भाकृअनुप–भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-आईजीएफआरआई), क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र, श्रीनगर ने एक अभिनव सेब एवं बादाम आधारित हॉर्टीपास्चर प्रौद्योगिकी विकसित की है, जो समशीतोष्ण हिमालयी क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण चारे की लगातार बनी रहने वाली कमी की समस्या के समाधान हेतु फल बागानों के भीतर बहुवर्षीय चारा घासों एवं दलहनी चारा फसलों का एकीकरण करती है। यह प्रौद्योगिकी एक ही भूमि इकाई से फल और चारे का एक साथ उत्पादन संभव बनाती है, साथ ही पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं में सुधार और जलवायु-सहिष्णु कृषि को बढ़ावा देती है।
हिमालय के समशीतोष्ण फल उत्पादक क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण चारे की कमी के साथ-साथ बागानों की भूमि का अपर्याप्त उपयोग एक सामान्य समस्या है। इस चुनौती से निपटने के लिए संस्थान ने सेब और बादाम के बागानों की कतारों के बीच उपलब्ध स्थान में ऑर्चर्ड ग्रास (Dactylis glomerata), टॉल फेस्क्यू (Festuca arundinacea) और लोलियम प्रजातियों जैसी बहुवर्षीय चारा घासों के साथ-साथ रेड क्लोवर और व्हाइट क्लोवर जैसी दलहनी चारा फसलों की स्थापना कर एक सतत हॉर्टीपास्चर उत्पादन प्रणाली विकसित की है।

अनुशंसित उत्पादन प्रोटोकॉल के अंतर्गत चारा फसलों को पेड़ों के तनों से लगभग एक मीटर की दूरी पर 30 × 40 सेमी की दूरी पर लगाया जाता है। पहली चारा कटाई बुवाई के 60–75 दिन बाद की जाती है, जिसके बाद 40–50 दिनों के अंतराल पर क्रमिक कटाइयाँ ली जाती हैं। अधिकतम उत्पादकता बनाए रखने के लिए N:P @ 100:60:40 किग्रा प्रति हेक्टेयर के पोषक तत्व प्रबंधन की अनुशंसा की गई है।
यह एकीकृत उत्पादन प्रणाली फल उत्पादन को प्रभावित किए बिना प्रतिवर्ष 35–40 टन हरा चारा प्रति हेक्टेयर उपलब्ध कराती है। सेब के बागानों में 20–25 टन फल प्रति हेक्टेयर का उत्पादन जारी रहता है, जबकि बादाम के बागानों से 0.85–1.2 टन मेवे प्रति हेक्टेयर प्राप्त होते हैं। यह प्रणाली प्रति हैक्टर 4–6 वयस्क पशु इकाइयों (एसीयू) का समर्थन कर सकती है, जिससे खेत स्तर पर चारा आत्मनिर्भरता में उल्लेखनीय सुधार होता है।
क्षेत्रीय स्तर पर इसके अपनाने से महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ प्राप्त हुए हैं। इस प्रौद्योगिकी को अपनाने वाले किसानों ने अपने बागानों में गुणवत्तापूर्ण चारे की उपलब्धता के कारण चारा उत्पादन में 10–15 प्रतिशत वृद्धि तथा पशु आहार लागत में लगभग 20 प्रतिशत कमी की सूचना दी है।
उत्पादकता बढ़ाने के अतिरिक्त, यह हॉर्टीपास्चर प्रणाली पारंपरिक बागान प्रबंधन की तुलना में अनेक पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ प्रदान करती है। बहुवर्षीय वनस्पति आवरण लगभग 80 प्रतिशत तक खरपतवारों को नियंत्रित करता है, जिससे शाकनाशियों पर निर्भरता कम होती है तथा मृदा कार्बनिक पदार्थ, पोषक तत्व चक्रण, कार्बन संचयन, मृदा नमी संरक्षण और जैव विविधता में सुधार होता है। सतत भूमि आवरण मृदा अपरदन को भी कम करता है तथा बदलती जलवायु परिस्थितियों में बागान पारिस्थितिकी तंत्र की लचीलापन क्षमता को बढ़ाता है।
इस प्रौद्योगिकी ने जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले के चूंट वालीवार गांव में उल्लेखनीय प्रभाव प्रदर्शित किया है, जहां लगभग 75 बागानों में फैले 20 हेक्टेयर क्षेत्र को हॉर्टीपास्चर प्रणाली में परिवर्तित किया गया है। गुज्जर और पहाड़ी पशुपालक समुदायों द्वारा इसे अपनाने से चारा उत्पादन में 20–25 प्रतिशत वृद्धि तथा दूध उत्पादन में 15–20 प्रतिशत बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे यह गांव एक आदर्श चारा केंद्र के रूप में विकसित हुआ है।

मुख्य विशेषताएं
• एक ही भूमि इकाई से फल और चारे का एक साथ उत्पादन।
• बागानों की कम उपयोग में आने वाली भूमि का उत्पादक उपयोग।
• प्रतिवर्ष 35–40 टन हरा चारा प्रति हैक्टर उत्पादन।
• प्रति हेक्टेयर 4–6 वयस्क पशु इकाइयों (एसीयू) का समर्थन।
• लगभग 80 प्रतिशत खरपतवार नियंत्रण, जिससे शाकनाशी उपयोग में कमी।
• मृदा स्वास्थ्य, कार्बन संचयन, पोषक तत्व चक्रण और जैव विविधता में वृद्धि।
• समशीतोष्ण क्षेत्रों में सेब एवं बादाम आधारित उत्पादन प्रणालियों के लिए उपयुक्त।
संभावित प्रभाव
सेब एवं बादाम आधारित हॉर्टीपास्चर प्रौद्योगिकी चारा सुरक्षा को सुदृढ़ करने, पशुधन उत्पादकता बढ़ाने तथा बाहरी पशु आहार संसाधनों पर निर्भरता कम करने का एक सतत समाधान प्रदान करती है। फल और चारा उत्पादन के एकीकरण के माध्यम से यह प्रौद्योगिकी किसानों की आय में विविधता और स्थिरता लाती है तथा उत्पादन लागत को कम करती है। मृदा स्वास्थ्य और कार्बन भंडारण में सुधार के अतिरिक्त, यह समशीतोष्ण कृषि प्रणालियों के जलवायु-स्मार्ट और सतत सघनीकरण को बढ़ावा देती है। क्षेत्रीय परिस्थितियों में इसकी सिद्ध सफलता को देखते हुए, इस प्रौद्योगिकी में समशीतोष्ण हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बड़े पैमाने पर अपनाए जाने की अपार संभावनाएँ हैं।
(स्रोत: भाकृअनुप–भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान, क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र, श्रीनगर)







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