भाकृअनुप-डीएमएपीआर के वैज्ञानिक नेतृत्व ने राजस्थान की प्रीमियम औषधीय फसल को सशक्त बनाया और भारत की वैश्विक आयुर्वेदिक पहचान को और मजबूत किया
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के मार्गदर्शन और सहयोग से भारत के औषधीय पौध क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में राजस्थान के नागौर क्षेत्र में उगाई जाने वाली नागौरी अश्वगंधा को प्रतिष्ठित भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग (जीआई संख्या 1143) प्राप्त हुआ है, जिसने इसकी असाधारण गुणवत्ता, औषधीय महत्व और विशिष्ट भौगोलिक पहचान को पुनः स्थापित किया है। राजस्थान के मध्य और पश्चिमी क्षेत्र, विशेष रूप से नागौर, चूरू और बीकानेर, अद्वितीय शुष्क से अर्द्ध-शुष्क कृषि-जलवायु परिस्थितियों और अनुकूल मृदा विशेषताओं से युक्त हैं, जो लंबी, मोटी, भंगुर तथा खोखलापन रहित जड़ों वाली उच्च गुणवत्ता की नागौरी अश्वगंधा का उत्पादन करते हैं, जिसकी हर्बल उद्योग में अत्यधिक मांग है।

इस उपलब्धि के वैश्विक महत्व को तब और अधिक रेखांकित किया गया जब माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान जीआई-टैग प्राप्त नागौरी अश्वगंधा को भारत की पारंपरिक भेंट के रूप में प्रस्तुत किया, जो भारत की समृद्ध आयुर्वेदिक विरासत और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का प्रतीक है।
जीआई पंजीकरण राजस्थान सरकार के कृषि विभाग, राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (एनएमपीबी) और नागौरी वेलफेयर सोसाइटी के सहयोगात्मक प्रयासों से संभव हो पाया। इन योगदानकर्ताओं में आईसीएआर-औषधीय एवं सगंध पौधा अनुसंधान निदेशालय, आनंद एक प्रमुख वैज्ञानिक संस्थान के रूप में उभरा, जिसने जीआई टैग प्राप्त करने के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण तकनीकी साक्ष्य और अनुसंधान-आधारित प्रमाणीकरण प्रदान किया।

कि अश्वगंधा (Withania somnifera) भाकृअनुप-डीएमएपीआर की अधिदेशित फसलों में से एक है, इसलिए यह निदेशालय इस महत्वपूर्ण औषधीय पौधे के लक्षण निर्धारण, गुणवत्ता मूल्यांकन और मूल्य संवर्धन पर अनुसंधान में अग्रणी भूमिका निभाता रहा है।
भाकृअनुप-डीएमएपीआर के वैज्ञानिकों ने नागौरी अश्वगंधा की विशिष्टता स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभाई और इसके आयुर्वेदिक महत्व, फाइटोकेमिकल प्रोफाइल, औषधीय प्रभावकारिता और रासायनिक गुणवत्ता मानकों पर वैज्ञानिक साक्ष्य उत्पन्न किए।
भाकृअनुप-डीएमएपीआर द्वारा किए गए अनुसंधान ने नागौरी अश्वगंधा की उत्कृष्ट औषधीय गुणवत्ता को रेखांकित किया, विशेष रूप से इसमें स्टार्च, विथेनोलाइड्स और एल्कलॉइड्स जैसे जैव-सक्रिय यौगिकों की प्रचुरता को, जो बेहतर जीवन शक्ति, प्रतिरक्षा, तनाव प्रबंधन और समग्र स्वास्थ्य संवर्धन से जुड़े हुए हैं।
डॉ. मनीष दास, निदेशक, भाकृअनुप-डीएमएपीआर, ने कहा, “नागौरी अश्वगंधा को जीआई मान्यता मिलना भारत के औषधीय पौध क्षेत्र के लिए गर्व का विषय है। इस फसल की विशिष्टता को प्रमाणित करने में आईसीएआर-डीएमएपीआर का वैज्ञानिक योगदान पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण, किसानों की आय बढ़ाने और हर्बल स्वास्थ्य देखभाल में भारत के वैश्विक नेतृत्व को सुदृढ़ करने में सहायक होगा।”
यह उपलब्धि पारंपरिक ज्ञान, वैज्ञानिक उत्कृष्टता, संस्थागत सहयोग और किसानों की भागीदारी के उत्कृष्ट समन्वय का प्रतिनिधित्व करती है। इस सफलता में भाकृअनुप के मार्गदर्शन में भाकृअनुप-डीएमएपीआर का महत्वपूर्ण योगदान औषधीय और सगंध पौधों के लिए भारत के अग्रणी अनुसंधान संस्थान के रूप में इसकी स्थिति को और सुदृढ़ करता है तथा देश की हर्बल अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने की इसकी प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि करता है।
(भाकृअनुप-औषधीय एवं सगंध पौधा अनुसंधान निदेशालय, आनंद, गुजरात)







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