30 जून 2026, मोतिहारी, बिहार
देशव्यापी खेत बचाओ अभियान–2026 के अंतर्गत भाकृअनुप–महात्मा गांधी समेकित कृषि अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-एमजीआईएफआरआई), मोतिहारी, ने बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में आम के बागों में वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन पर किसान जागरूकता-सह-प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया। कार्यक्रम का उद्देश्य वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन के माध्यम से बागों की उत्पादकता बढ़ाना, फलों की गुणवत्ता में सुधार करना, मृदा स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित करना तथा जलवायु-अनुकूल बागवानी को बढ़ावा देना था।
कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिकों ने इस बात पर बल दिया कि संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन लाभकारी आम उत्पादन की आधारशिला है। उन्होंने बताया कि मृदा में कार्बनिक कार्बन की घटती मात्रा, पोषक तत्वों का निरंतर क्षरण तथा उर्वरकों का अविवेकपूर्ण उपयोग बागों की उत्पादकता में कमी के प्रमुख कारण हैं। किसानों को रासायनिक उर्वरकों के साथ जैविक खाद एवं जैव उर्वरकों का समन्वय करते हुए मृदा परीक्षण आधारित समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम) अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
कार्यक्रम में आम के बागों के लिए अवस्था-विशिष्ट पोषक तत्व प्रबंधन का प्रदर्शन किया गया। नवस्थापित बागों के लिए किसानों को प्रति पौधा 50 ग्राम एजोटोबैक्टर, 50 ग्राम फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु (पीएसबी) तथा 3 किलोग्राम वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग करने की सलाह दी गई। इन सभी को पर्याप्त मृदा नमी की स्थिति में तने से लगभग एक फुट की दूरी पर 15–20 सेंटीमीटर गहरी वृत्ताकार नाली में डालने की अनुशंसा की गई।

पूर्ण विकसित बागों के लिए प्रति वृक्ष 1500 ग्राम नाइट्रोजन, 500 ग्राम फॉस्फोरस, 1000 ग्राम पोटाश तथा 40–50 किलोग्राम अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद (एफवाईएम) की वार्षिक अनुशंसित मात्रा बताई गई। किसानों को सलाह दी गई कि मानसून की शुरुआत में 750 ग्राम नाइट्रोजन (आधी मात्रा) के साथ फॉस्फोरस (500 ग्राम), पोटाश (1000 ग्राम) तथा एफवाईएम की पूरी मात्रा का प्रयोग करें, जबकि शेष 750 ग्राम नाइट्रोजन का प्रयोग पुष्पन अवस्था में करें। उर्वरकों को तने से 1–1.5 मीटर की दूरी पर 15–20 सेंटीमीटर गहरी वृत्ताकार नाली में डालने की सलाह दी गई, ताकि पोषक तत्वों का प्रभावी अवशोषण सुनिश्चित हो सके।
वैज्ञानिकों ने आगे बताया कि उर्वरकों की अनुशंसित मात्रा में हमेशा मृदा परीक्षण के परिणामों के अनुसार संशोधन किया जाना चाहिए। मानक अनुशंसित मात्रा की तुलना में अत्यधिक पोषक तत्वों की कमी वाली मिट्टी में उर्वरकों की मात्रा 50 प्रतिशत, कम उर्वरता वाली मिट्टी में 25 प्रतिशत बढ़ाई जानी चाहिए, मध्यम उर्वरता वाली मिट्टी में 100 प्रतिशत अनुशंसित मात्रा दी जानी चाहिए, पोषक तत्वों से समृद्ध मिट्टी में 25 प्रतिशत तथा अत्यधिक पोषक उपलब्धता वाली मिट्टी में 50 प्रतिशत कम उर्वरक का उपयोग किया जाना चाहिए। इससे उर्वरकों के उपयोग की दक्षता अधिकतम होगी तथा अनावश्यक व्यय कम होगा।
उच्च घनत्व वाले आम के बागों (तीन वर्ष पुराने बागों) के लिए किसानों को चार चरणों वाली पोषक तत्व प्रबंधन अनुसूची अपनाने की सलाह दी गई। इसमें प्रति पौधा प्रतिवर्ष 300 ग्राम नाइट्रोजन, 150 ग्राम फॉस्फोरस एवं 300 ग्राम पोटाश देने की अनुशंसा की गई। पोषक तत्वों का प्रयोग चार चरणों में करने की सलाह दी गई—कटाई के बाद 120:60:75 ग्राम एनपीके, पुष्पन से पहले 75:60:60 ग्राम, फल लगने पर 60:30:75 ग्राम तथा फल विकास अवस्था में 45:0:90 ग्राम, जिससे पूरे फसल चक्र के दौरान पोषक तत्वों की सतत उपलब्धता सुनिश्चित हो सके।
वैज्ञानिकों ने जैव उर्वरक बूस्टरों के महत्व पर भी प्रकाश डाला तथा प्रति वृक्ष 5 मिली एजोटोबैक्टर एवं 5 मिली पीएसबी को एक लीटर पानी एवं अच्छी तरह सड़ी हुई जैविक खाद के साथ मिलाकर मानसून की शुरुआत तथा पुनः पुष्पन अवस्था में प्रयोग करने की अनुशंसा की। इस तकनीक को अपनाने से अनुशंसित नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस उर्वरकों की आवश्यकता में लगभग 15 प्रतिशत की बचत की जा सकती है, साथ ही मृदा में सूक्ष्मजीवीय गतिविधि एवं पोषक तत्वों की उपलब्धता में भी सुधार होता है।
कार्यक्रम में सूक्ष्म पोषक तत्व प्रबंधन, विशेष रूप से जिंक, आयरन एवं बोरॉन पर विशेष बल दिया गया, जो क्लोरोफिल संश्लेषण, एंजाइम गतिविधि, पुष्पन, फल सेट, पराग की जीवंतता तथा फल विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किसानों को विशेष रूप से चूना युक्त (कैल्केरियस) मिट्टियों में कटाई के बाद प्रति वृक्ष 50 ग्राम ग्रेड-1 सूक्ष्म पोषक तत्व मिश्रण (जिंक 5%, आयरन 2%, मैंगनीज 1%, कॉपर 0.5%, बोरॉन 1%) को 10 किलोग्राम एफवाईएम के साथ मिलाकर प्रयोग करने की सलाह दी गई।

फल उत्पादन बढ़ाने तथा फल झड़ने की समस्या कम करने के लिए वैज्ञानिकों ने 1 प्रतिशत जल में घुलनशील उर्वरक (13:0:45) का मटर अवस्था, संगमरमर अवस्था तथा अंडाकार फल अवस्था में तीन बार पर्णीय छिड़काव करने की अनुशंसा की। इसके साथ ही समय से पहले फल झड़ने की समस्या कम करने के लिए 20 पीपीएम एनएए का छिड़काव मटर अवस्था एवं संगमरमर अवस्था में करने की भी सलाह दी गई।
कार्यक्रम में इस बात पर भी बल दिया गया कि उर्वरकों का प्रयोग करने से पहले मृदा परीक्षण अवश्य किया जाना चाहिए। किसानों को एफवाईएम, वर्मी कम्पोस्ट, फसल अवशेष पुनर्चक्रण, हरित खाद तथा जैव उर्वरकों को रासायनिक उर्वरकों के साथ समेकित करने के लिए प्रेरित किया गया, जिससे मृदा में कार्बनिक कार्बन, मृदा संघटन, सूक्ष्मजीवीय गतिविधि, पोषक तत्व उपयोग दक्षता तथा बागों की दीर्घकालिक उत्पादकता में सुधार हो सके। किसानों को यह भी सलाह दी गई कि वे फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उनका पुनर्चक्रण करें, जिससे मूल्यवान पोषक तत्वों का संरक्षण हो तथा मृदा का जैविक स्वास्थ्य बेहतर बने।
वैज्ञानिकों ने समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) के साथ संतुलित पोषण के समन्वय के महत्व पर भी प्रकाश डाला। किसानों को बागों की स्वच्छता बनाए रखने, नियमित कीट निगरानी करने, समय पर छंटाई करने तथा प्रभावी एवं पर्यावरण-अनुकूल कीट प्रबंधन के लिए नीम आधारित वानस्पतिक उत्पादों एवं जैव कीटनाशकों के उपयोग की सलाह दी गई।
कार्यक्रम का समापन इस सशक्त संदेश के साथ हुआ कि वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन, मृदा परीक्षण, जैव उर्वरक, जैविक पोषक तत्व पुनर्चक्रण, सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग तथा समेकित बाग प्रबंधन स्वस्थ आम के बाग, उच्च गुणवत्ता वाले फल तथा सतत कृषि आय सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। किसानों ने व्यावहारिक अनुशंसाओं की सराहना की तथा खेत बचाओ अभियान–2026 के अंतर्गत वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन के संपूर्ण पैकेज को अपनाने की इच्छा व्यक्त की।
(स्रोत: भाकृअनुप–महात्मा गांधी समेकित कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी, बिहार)







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