14 सितंबर, 2026, लुधियाना
आज भाकृअनुप-कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-अटारी ), लुधियाना में डॉ. एम.एल. जाट, सचिव, डेयर एवं महानिदेशक, भाकृअनुप की अध्यक्षता में तथा डॉ. राजबीर सिंह, उप महानिदेशक (कृषि विस्तार), भाकृअनुप की उपस्थिति में वैज्ञानिक-किसान संवाद बैठक आयोजित की गई। बैठक में आगामी रबी मौसम की प्राथमिकताओं की पहचान, सतत कृषि और फसल अवशेष प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. परविंदर श्योराण, निदेशक, भाकृअनुप-एटीएआरआई, लुधियाना के स्वागत संबोधन से हुई। डॉ. जे. पी. एस. गिल, कुलपति, जीएडीवीएएसयू, पीएयू और जीएडीवीएएसयू के अनुसंधान एवं विस्तार निदेशक, केवीके के प्रमुख, एसएमएस, वैज्ञानिक, किसान और महिला किसान संवाद में शामिल हुए।

संवाद के दौरान डॉ. एम.एल. जाट ने कृषि प्राथमिकताओं की पहचान के लिए निचले स्तर से ऊपर की ओर दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया, जिसमें जिला स्तर पर परामर्श के बाद उन्हें राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर समेकित किया जाए। उन्होंने अधिक बीज उत्पादन के माध्यम से उच्च उपज देने वाली किस्मों की पर्याप्त उपलब्धता, तिलहन बीज उत्पादन को बढ़ावा देने और फसल विविधीकरण की आवश्यकता पर जोर दिया।
फसल अवशेष प्रबंधन और पराली जलाने की रोकथाम चर्चा के प्रमुख क्षेत्रों के रूप में उभरे। डॉ. जाट ने जिला-विशिष्ट कार्य योजनाओं, हितधारकों के बीच प्रभावी समन्वय, आवश्यकता-आधारित कृषि मशीनरी की तैनाती और अवशेष जलाने के मूल कारणों की पहचान का आह्वान किया। उन्होंने किसानों को व्यावहारिक और स्थानीय रूप से उपयुक्त इन-सीटू तथा एक्स-सीटू अवशेष प्रबंधन विकल्प उपलब्ध कराने पर जोर दिया।

बैठक में कम-उत्सर्जन वाली कृषि, मृदा स्वास्थ्य, सतत धान-गेहूं प्रणालियों, फसल विविधीकरण और कार्बन-क्रेडिट प्रोत्साहनों पर भी विचार-विमर्श किया गया। सतत प्रथाओं को अपनाने और कार्बन क्रेडिट उत्पन्न करने वाले 2,550 किसानों को प्राप्त हुए सस्टेनेबिलिटी प्रीमियम के योगदान को रेखांकित किया गया तथा व्यापक स्तर पर अपनाने के लिए प्रेरित करने हेतु उनकी सफलता की कहानियों को पहचानने और प्रदर्शित करने का आह्वान किया गया।
डॉ. राजबीर सिंह ने जिला स्तर पर नोडल इकाइयों के रूप में केवीके को मजबूत करने पर प्रकाश डाला और अनुसंधान तथा किसानों के बीच एक मजबूत अग्रिम पंक्ति के विस्तार संपर्क के रूप में उनकी भूमिका पर जोर दिया। बैठक में सतत कृषि विकास के लिए हितधारकों के अभिसरण, वैज्ञानिक साक्ष्य, मजबूत डेटा प्रणालियों और किसान-केंद्रित समाधानों के महत्व को रेखांकित किया गया।

वैज्ञानिक-किसान संवाद ने वैज्ञानिकों, विस्तार पेशेवरों और कृषक समुदायों के बीच सीधे संवाद के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया, जिससे भविष्य की कृषि योजना और हस्तक्षेपों में खेत-स्तर की चिंताओं और प्राथमिकताओं को शामिल किया जा सके।
(स्रोत: भाकृअनुप-कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, लुधियाना)







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