भाकृअनुप-आरसीईआर की संस्थागत अनुसंधान परिषद (आईआरसी) बैठक व्यापक वैज्ञानिक विचार-विमर्श के साथ सम्पन्न, “वन टीम, वन टास्क” पर दिया गया जोर

भाकृअनुप-आरसीईआर की संस्थागत अनुसंधान परिषद (आईआरसी) बैठक व्यापक वैज्ञानिक विचार-विमर्श के साथ सम्पन्न, “वन टीम, वन टास्क” पर दिया गया जोर

7 अगस्त 2026, पटना

भाकृअनुप–पूर्वी क्षेत्र अनुसंधान परिसर (आरसीईआर), पटना की तीन दिवसीय संस्थागत अनुसंधान परिषद (आईआरसी) बैठक 5–7 अगस्त 2026 के दौरान डॉ. अनुप दास, निदेशक, भाकृअनुप-आरसीईआर, की अध्यक्षता में आयोजित की गई। बैठक के प्रमुख उद्देश्यों में चल रहे अनुसंधान कार्यक्रमों की प्रगति की समीक्षा एवं उन्हें और परिष्कृत करना, नए अनुसंधान प्रस्तावों का मूल्यांकन करना तथा पूर्वी भारत में विज्ञान-आधारित, जलवायु-सहिष्णु और किसान-केंद्रित कृषि विकास के लिए पाँच वर्षीय रोडमैप तैयार करना शामिल था।

उद्घाटन सत्र को वर्चुअल माध्यम से संबोधित करते हुए डॉ. राकेश कुमार, सहायक महानिदेशक (एनआरएम), भाकृअनुप, नई दिल्ली, ने राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप अंतःविषयक एवं सहयोगात्मक अनुसंधान की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि पूर्वी भारत में सतत कृषि के लिए प्रभावशाली प्रौद्योगिकियों का विकास किया जा सके।

डॉ. बिकास दास, निदेशक, भाकृअनुप–राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर तथा डॉ. पी.के. मिश्रा, निदेशक, बामेती, पटना, ने विषय विशेषज्ञ के रूप में भाग लिया और संस्थान के अनुसंधान कार्यक्रमों को सुदृढ़ बनाने हेतु महत्वपूर्ण सुझाव साझा किए।

ICAR-RCER IRC Concludes with Comprehensive Scientific Deliberations, Emphasising “One Team, One Task”

वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए डॉ. अनुप दास, निदेशक, भाकृअनुप-आरसीईआर, पटना, ने “वन टीम, वन टास्क” कार्य संस्कृति को बढ़ावा देने तथा राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप बहु-विषयक, प्रौद्योगिकी-संचालित और किसान-केन्द्रित अनुसंधान को आगे बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने वैज्ञानिकों से स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करने, नवाचार की गति तेज करने तथा कृषि चुनौतियों के प्रभावी समाधान विकसित करने के लिए एक टीम के रूप में सामूहिक रूप से कार्य करने का आग्रह किया। उन्होंने यह भी कहा कि अनुसंधान प्रक्रिया के दौरान आने वाली चुनौतियाँ और बाधाएँ अक्सर उच्च गुणवत्ता वाले और प्रभावशाली परिणामों की नींव बनती हैं।

जल उपयोग दक्षता बढ़ाने और फसल उत्पादन को अनुकूलित करने के लिए जल-बजट आधारित फसल योजना तथा सेंसर-आधारित सिंचाई निर्धारण (इरिगेशन शेड्यूलिंग) पर विशेष जोर दिया गया। संस्थान के प्रमुख अनुसंधान कार्यक्रम के प्रभाव और प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए धान-परती क्षेत्रों के मानचित्रण के महत्व को भी रेखांकित किया गया।

तीन दिवसीय कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिकों ने पाँच बहु-विषयक, कार्योन्मुखी परियोजनाओं के अंतर्गत संस्थान के अनुसंधान कार्यक्रमों की प्रगति और भावी दिशा पर विचार-विमर्श किया। इनमें जलवायु-सहिष्णु कृषि के लिए पुनर्योजी एवं एकीकृत कृषि प्रणालियाँ, बागवानी फसलों के आनुवंशिक संसाधन प्रबंधन एवं उन्नत उत्पादन प्रौद्योगिकियाँ, भूमि एवं जल उत्पादकता बढ़ाने हेतु प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, सतत पशुधन एवं मत्स्य उत्पादन प्रणालियाँ तथा सामाजिक-आर्थिक, विस्तार एवं नीतिगत अनुसंधान शामिल थे।.

ICAR-RCER IRC Concludes with Comprehensive Scientific Deliberations, Emphasising “One Team, One Task”

स्मार्ट सिंचाई, ड्रोन-आधारित परिशुद्ध कृषि, एआई/एमएल आधारित फसल एवं पशुधन प्रबंधन, स्वदेशी पशु आनुवंशिक संसाधन, बकरी प्रजनन, मीथेन उत्सर्जन में कमी, रोग निदान तथा संस्थान की प्रौद्योगिकियों के प्रभाव आकलन जैसे उभरते क्षेत्रों में नई उप-परियोजनाओं पर भी विचार किया गया।

उद्घाटन कार्यक्रम की शुरुआत वृक्षारोपण से हुई, जिसके बाद कार्रवाई प्रतिवेदन (एक्शन टेकन रिपोर्ट) प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर एफएसआरसीएचपी, रांची द्वारा विकसित उन्नत किस्मों के सब्जी बीज उत्पादन के लिए डेवलपमेंट फोकस, बेंगलुरु के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर भी हस्ताक्षर किए गए। साथ ही, जनजातीय उप-योजना के अंतर्गत आरसीईआर-केवीके रामगढ़ द्वारा उदलू गाँव, रामगढ़ की सफलता की कहानी पर आधारित एक वृत्तचित्र भी जारी किया गया।

समापन दिवस पर बजट के प्रभावी उपयोग, एससीएसपी/टीएसपी/एनईएच कार्यक्रमों की प्रगति, आईसीएआर की हालिया नीतियों एवं सुधारों के प्रभावी क्रियान्वयन तथा संसदीय मामलों पर चर्चा की गई। इसके बाद आयोजित खुली चर्चा में वैज्ञानिकों और प्रशासनिक कर्मचारियों ने अनुसंधान एवं संस्थागत गतिविधियों को और सुदृढ़ बनाने के लिए अपने सुझाव साझा किए।

बैठक में संस्थान के लगभग 100 वैज्ञानिकों एवं तकनीकी अधिकारियों ने भाग लिया, जिनमें एफएसआरसीएचपी, रांची तथा दो कृषि विज्ञान केंद्र (रामगढ़ एवं बक्सर) के प्रतिनिधि भी शामिल थे।

(स्रोत: भाकृअनुप–पूर्वी क्षेत्र अनुसंधान परिसर, पटना)

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