23 अप्रैल, 2026, नई दिल्ली
भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), नई दिल्ली ने आज नई दिल्ली में सफलतापूर्वक भाकृअनुप-आईएआरआई इंडस्ट्री मीट 2026 का आयोजन किया। “प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन क्षेत्र में साझेदारियों को सुदृढ़ बनाना” विषय पर आधारित इस कार्यक्रम में अग्रणी नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों, उद्योग प्रतिनिधियों, स्टार्टअप्स तथा विद्यार्थियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना तथा सतत कृषि विकास के लिए प्रभावी सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) को मजबूत करना था।
इस कार्यक्रम में कई प्रतिष्ठित गणमान्य व्यक्तियों की गरिमामयी उपस्थिति रही, जिनमें डॉ. रमेश चंद, सदस्य, नीति आयोग; डॉ. आर.बी. सिंह, पूर्व अध्यक्ष, एएसआरबी; डॉ. एच.एस. गुप्ता, पूर्व निदेशक, भाकृअनुप-आईएआरआई; तथा डॉ. चेरुकमल्ली श्रीनिवास राव, निदेशक, भाकृअनुप-आईएआरआई शामिल थे।

मुख्य संबोधन देते हुए डॉ. रमेश चंद ने कृषि क्षेत्र की चुनौतियों का समाधान करने की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि इनका प्रबंधन कम लागत, बेहतर दक्षता तथा स्थिरता बनाए रखते हुए किया जाना चाहिए। उन्होंने सटीक कृषि (प्रिसिजन फार्मिंग), आंकड़ा-आधारित निर्णय प्रक्रिया तथा अनुसंधान नवाचारों और खेत स्तर पर उनके अपनाने के बीच की खाई को पाटने के लिए निजी क्षेत्र की बढ़ी हुई भागीदारी के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने जल उपयोग दक्षता और कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए नीतिगत समर्थन की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला।
अपने स्वागत संबोधन में डॉ. च. श्रीनिवास राव ने बताया कि यह उद्योग बैठकों की श्रृंखला का तीसरा आयोजन है, जिसका उद्देश्य आईसीएआर-आईएआरआई और उद्योग जगत के हितधारकों के बीच सहयोग को बढ़ाना है। उन्होंने विभिन्न नवाचारों के प्रौद्योगिकी व्यवसायीकरण, इकोसिस्टम सेवाओं, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) तथा कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) वित्तपोषण अवसरों जैसे प्रमुख फोकस क्षेत्रों पर विशेष जोर दिया।

डॉ. आर.बी. सिंह ने कहा कि प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन (एनआरएम) जलवायु सहनशीलता, पारिस्थितिक स्थिरता और खाद्य सुरक्षा का केंद्रीय आधार है। उन्होंने बहु-विषयक सहयोग, पीपीपी ढांचे को मजबूत करने तथा स्टार्टअप्स के साथ अधिक सहभागिता बढ़ाने की वकालत की। उन्होंने समावेशी और टिकाऊ कृषि विकास सुनिश्चित करने के लिए “जन, ग्रह और लाभ” बीच संतुलन बनाए रखने के महत्व को रेखांकित किया।
डॉ. एच.एस. गुप्ता ने भारत के कृषि परिवर्तन, विशेषकर हरित क्रांति के दौरान, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन (एनआरएम) की ऐतिहासिक भूमिका पर प्रकाश डाला और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के प्रति सावधान किया। उन्होंने दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए मृदा स्वास्थ्य बहाली, पोषक तत्व उपयोग दक्षता में सुधार तथा नैनो उर्वरक और सटीक कृषि जैसी उन्नत तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण लाइसेंसिंग, संविदात्मक अनुसंधान तथा कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) वित्तपोषण से संबंधित तीन समझौता ज्ञापनों (एमओयू) तथा समझौतों का आदान-प्रदान रहा, जिसने सहयोगात्मक नवाचार के प्रति प्रतिबद्धता को और मजबूत किया।

कार्यक्रम में “प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में अवसर” विषय पर पैनल चर्चाएं भी आयोजित की गईं, जिसमें डॉ. पी.एस. ब्रह्मानंद, परियोजना निदेशक, डब्ल्यूटीसी तथा अन्य उद्योग भागीदारों ने प्रस्तुतियां दीं। उन्होंने जल प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य, जलवायु-सहिष्णु कृषि तथा डिजिटल कृषि प्रौद्योगिकियों में अपनी क्षमताओं और सहयोग के उभरते क्षेत्रों को प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम का समापन पोस्टर प्रस्तुतियों और संवादात्मक सत्रों के साथ हुआ, जिसमें आईसीएआर-आईएआरआई के स्नातकोत्तर एवं पीएचडी. विद्यार्थियों ने अपने शोध कार्यों का प्रदर्शन किया और उद्योग प्रतिनिधियों के साथ संवाद स्थापित किया। इससे ज्ञान के आदान-प्रदान तथा भविष्य के सहयोग को बढ़ावा मिला।
इस कार्यक्रम में 75 से अधिक उद्योगों ने भाग लिया, साथ ही लगभग 50 कृषि स्टार्टअप ने ऑनलाइन सहभागिता की। इसके अतिरिक्त, 170 से अधिक स्नातकोत्तर एवं पीएचडी. विद्यार्थियों ने भी अपनी प्रस्तुतियां दीं।
(स्रोत: भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली)







फेसबुक पर लाइक करें
यूट्यूब पर सदस्यता लें
X पर फॉलो करना X
इंस्टाग्राम पर लाइक करें