,000 करोड़ प्रतिवर्ष आंकी गई है। इन उपलब्धियों ने किसानों की आजीविका सुधारने एवं जलवायु लचीलापन मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

विकसित भारत @2047 के राष्ट्रीय दृष्टिकोण के अनुरूप, भाकृअनुप-आईआईएसडब्ल्यूसी कृषि उत्पादन बढ़ाने, संसाधनों के कुशल उपयोग, एग्रोफोरेस्ट्री के विस्तार तथा तकनीकी नवाचारों की व्यापक पहुंच सुनिश्चित करने जैसे प्रमुख लक्ष्यों को समर्थन देता रहा है।

अब तक संस्थान ने 100 से अधिक तकनीकों का विकास किया है, जिनमें मृदा अपरदन नियंत्रण उपाय, एग्रोफोरेस्ट्री मॉडल, जल संचयन तकनीक और निर्णय समर्थन प्रणालियां शामिल हैं। इसके क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से देशभर में हजारों हितधारकों को प्रशिक्षित किया गया है।

ICAR-IISWC, Dehradun Celebrates its 73rd Foundation Day

समारोह के दौरान आसपास के गांवों के प्रगतिशील किसानों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने आईआईएसडब्ल्यूसी की तकनीकों के माध्यम से बंजर भूमि को उत्पादक प्रणाली में बदलने के अपने अनुभव साझा किए। कार्यक्रम में तकनीकी बुलेटिनों एवं हिंदी पत्रिका ‘बुरांश’ का विमोचन, साथ ही सांस्कृतिक एवं खेल गतिविधियों का भी आयोजन किया गया।

कार्यक्रम का समापन सतत भूमि प्रबंधन, जलवायु लचीलापन और किसान-केन्द्रित विकास के प्रति नई प्रतिबद्धता के साथ हुआ, जिसमें संदेश दिया गया— “मिट्टी ही आत्मा है—इसे बचाएं, और पानी ही जीवन है—इसे संजोएं।”

इस कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, अधिकारियों, किसानों और अन्य प्रमुख हितधारकों की सक्रिय भागीदारी रही।

(स्रोत: भाकृअनुप–भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान, देहरादून)

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