24 अक्टूबर, 2026, मुंबई
डॉ. मंगल लाल जाट, सचिव, डेयर एवं महानिदेशक, भाकृअनुप, ने मत्स्य पालन तथा जलीय कृषि क्षेत्रों के लिए वैज्ञानिक प्रगति को ठोस लाभों में बदलने पर विशेष ध्यान देते हुए भाकृअनुप–केन्द्रीय मात्स्यिकी शिक्षा संस्थान (भाकृअनुप- सीआईएफई), मुंबई का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने संस्थान के बुनियादी ढांचे, अनुसंधान, शैक्षणिक गतिविधियों और तकनीकी पहलों की समीक्षा की।
वर्सोवा परिसर के दौरे के दौरान डॉ. जाट ने बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) द्वारा कुछ संरचनाओं को प्रस्तावित रूप से ध्वस्त किए जाने के मद्देनजर मौजूदा बुनियादी ढांचे तथा चल रही पुनर्निर्माण और नवीनीकरण गतिविधियों की समीक्षा की। उन्होंने बीएमसी के अधिकारियों के साथ बातचीत की और सीआईएफई के यारी रोड परिसर से सटी नई भूमि के आवंटन से संबंधित आधिकारिक दस्तावेज प्राप्त किया।

नए परिसर में डॉ. जाट ने बालिका छात्रावास के विस्तार की आधारशिला रखी और इस सुविधा का नाम "मीनाक्षी" रखा। उन्होंने छात्रावास के बुनियादी ढांचे का निरीक्षण किया और छात्राओं के साथ बातचीत की। उन्होंने छात्राओं को नेतृत्व क्षमता विकसित करने तथा मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि के क्षेत्र में पोस्ट-डॉक्टोरल अवसरों की संभावनाएं तलाशने के लिए विदेशों में रह रहे पूर्व छात्रों के साथ व्यावसायिक संपर्क मजबूत करने के लिए प्रोत्साहित किया।
डॉ. जाट ने जलीय जैव विविधता संग्रहालय एवं भंडार का भी दौरा किया। यहां 550 से अधिक जलीय प्रजातियों के नमूने संरक्षित हैं, जिनमें फिनफिश, शेलफिश, मोलस्क, क्रस्टेशियन, प्रवाल, शार्क, समुद्री शैवाल, मैंग्रोव और अन्य अकशेरुकी जीव शामिल हैं। इस सुविधा में मछली पकड़ने के उपकरणों और नौकाओं के मॉडल भी प्रदर्शित किए गए हैं। साथ ही, जलीय जैव विविधता के प्रति जागरूकता बढ़ाने और मत्स्य शिक्षा को मजबूत करने के लिए वर्चुअल रियलिटी (वीआर) और ऑगमेंटेड रियलिटी (एआर) सहित डिजिटल शिक्षण उपकरणों को भी शामिल किया गया है।

डॉ. एस.एन. द्विवेदी जलीय कृषि परिसर में डॉ. जाट ने संस्थान की जलीय कृषि सुविधाओं और तकनीकी पहलों की समीक्षा की। इनमें नवीनीकृत सार्वजनिक एक्वेरियम, पुनर्चक्रण जलीय कृषि प्रणाली (आरएएस), स्वचालित सौर फीड डिस्पेंसर, सीआईएफई-कूल, एआई बिन और प्रजनन इकाई शामिल हैं। उन्होंने अनुसंधान के परिणामों को आर्थिक रूप से व्यवहार्य, किसान-अनुकूल और टिकाऊ प्रौद्योगिकियों में बदलने की आवश्यकता पर जोर दिया, जिन्हें मत्स्य क्षेत्र द्वारा प्रभावी ढंग से अपनाया जा सके।
इसके बाद डॉ. जाट ने शैक्षणिक भवन के समिति कक्ष में भाकृअनुप-सीआईएफई और भाकृअनुप-सीएमएफआरआई के वैज्ञानिकों के साथ-साथ विद्यार्थियों, तकनीकी एवं प्रशासनिक कर्मचारियों और शोधार्थियों से बातचीत की।
भाकृअनुप-सीआईएफई के निदेशक डॉ. एन. पी. साहू ने अनुसंधान, शिक्षा, तकनीकी नवाचार, वैज्ञानिक प्रकाशनों और उद्यमिता के क्षेत्र में संस्थान की प्रमुख उपलब्धियों को प्रस्तुत किया।

संस्थान के सदस्यों को संबोधित करते हुए डॉ. जाट ने विकसित भारत के दृष्टिकोण में योगदान देने के लिए मानव पूंजी को मजबूत करने तथा वैज्ञानिक अनुसंधान से समाज और अर्थव्यवस्था को मापने योग्य परिणाम सुनिश्चित करने के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने मत्स्य पालन और जलीय कृषि के क्षेत्र में उभरती चुनौतियों का समाधान करने के लिए नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देने का आह्वान किया। साथ ही, व्यावसायिक सहयोग, ज्ञान के आदान-प्रदान और करियर विकास को सुगम बनाने में मजबूत पूर्व छात्र नेटवर्क तथा नियमित पूर्व छात्र सम्मेलनों की भूमिका पर जोर दिया।
कुशल मानव संसाधनों को क्षेत्र की बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए डॉ. जाट ने संस्थान को मौजूदा कौशल अंतराल का आकलन एवं मात्रात्मक निर्धारण करने तथा ब्लू इकोनॉमी के विकास में सहयोग के लिए आवश्यक अतिरिक्त मत्स्य स्नातकों की संख्या निर्धारित करने की सलाह दी। मुख्यधारा के अनुसंधान ढांचे में विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों को शामिल करने के लिए कृषि अनुसंधान सेवा (एआरएस) के विषयों का विस्तार करने के विद्यार्थियों के अनुरोध पर उन्होंने बताया कि इस विषय को विषयगत प्रभागों (एसएमडी) के साथ चर्चा के तहत व्यापक एआरएस पुनर्विन्यास ढांचे में शामिल किया गया है। उन्होंने मानव संसाधन विकास और अनुसंधान विशेषज्ञता को मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि की उभरती आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने पर जोर दिया।

डॉ. जाट ने वर्ष 2030 और 2047 के लिए मत्स्य क्षेत्र की मानव संसाधन आवश्यकताओं का अनुमान लगाने वाला एक व्यापक दस्तावेज तैयार करने का आह्वान किया। इसमें वर्तमान उपलब्ध मानव संसाधन, राज्यवार कमियों का आकलन तथा मानव पूंजी विकास में निवेश पर मिलने वाले लाभ की तुलना निष्क्रियता की लागत से करने की बात कही गई। उन्होंने इस दस्तावेज को नीति आयोग, पशुपालन एवं मत्स्य पालन मंत्रालय तथा अन्य संबंधित निकायों को प्रस्तुत करने की सलाह दी, ताकि सूचित योजना निर्माण और नीतिगत निर्णयों में सहायता मिल सके।
अपने समापन संबोधन में डॉ. जाट ने वैज्ञानिकों और विद्यार्थियों को अनुसंधान में उत्कृष्टता हासिल करने तथा यह सुनिश्चित करने के लिए प्रोत्साहित किया कि वैज्ञानिक प्रगति से मछली किसानों और अन्य हितधारकों को ठोस लाभ मिले। इस दौरे ने मत्स्य शिक्षा, अनुसंधान, विस्तार और उद्यमिता में उत्कृष्टता के प्रति भाकृअनुप-सीआईएफई की प्रतिबद्धता को दोहराया तथा भारत के मत्स्य पालन और जलीय कृषि क्षेत्रों के सतत विकास को आगे बढ़ाने में संस्थान की भूमिका को और मजबूत किया।
इस बैठक में भाकृअनुप-सीआईआरसीओटी के निदेशक डॉ. एस. के. शुक्ला, भाकृअनुप-सीएमएफआरआई के वैज्ञानिक एवं कर्मचारी तथा अन्य अधिकारी उपस्थित थे।
(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय मात्स्यिकी शिक्षा संस्थान, मुंबई)








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