भाकृअनुप-अटारी कोलकाता ने किसान फर्स्ट कार्यक्रम 2026–27 के लिए कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया

भाकृअनुप-अटारी कोलकाता ने किसान फर्स्ट कार्यक्रम 2026–27 के लिए कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया

23 जुलाई, 2026, कोलकाता

भाकृअनुप–कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-अटारी), कोलकाता ने डॉ. प्रदीप डे, निदेशक-सह-अध्यक्ष, किसान फर्स्ट कार्यक्रम (एफएफपी) की क्षेत्रीय कार्यक्रम प्रबंधन समिति (जेडपीएमसी) की अध्यक्षता में एक ऑनलाइन बैठक आयोजित की, जिसमें इसके अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत संचालित किसान फर्स्ट कार्यक्रम (एफएफपी) के तीन केंद्रों के लिए वर्ष 2026–27 की कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया गया।

बैठक में डॉ. टी. के. दत्ता, कुलपति, पश्चिम बंगाल पशु एवं मत्स्य विज्ञान विश्वविद्यालय (डब्ल्यूबीयूएएफएस), कोलकाता तथा प्रो. डी. बसु, कुलपति, उत्तर बंग कृषि विश्वविद्यालय (यूबीकेवी), कूचबिहार ने विशिष्ट अतिथि के रूप में भाग लिया।

डॉ. ए. सारंगी, निदेशक, भाकृअनुप-भारतीय जल प्रबंधन संस्थान, भुवनेश्वर; डॉ. एस. बटब्याल, अनुसंधान, प्रसार एवं फार्म निदेशक (डीआरईएफ), डब्ल्यूबीयूएएफएस, कोलकाता; तथा डॉ. पी.के. पॉल, प्रभारी, प्रसार शिक्षा निदेशालय (डीईई), यूबीकेवी, कूचबिहार, सम्मानित अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

आईसीएआर-एटारी कोलकाता के वैज्ञानिकों एवं परियोजना कर्मचारियों के साथ-साथ तीनों किसान फर्स्ट कार्यक्रम केंद्रों के प्रधान अन्वेषकों (पीआई), सह-प्रधान अन्वेषकों (को-पीआई) और वरिष्ठ अनुसंधान फेलो (एसआरएफ) ने भी बैठक में भाग लिया।

अपने संबोधन में डॉ. प्रदीप डे ने तीनों किसान फर्स्ट कार्यक्रम केंद्रों के बीच परस्पर सीखने की व्यापक संभावनाओं पर बल दिया। उन्होंने प्रत्येक संस्थान की विशिष्ट क्षमताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भाकृअनुप-आईआईडब्ल्यूएम प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन (एनआरएम) आधारित मॉड्यूलों, डब्ल्यूबीयूएएफएस पशुधन एवं एकीकृत कृषि प्रणाली (आईएफएस) आधारित मॉड्यूलों तथा यूबीकेवी फसल एवं बागवानी आधारित मॉड्यूलों में विशेष दक्षता रखता है। उन्होंने कार्यक्रम की पहुंच को अधिक व्यापक कृषक समुदाय तक बढ़ाने के लिए केन्द्रों को किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और किसान उत्पादक कंपनियों (एफपीसी) के साथ सहयोग करने की सलाह दी। बकरियों में कृत्रिम गर्भाधान के लिए मास्टर ट्रेनरों के विकास में डब्ल्यूबीयूएएफएस की सफलता का उल्लेख करते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि प्रौद्योगिकी के व्यापक प्रसार हेतु सभी केन्द्रों को इसी प्रकार की क्षमता निर्माण पहलें करनी चाहिए। डॉ. डे ने विकसित भारत 2047 के दृष्टिकोण में योगदान देने के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकियों, जलवायु-सहिष्णु हस्तक्षेपों, मूल्य श्रृंखला विकास तथा कृषि उद्यमिता के महत्व पर भी बल दिया।

डॉ. टी.के. दत्ता ने डब्ल्यूबीयूएएफएस किसान फर्स्ट टीम के प्रयासों की सराहना करते हुए परियोजना क्षेत्र में बकरियों में कृत्रिम गर्भाधान की शुरुआत को महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने परिषद से प्रशिक्षण कार्यक्रमों, अवसंरचना विकास तथा परियोजना स्थलों पर क्षेत्रीय प्रदर्शनों को सुदृढ़ करने हेतु अतिरिक्त वित्तीय सहायता प्रदान करने का अनुरोध किया।

परिषद और कृषि प्रसार प्रभाग के प्रति आभार व्यक्त करते हुए प्रो. डी. बसु ने यूबीकेवी, कूचबिहार को नया किसान फर्स्ट कार्यक्रम केन्द्र आवंटित किए जाने की सराहना की। उन्होंने कार्यक्रम के कृषि-पारिस्थितिकी आधारित अनुसंधान पर विशेष फोकस को रेखांकित किया तथा किसानों के लाभ के लिए सफल और पुनरुत्पादित की जा सकने वाली प्रौद्योगिकियों के विकास हेतु व्यवस्थित और दीर्घकालिक अनुसंधान की आवश्यकता पर बल दिया।

डॉ. ए. सारंगी ने किसानों द्वारा स्वीकार्य प्रौद्योगिकियों के विकास के साथ-साथ उनके मूल्यांकन, दृश्यता और विभिन्न कृषि-पारिस्थितिकी प्रणालियों में विविधीकरण के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी का क्रियान्वयन लक्षित क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र के अनुरूप होना चाहिए तथा चयनित क्लस्टरों का सतत विकास इसका प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए।

डॉ. एस. बटब्याल ने डब्ल्यूबीयूएएफएस द्वारा किए जा रहे कार्यों की सराहना की और विश्वास व्यक्त किया कि बकरियों के कृत्रिम गर्भाधान के लिए मास्टर ट्रेनरों का विकास किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा।

स्थिरता के महत्व को रेखांकित करते हुए डॉ. पी. के. पॉल ने हरित कृषि को बढ़ावा देने के लिए किसान फर्स्ट दृष्टिकोण के माध्यम से ऊर्जा-कुशल प्रौद्योगिकियों के विकास की वकालत की।

विचार-विमर्श के दौरान कार्यक्रम के प्रभावी क्रियान्वयन को सुदृढ़ करने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए। प्रतिभागियों ने सहयोग और अभिसरण के माध्यम से कार्यान्वयन केंद्रों के बीच परस्पर सीखने को बढ़ावा देने की अनुशंसा की। फल बागानों में किसानों की आय बढ़ाने के लिए मौसमी सब्जियों और मसालों के साथ अंतरफसली खेती या द्विस्तरीय फसल प्रणाली अपनाने का सुझाव दिया गया। उद्यम आधारित मॉड्यूलों के लिए ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ओडीओपी) दृष्टिकोण अपनाने का प्रस्ताव रखा गया, जबकि चयनित गांवों में दुग्ध मूल्य श्रृंखला के विस्तार की भी अनुशंसा की गई। बैकयार्ड कुक्कुट पालन को सुदृढ़ करने के लिए स्थानीय स्तर पर चूजों के उत्पादन को बढ़ावा देने तथा वाणिज्यिक हैचरियों पर निर्भरता कम करने हेतु कम लागत वाले इनक्यूबेटरों को प्रोत्साहित करने का सुझाव दिया गया।

बैठक में उच्च गुणवत्ता वाले शोध प्रकाशनों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया। प्रतिभागियों ने विश्वसनीय शोध परिणाम उत्पन्न करने के लिए क्षेत्रीय आंकड़ा संग्रहण हेतु आईओटी-सक्षम अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग (एडब्ल्यूडी) उपकरणों के उपयोग की अनुशंसा की। यह भी सुझाव दिया गया कि विभिन्न हस्तक्षेपों और प्रौद्योगिकियों के सभी मापन योग्य मानकों की पहचान क्रियान्वयन से पूर्व कर ली जाए ताकि गुणवत्तापूर्ण शोध प्रकाशन सुनिश्चित किए जा सकें। परियोजना के सामाजिक प्रभाव के समग्र मूल्यांकन के लिए सामाजिक विज्ञान संकेतकों को भी शामिल करने की अनुशंसा की गई।

तकनीकी सत्र के दौरान तीनों किसान फर्स्ट कार्यक्रम केंद्रों के प्रधान अन्वेषकों और सह-प्रधान अन्वेषकों ने वर्ष 2026–27 के लिए अपनी-अपनी कार्ययोजनाएं प्रस्तुत कीं। प्रस्तावित योजनाओं की गणमान्य व्यक्तियों एवं विशेषज्ञ पैनल द्वारा गंभीर समीक्षा की गई तथा मूल्यवान सुझाव दिया गया। साथ ही यह अनुशंसा की गई कि प्राप्त टिप्पणियों और सुझावों को क्रियान्वयन से पूर्व अंतिम कार्ययोजनाओं में शामिल किया जाए।

(स्रोत: भाकृअनुप–कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, कोलकाता)

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