त्रिपुरा के धलाई जिले के सलेमा गांव के आलू उत्पादक श्री पबिर दास के लिए रबी सीजन 2025–26 उत्साहजनक परिणाम लेकर आया। यह अनुभव दर्शाता है कि वैज्ञानिक मार्गदर्शन और संस्थागत सहयोग से समर्थित उन्नत फसल किस्में किस प्रकार कृषि उत्पादकता और लाभप्रदता बढ़ा सकती हैं। अपनी पारंपरिक किस्म कुफरी ज्योति के स्थान पर उन्नत आलू किस्म कुफरी हिमालिनी की खेती करके उन्होंने उपज में 26.85 प्रतिशत की वृद्धि हासिल की, जो क्षेत्र के अन्य आलू उत्पादकों के लिए भी एक प्रेरणादायक उदाहरण है।
त्रिपुरा में आलू रबी सीजन की एक महत्वपूर्ण सब्जी एवं नकदी फसल है और राज्य की फसल प्रणाली में धान के बाद इसका दूसरा स्थान है। हालांकि, मौसमी कृषि आय में इसका योगदान कई कारकों पर निर्भर करता है, जिनमें स्वस्थ बीज कंदों की उपलब्धता, किस्म की उपयुक्तता, उचित जल निकासी, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, समय पर सिंचाई और प्रभावी रोग नियंत्रण शामिल हैं। आर्द्र जलवायु में पछेती झुलसा रोग का खतरा उपयुक्त किस्मों और वैज्ञानिक फसल प्रबंधन पद्धतियों की आवश्यकता को और अधिक महत्वपूर्ण बना देता है।

इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, कृषि विज्ञान केन्द्र (केवीके), धलाई, सलेमा ने रबी सीजन 2025–26 के दौरान श्री पबिर दास के खेत में अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन एवं किस्म लोकप्रियकरण पहल का कार्यान्वयन किया। इस पहल को पूर्वोत्तर पर्वतीय (एनईएच) घटक योजना के अंतर्गत भाकृअनुप–भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), नई दिल्ली से प्रौद्योगिकी एवं आदान सहायता प्राप्त हुई। वहीं, भाकृअनुप–कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (अटारी), जोन VII, उमियम, मेघालय ने इसका तकनीकी पर्यवेक्षण किया। इस प्रदर्शन के माध्यम से धलाई जिले की प्रचलित कृषि-जलवायु परिस्थितियों में कुफरी ज्योति की तुलना में कुफरी हिमालिनी के प्रदर्शन का आकलन किया गया।
यह हस्तक्षेप केवल उन्नत किस्म को अपनाने तक सीमित नहीं था। केवीके, धलाई ने किसान को स्वस्थ एवं रोगमुक्त बीज कंदों के चयन से लेकर उचित जल निकासी वाले खेत की तैयारी तक वैज्ञानिक खेती की विभिन्न पद्धतियां अपनाने के लिए मार्गदर्शन प्रदान किया। बुवाई 60 × 20 सेंटीमीटर की दूरी पर मेड़ों पर की गई। इसके साथ ही मृदा परीक्षण के परिणामों और स्थानीय सिफारिशों के आधार पर जैविक एवं अकार्बनिक पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग किया गया। समय पर खरपतवार प्रबंधन, मिट्टी चढ़ाना और मृदा में नमी की आवश्यकता के अनुसार सिंचाई भी इस कृषि पद्धति पैकेज के महत्वपूर्ण घटक रहे। पछेती झुलसा रोग की नियमित निगरानी के साथ-साथ परिपक्व कंदों की सावधानीपूर्वक खुदाई और श्रेणीकरण ने भी फसल प्रबंधन को बेहतर बनाने में योगदान दिया।

इसके परिणाम उत्साहजनक रहे। उन्नत प्रौद्योगिकी पैकेज के अंतर्गत कुफरी हिमालिनी से कुल 32.60 टन प्रति हैक्टर कंद उपज प्राप्त हुई, जबकि किसान की प्रचलित खेती पद्धति के तहत कुफरी ज्योति से 25.70 टन प्रति हेक्टेयर उपज मिली। इस प्रकार प्रति हैक्टर 6.90 टन की अतिरिक्त उपज प्राप्त हुई, जो उत्पादकता में 26.85 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है। प्रदर्शन में कुफरी हिमालिनी में पछेती झुलसा रोग का प्रकोप 4 प्रतिशत दर्ज किया गया, जबकि कुफरी ज्योति में यह 12 प्रतिशत था। यह देखी गई परिस्थितियों में उन्नत किस्म की तुलनात्मक रूप से बेहतर रोग प्रतिक्रिया को दर्शाता है। हालांकि, मध्यम प्रतिरोधक क्षमता से संक्रमण का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं होता, फिर भी यह विशेषता त्रिपुरा के आर्द्र जलवायु वाले आलू उत्पादक क्षेत्रों में आगे के मूल्यांकन के लिए कुफरी हिमालिनी को एक आशाजनक विकल्प बनाती है।

अधिक उत्पादकता से आर्थिक लाभ में भी वृद्धि हुई। खेत स्तर पर 15 रुपये प्रति किलोग्राम के मॉडल मूल्य के आधार पर कुफरी हिमालिनी की विपणन योग्य उपज 293.40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर अनुमानित की गई, जिससे 4,40,100 रुपये प्रति हेक्टेयर का सकल लाभ प्राप्त हुआ। प्रति हेक्टेयर 1,25,000 रुपये की खेती लागत के साथ शुद्ध लाभ 3,15,100 रुपये प्रति हैक्टर रहा तथा लाभ-लागत अनुपात 3.52:1 दर्ज किया गया। इसकी तुलना में कुफरी ज्योति से 221.02 क्विंटल प्रति हेक्टेयर विपणन योग्य उपज प्राप्त हुई, जिससे 3,31,530 रुपये का सकल लाभ और 2,17,530 रुपये प्रति हैक्टर का शुद्ध लाभ हुआ। इसका लाभ-लागत अनुपात 2.91:1 रहा। इस प्रकार, उन्नत प्रौद्योगिकी पैकेज से प्रति हैक्टर अनुमानित 97,570 रुपये का अतिरिक्त शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ। यह परिणाम दर्शाता है कि उन्नत किस्म और वैज्ञानिक फसल प्रबंधन के संयोजन में आर्थिक लाभ बढ़ाने की अच्छी क्षमता है। हालांकि, वास्तविक लाभ खेती की लागत, बाजार मूल्य और उपज के विपणन योग्य हिस्से पर निर्भर करेगा।
अपने अनुभव साझा करते हुए श्री पबिर दास ने कुफरी हिमालिनी के प्रदर्शन पर संतोष व्यक्त किया और उन्हें उन्नत खेती पद्धतियां अपनाने के लिए मार्गदर्शन देने में केवीके के वैज्ञानिकों की भूमिका की सराहना की। उन्होंने बताया कि कुफरी ज्योति की तुलना में अधिक उपज मिलने से उन्नत किस्म के प्रति उनका विश्वास मजबूत हुआ है। उन्होंने भविष्य में भी कुफरी हिमालिनी की खेती जारी रखने तथा अपने गांव के अन्य किसानों को उन्नत आलू किस्में और वैज्ञानिक खेती पद्धतियां अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने की इच्छा व्यक्त की।

यह प्रदर्शन एक खेत तक सीमित न रहकर व्यापक महत्व रखता है। श्री पबिर दास के खेत में देखी गई स्वस्थ फसल वृद्धि, संतोषजनक कंद विकास और अधिक उत्पादकता उन आसपास के किसानों के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करती है, जो अपनी मौजूदा किस्मों के विकल्प तलाश रहे हैं। यह बेहतर और अधिक स्थिर परिणाम प्राप्त करने के लिए उन्नत रोपण सामग्री के साथ संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, उचित जल निकासी, समय पर सिंचाई और समेकित रोग प्रबंधन अपनाने के महत्व को भी रेखांकित करता है।
सलेमा में कुफरी हिमालिनी की सफलता कृषि अनुसंधान संस्थानों और प्रसार एजेंसियों के समन्वित प्रयासों के महत्व को दर्शाती है, जिनके माध्यम से उन्नत प्रौद्योगिकियों को किसानों के खेतों तक पहुंचाया जाता है। भाकृअनुप–आईएआरआई की प्रौद्योगिकी एवं आदान सहायता, केवीके धलाई द्वारा कार्यान्वयन और भाकृअनुप–अटारी जोन VII के तकनीकी पर्यवेक्षण के माध्यम से इस प्रदर्शन ने धलाई जिले में आलू उत्पादकता और कृषि लाभप्रदता बढ़ाने के लिए अनुसंधान आधारित हस्तक्षेपों की क्षमता को प्रदर्शित किया।

श्री पबिर दास का अनुभव त्रिपुरा और पूर्वोत्तर के अन्य उपयुक्त कृषि क्षेत्रों के आलू उत्पादकों के लिए एक उत्साहजनक उदाहरण प्रस्तुत करता है। वैज्ञानिक फसल प्रबंधन पद्धतियों के साथ कुफरी हिमालिनी का व्यापक मूल्यांकन और लोकप्रियकरण किसानों को किस्मों के चयन में सूचित निर्णय लेने, विपणन योग्य उत्पादन बढ़ाने और कृषि आय को मजबूत करने में मदद कर सकता है। इस प्रकार, यह प्रदर्शन रेखांकित करता है कि उन्नत किस्मों, वैज्ञानिक मार्गदर्शन और संस्थागत सहयोग का समन्वय क्षेत्र में अधिक उत्पादक एवं टिकाऊ आलू उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
(स्रोत: कृषि विज्ञान केन्द्र, धलाई)








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