9 मार्च, 2026, नई दिल्ली
भाकृअनुप–भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली, ने सूक्ष्मजीव विज्ञान प्रभाग में 17 फरवरी से 9 मार्च, 2026 तक “अजैविक तनाव के निवारण हेतु सूक्ष्म जीव-आधारित रणनीतियाँ: जैव संसाधनों से प्रौद्योगिकी विकास” विषय पर भाकृअनुप प्रायोजित शीतकालीन विद्यालय का सफलतापूर्वक आयोजन किया। इस तीन सप्ताह के प्रशिक्षण कार्यक्रम में देश के विभिन्न भागों से वैज्ञानिकों, संकाय सदस्यों एवं शोधकर्ताओं ने भाग लिया।
डॉ. चेरुकमल्ली श्रीनिवास राव, निदेशक, भाकृअनुप–आएआरआई ने अपने संबोधन में कहा कि जलवायु परिवर्तन कृषि उत्पादकता एवं स्थिरता के लिए गंभीर चुनौतियां उत्पन्न करता है। उन्होंने बताया कि सूक्ष्मजीव-आधारित तकनीकों में फसलों की सहनशीलता बढ़ाने, मृदा स्वास्थ्य सुधारने तथा रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम करने की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्नत सूक्ष्मजीव अनुसंधान को किसान-अनुकूल तकनीकों में रूपांतरित करना, भारत में सतत एवं जलवायु-स्मार्ट कृषि प्राप्त करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इस शीतकालीन विद्यालय में कृषि में अजैविक तनाव से निपटने के लिए सूक्ष्मजीवों के उपयोग से संबंधित उभरते दृष्टिकोणों पर विशेष ध्यान दिया गया, विशेषकर जलवायु परिवर्तन और सतत कृषि उत्पादन के संदर्भ में। कार्यक्रम में सूक्ष्मजीवों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला गया, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने तथा तनावपूर्ण परिस्थितियों में फसलों की सहनशीलता बढ़ाने में सहायक हैं।
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को विभिन्न विषयगत क्षेत्रों से परिचित कराया गया, जिनमें फसलों में तनाव अनुकूलन एवं सहनशीलता में सूक्ष्मजीवों की भूमिका, पादप–सूक्ष्मजीव अंतःक्रियाओं के अध्ययन हेतु ओमिक्स आधारित उपकरणों का उपयोग, तथा इन सभी को “वन हेल्थ” दृष्टिकोण के अंतर्गत एकीकृत करना शामिल है, जो कृषि स्थिरता को पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य से जोड़ता है।
कार्यक्रम में व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया गया, जिसमें लाभकारी सूक्ष्मजीवों का पृथक्करण एवं विशेषताओं का विश्लेषण, तनाव सहनशीलता से जुड़े प्रमुख गुणों की पहचान, तथा पादप–सूक्ष्मजीव अंतःक्रियाओं के अध्ययन हेतु आधुनिक तकनीकों का उपयोग शामिल था। इसके अतिरिक्त, प्रयोगशाला में विकसित नवाचारों को खेत स्तर की तकनीकों में बदलने के लिए नियामक ढाँचे एवं प्रक्रियाओं पर भी चर्चा की गई।

इस शीतकालीन विद्यालय में जैव उर्वरकों (बायोइनोकुलेंट्स), बायोस्टिमुलेंट्स तथा अन्य जैविक उत्पादों के विकास एवं उपयोग पर विशेष जोर दिया गया, जो जलवायु-सहिष्णु एवं सतत कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देने के लिए प्रभावी समाधान हैं। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य प्रतिभागियों की क्षमता को सुदृढ़ करना था, ताकि वे बदलती जलवायु परिस्थितियों में कृषि स्थिरता हेतु सूक्ष्मजीव संसाधनों का प्रभावी उपयोग कर सकें।
यह शीतकालीन विद्यालय क्षमता निर्माण, वैज्ञानिक संवाद एवं सहयोग के लिए एक महत्वपूर्ण मंच सिद्ध हुआ, जिसमें प्रतिभागियों को सूक्ष्मजीव संसाधनों को जलवायु-अनुकूल समाधान के रूप में उपयोग करने हेतु उन्नत ज्ञान एवं कौशल प्रदान किए।
(स्रोत: भाकृअनुप–भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली)







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